सदाचरण
डॉ. आर.बी. भण्डारकर
आज के आपाधापी भरे जीवन में कदाचित मानव-कल्याण, परहित के भाव प्राथमिकता से कुछ दूर-से प्रतीत होने लगे हैं। यह प्राथमिक ही रहें, यह बहुत आवश्यक है।
हमारे प्राचीन वाङ्गमय में ऋषियों, महर्षियों, संतों, महापुरुषों के ऐसे अनेक कथन उपलब्ध हैं जो मानव जीवन को सच्चे अर्थों में आदर्श बनाने के लिए प्रेरक हैं, मार्गदर्शक हैं।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं:
“जननी सम जानहिं परनारी।
धनु पराव बिष तें बिष भारी।
जे हरषहिं पर सम्पत्ति देखी।
दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी।”
आशय यह कि मनुष्य के भाव हर प्रकार से सकारात्मक, परहित-चिंतन-परक होने चाहिए, इनसे विपरीत नकारात्मक भाव सर्वथा त्याज्य हैं।
सत्संगति को गोस्वामी जी सब सुखों से ऊपर बताते हैं:
“तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।”
सत्संग क्यों आवश्यक है? कबीर जी इसे और भी, बहुत सरल भाव में समझाते हैं:
“कबीर संगति साधु की, निष्फल कबहुँ न होय।
ऐसी चंदन वासना, नीम न कहसी कोय।”
आशय यह कि संतों, महापुरुषों की संगत कभी निष्फल नहीं होती है। मलयगिरि पर चंदन होते हैं, इनकी सुगंध उड़कर वहाँ खड़े नीम के पेड़ को मिलती है तो वह भी चन्दन जैसा हो जाता है, फिर उसे कभी कोई नीम नहीं कहता।
वे और भी स्पष्ट करते हैं:
“कबिरा संगत साधु की, ज्यों गन्धी की बास।
जो कुछ गन्धी दे नहीं, तो भी बास सुबास।”
संत, महापुरुष अपने पास आने वाले को ज्ञान देते ही हैं पर न भी दें तो जैसे गन्धी (इत्र वाले) के पास रहने वाले को अनायास सुगन्ध मिलती रहती है; ठीक उसी प्रकार महापुरुषों से अनायास ही अच्छी बातें, अच्छे भाव मिलते ही रहते हैं।