अपनी कविताओं के बारे में एक स्वीकारोक्ति

01-09-2026

अपनी कविताओं के बारे में एक स्वीकारोक्ति

शैलेन्द्र चौहान (अंक: 301, सितम्बर प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

मैंने कविता को कभी अपने समय से बाहर खड़े होकर नहीं देखा। जो कुछ मेरे भीतर घटता रहा, उसकी जड़ें मेरे आसपास की दुनिया में थीं—मनुष्य की बेचैनी, असमानता, अन्याय, बदलती हुई सामाजिक चेतना, राजनीतिक छल और उन छोटी-छोटी मानवीय रोशनियों में भी, जो अँधेरे के बीच बची रहती हैं। मेरे लिए कविता किसी विचार का सजावटी रूप नहीं रही। विचार यदि कविता में आया भी है तो वह अनुभव, स्मृति, बिंब और संवेदना के भीतर से आया है। इसलिए अपनी कविताओं को केवल सामाजिक या राजनीतिक कविता कह देना उनके संसार को छोटा करना होगा। उनमें समय है, लेकिन समय के साथ एक मनुष्य का अकेलापन भी है; प्रतिरोध है, लेकिन उसके भीतर करुणा और असमंजस भी है; आक्रोश है, लेकिन वह हमेशा घोषणा में बदल जाए—ऐसा मैंने नहीं चाहा।

समय के साथ मेरी कविता में भी परिवर्तन आया है। आरंभिक कविताओं में जहाँ प्रत्यक्ष सामाजिक यथार्थ और व्यवस्था से टकराव अधिक दिखाई देता है, उसकी स्पष्ट छाप मेरे आरंभिक दो कविता-संग्रहों: ‘नौ रुपये बीस पैसे के लिए’ और ‘श्वेतपत्र’—में देखी जा सकती है। इन संग्रहों की कविताओं में अपने समय की सामाजिक बेचैनी, राजनीतिक अंतर्विरोध और मनुष्य के पक्ष में खड़े होने की आकांक्षा अपेक्षाकृत प्रत्यक्ष रूप में आती है। वहाँ कविता का एक स्वाभाविक आग्रह था—अपने समय को पहचानना और उसके भीतर मौजूद असमानता, छल तथा अमानवीयता के विरुद्ध अपनी आवाज दर्ज करना।

बाद में ‘ईश्वर की चौखट पर’ में कविता का स्वर अधिक भीतर की ओर मुड़ता है। सामाजिक यथार्थ वहाँ अनुपस्थित नहीं होता, लेकिन वह प्रत्यक्ष कथन के बजाय अनुभव, प्रतीक और संकेतों के माध्यम से कविता की संरचना में प्रवेश करता है। बाहरी संसार की विडंबनाएँ धीरे-धीरे भीतर की बेचैनी, स्मृति, अकेलेपन और नैतिक प्रश्नों में बदलती हैं। यह बदलाव किसी पूर्वनिर्धारित शैलीगत प्रयोग का परिणाम नहीं था; यह बदलते हुए जीवन-अनुभव और समय को देखने की मेरी बदलती हुई दृष्टि की स्वाभाविक परिणति थी।

‘सीने में फाँस की तरह’ में ये दोनों प्रवृत्तियाँ एक-दूसरे से संवाद करती दिखाई देती हैं। सामाजिक सरोकार और आत्मानुभव, प्रतिरोध और अंतर्द्वंद्व, कथ्य और सांकेतिकता के बीच एक संतुलन बनाने की कोशिश वहाँ है। बाहरी यथार्थ अब भी कविता का आधार है, लेकिन वह भीतर की संवेदना से गुज़रकर आता है। शायद इसी कारण वहाँ सामाजिक बेचैनी अधिक निजी और निजी अनुभव अधिक सामाजिक अर्थ ग्रहण करता है।

