आख़िर मेरा क़ुसूर क्या है
पवन कुमार ‘मारुत’
वे मिले थे,
आग और सूखी लकड़ी की तरह।
ज्वाला जलनी ही थी,
जली और भभकी भी बार-बार।
और आनन्द लिया दोनों ने तपती ताप का,
जन्मी ज्वाला अग्नि और काठ के मिलने से।
ज्वाला जीवित है अब भी गली-गली,
जो पली थी अनाथाश्रम में।
आज खाती है ठोकरें दर-दर की,
और साथ में लोगों के ताने भी।
पीती है अपने आँसू चुपचाप,
और पूछती है सिर्फ़ एक ही सवाल।
आख़िर मेरा क़ुसूर क्या है?
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