कमअक़्ल कौन
पवन कुमार ‘मारुत’
थूक दिया है खाट पर ही
उल्टी कर देती हो कहीं पर भी
क्या तुम्हें ज़रा भी अक़्ल नहीं है?
कह रहा था बेटा बीमार माँ से क्रोधित होकर।
परन्तु एक बात बहुत बड़ी बिसारी थी उसने
कि दिन में बारह बार धोती थी
मल-मूत्र उल्टी आदि गन्दगी
कुछ समय पहले जब तुम बेबस बच्चे थे।
सोचो आख़िर अक़्ल किसकी कम है?
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- कविता
-
- अन्धे ही तो हैं
- अब आवश्यकता ही नहीं है
- अब मैं क्या करूँ
- अफ़सोस
- आख़िर मेरा क़ुसूर क्या है
- इसलिए ही तो तुम जान हो मेरी
- ऐसा क्यों करते हो
- कमअक़्ल कौन
- काली कमाई
- कितना ज़हर भरा है
- घर
- चाँदी के कड़ूले
- चाय पियो जी
- जागरण की वेला आई है
- जूती खोलने की जगह ही नहीं है
- डूब जाना ही प्रेम है
- तीसरा हेला
- तुम तो बहुत ख़र्चीली हो
- तुम्हारे जैसा कोई नहीं
- थकी हुई जूतियाँ
- दृश्य
- देखादेखी दुखदाई है
- धराड़ी धरती की रक्षा करती है
- नदी नहरों का निवेदन
- नादानी के घाव
- नफ़रत सोच समझकर कीजिए
- प्रेम प्याला पीकर मस्त हुआ हूँ
- प्लास्टिक का प्रहार
- मज़े में मरती मनुष्यता
- रहस्य
- रोटी के रंग
- रोज़ सुबह
- विधायक साहब आने वाले हैं
- संयोग या साज़िश
- सुकून की छत
- सोया हुआ समाज
- सौतन
- हैरत होती है
- ज़िल्लत की रोटी
- विडियो
-
- ऑडियो
-