नए आने वाले संग्रह ‘यह समय दीवारों पर गहरी होती छायाओं का है’ में इस यात्रा का एक नया पड़ाव दिखाई देता है। यहाँ सांकेतिकता केवल शिल्प नहीं, समय को देखने की एक दृष्टि बन गई है। दीवारें, छायाएँ, अँधेरा, बची हुई रोशनी, धूल, गंध, घर, मौसम और स्मृतियाँ अपने प्रत्यक्ष अर्थ से आगे जाकर हमारे वर्तमान की जटिलताओं को ग्रहण करती हैं। भय, असहमति, सामाजिक विघटन और मनुष्य के भीतर सिकुड़ती हुई जगह इन बिंबों के माध्यम से व्यक्त होती है। कविता बहुत कुछ कहती है, लेकिन सीधे कहने के बजाय पाठक को उसके अर्थ तक पहुँचने की ज़िम्मेदारी भी देती है।

मेरी कविता का एक स्थायी आग्रह मनुष्य के पक्ष में खड़े रहने का रहा है। यह आग्रह किसी नारे या विचारधारात्मक मुद्रा से नहीं, बल्कि उस मनुष्य की चिंता से पैदा होता है जो इतिहास, सत्ता, जाति, धर्म, परंपरा, बाज़ार और राजनीति के बीच लगातार छोटा किया जा रहा है। कविता मेरे लिए उसी मनुष्य की खोती हुई आवाज़ को सुनने का एक माध्यम है। लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि कविता केवल विरोध नहीं है। यदि वह केवल प्रतिरोध का दस्तावेज बनकर रह जाए तो उसकी रचनात्मक स्वतंत्रता सीमित हो जाती है। कविता को अपने भीतर संदेह बचाए रखना चाहिए—अपने विचारों के प्रति भी और अपने निष्कर्षों के प्रति भी।
आलोचनात्मक विवेक मेरे लिए इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि कविता किसी तैयार सत्य की पुनरावृत्ति न करे। वह प्रश्न पैदा करे, बेचैनी पैदा करे और पाठक को अपने भीतर लौटने के लिए विवश करे। मेरे लिए कविता का प्रतिरोध केवल ऊँची आवाज़ में नहीं, कभी-कभी एक धीमी, लगभग अदृश्य खरोंच में भी मौजूद होता है, जो पाठक के भीतर देर तक बनी रहती है।

मेरी कविताओं में प्रकृति, स्मृति, घर, मौसम, स्त्री, बच्चे, बूढ़े, शहर, गाँव, अकेलापन और रोज़मर्रा की वस्तुएँ इसलिए आती हैं कि जीवन केवल बड़े राजनीतिक प्रसंगों से नहीं बनता। एक सूखी मिट्टी की गंध, बंद खिड़की पर पड़ी धूल, आँगन में उतरती धूप या किसी पुराने स्पर्श की स्मृति भी मनुष्य के समय की गवाही देती है। कई बार कविता वहीं जन्म लेती है जहाँ हम साहित्यिक विषय की तलाश भी नहीं कर रहे होते।

समय के साथ मैंने यह भी समझा है कि कविता को हर बात कह देने की आवश्यकता नहीं। कभी-कभी एक अधूरा बिंब, एक बची हुई जगह, एक पुरानी गंध या अँधेरे में पड़ा कोई मामूली-सा निशान अपने भीतर पूरे समय का अर्थ सँजो सकता है। कविता की शक्ति कई बार उसके कहे हुए में जितनी होती है, उससे अधिक उसके अनकहे में होती है। इसलिए मेरी बाद की कविताओं में सांकेतिकता बढ़ी है, लेकिन वह यथार्थ से पलायन नहीं है। बल्कि कई बार मुझे लगता है कि जटिल और छलपूर्ण समय को सीधे कह देने की अपेक्षा उसके संकेतों, दरारों और छायाओं में पकड़ना अधिक प्रभावी है।

मैं अपनी कविताओं को उपलब्धि की तरह नहीं देखता। उनमें बहुत कुछ ऐसा है जिसे आज फिर से देखने पर मैं बदलना चाहूँगा। कुछ कविताएँ अपने समय की भाषा और संवेदना में अधिक बँधी हुई हैं, कुछ में कथन शायद ज़रूरत से अधिक स्पष्ट है, कहीं विचार कविता पर भारी पड़ा है। कहीं-कहीं संभव है कि कविता ने जितना कहना चाहिए था, उससे अधिक कह दिया हो। लेकिन यही आत्मालोचन रचना को जीवित रखता है। अपने पुराने लिखे हुए से असहमति का साहस भी रचनात्मक यात्रा का हिस्सा है।

आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि कविता लिखना दरअसल अपने ही भीतर लगातार एक आलोचक को जीवित रखना है। वह पूछता रहे—क्या यह सचमुच अनुभव है या केवल विचार? क्या यह बिंब अपने अर्थ से पैदा हुआ है या केवल सजावट है? क्या भाषा में जीवन है या केवल साहित्यिक मुद्रा? क्या कविता पाठक को कुछ देती है, या सिर्फ कवि की बेचैनी उसके सामने रख देती है? ये प्रश्न मेरी कविताओं के मूल्यांकन के प्रश्न भी हैं और मेरे अपने लेखन के प्रति जवाबदेही के भी।

मेरे लिए कविता का अंतिम अर्थ किसी निष्कर्ष में नहीं, उस बची हुई जगह में है जहाँ पाठक अपनी स्मृति, अपना दुख और अपना अनुभव रख सके। कविता यदि पाठक के लिए कोई जगह नहीं छोड़ती, तो वह कितनी भी स्पष्ट क्यों न हो, अंततः बंद पाठ बन जाती है। मैं अपनी कविता में उस खुली जगह को बचाए रखना चाहता हूँ।

‘नौ रुपये बीस पैसे के लिए’ से ‘श्वेतपत्र’, ‘ईश्वर की चौखट पर’ और ‘सीने में फाँस की तरह’ होते हुए ‘यह समय दीवारों पर गहरी होती छायाओं का है’ तक की यात्रा को मैं किसी सीधी विकास-रेखा की तरह नहीं देखता। यह बाहर से भीतर और फिर भीतर से बाहर लौटती हुई यात्रा है। आरंभिक कविताओं का प्रत्यक्ष आक्रोश बाद की कविताओं में समाप्त नहीं हुआ है; उसने अपना रूप बदला है। वह अब अधिक गहरे, अधिक संयत और अधिक सांकेतिक ढंग से उपस्थित है। सामाजिक यथार्थ अब भी मेरी कविता की जमीन है, लेकिन उसके ऊपर खड़े होकर कविता केवल समाज को नहीं, अपने भीतर के मनुष्य को भी देखती है।

मैं और मेरी कविताएँ—यह संबंध आत्मप्रशंसा का नहीं, आत्मपरीक्षण का है। विगत पाँच दशकों में मैंने जितना समय को लिखा है, उतना ही समय ने मुझे भी लिखा है। इस दौरान कविता मेरे लिए केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं रही; उसने मुझे अपने समय, अपने समाज और स्वयं अपने भीतर को देखने की एक दृष्टि भी दी है। संभव है कि मेरी कविताओं में मेरे समय की सीमाएँ, मेरी अपनी सीमाएँ और मेरे अनुभव की अपूर्णताएँ भी दर्ज हों। उन्हें छिपाना नहीं, स्वीकार करना ही शायद इस आत्मस्वीकृति का सबसे ईमानदार हिस्सा है।
मेरी कविताएँ उसी लंबे संवाद की अधूरी, अस्थिर और लगातार बदलती हुई पांडुलिपि हैं—एक ऐसा संवाद जिसमें कवि अपने समय से भी सवाल करता है और स्वयं से भी।
और यदि उनमें कुछ बचा रहना चाहिए, तो वह मेरा नाम नहीं—मनुष्य की वह हल्की-सी आवाज़ है, जो अँधेरे में भी पूरी तरह चुप नहीं होती।

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