गाँधी का दर्शन और डॉ. विजय बहादुर सिंह की साहित्यालोचना
शैलेन्द्र चौहान
गाँधी दर्शन भारतीय आधुनिकता की उस नैतिक धारा का प्रतिनिधित्व करता है, जो राजनीति, समाज और संस्कृति को मनुष्य की गरिमा, सत्य और अहिंसा के आधार पर पुनर्परिभाषित करती है। यह दर्शन केवल ऐतिहासिक या राजनीतिक परिघटना नहीं है, बल्कि एक जीवंत नैतिक विवेक है, जिसने भारतीय बौद्धिक परंपरा—विशेषतः साहित्य और आलोचना—को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है। हिंदी साहित्यालोचना में डॉ. विजय बहादुर सिंह का कार्य इस प्रभाव का एक सशक्त और विवेकपूर्ण उदाहरण है। उनकी आलोचना गाँधीवादी नैतिकता से प्रेरित होकर सौंदर्य, विचार और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच एक सृजनात्मक संतुलन स्थापित करती है।
गाँधी दर्शन का केंद्रीय आग्रह सत्य, अहिंसा, स्वराज और साधन–शुद्धता पर है। साहित्य के संदर्भ में यह आग्रह रचना को केवल कलात्मक कौशल की वस्तु नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज के प्रति उत्तरदायी कर्म के रूप में देखता है। गाँधी के लिए कला का मूल्यांकन उसके नैतिक प्रभाव से अलग नहीं किया जा सकता—यह दृष्टि साहित्य को सत्ता, हिंसा और अमानवीकरण के विरुद्ध प्रतिरोध का औज़ार बनाती है। यही दृष्टि डॉ. विजय बहादुर सिंह की आलोचना में एक अंतर्धारा की तरह प्रवाहित होती है।
डॉ. विजय बहादुर सिंह की आलोचना की प्रमुख विशेषता है—मानवीय संवेदना की केंद्रीयता। वे साहित्य को जीवन से काटकर नहीं देखते; उनके लिए रचना का मूल्यांकन सामाजिक यथार्थ, ऐतिहासिक चेतना और नैतिक विवेक के समन्वय से होता है। यह समन्वय गाँधीवादी सोच से गहराई से जुड़ा है, जहाँ व्यक्ति और समाज के द्वंद्व को सुलझाने का मार्ग नैतिक आत्मसंयम और करुणा से होकर जाता है। उनकी आलोचना में यह करुणा किसी भावुकता में नहीं ढलती, बल्कि विवेकपूर्ण तर्क और ऐतिहासिक बोध के साथ उपस्थित रहती है।
गाँधी दर्शन का एक महत्त्वपूर्ण आयाम है—साधन और साध्य की एकता। साहित्यालोचना में इसका अर्थ है कि आलोचक की भाषा, दृष्टि और पद्धति भी उसी नैतिक धरातल पर खड़ी हो, जिस पर वह रचना को परखता है। डॉ. विजय बहादुर सिंह की आलोचना इस अर्थ में अनुशासित और आत्मालोचनात्मक है। वे फ़ैशनेबल सिद्धांतों के अंधानुकरण से बचते हैं और आलोचना को सत्ता-समर्थक या प्रचारक बनने नहीं देते। उनकी आलोचना में प्रतिरोध है, पर वह हिंसक नहीं; असहमति है, पर वह विनाशकारी नहीं—यह अहिंसक प्रतिरोध की गाँधीवादी परंपरा का ही विस्तार है।
आधुनिक हिंदी साहित्यालोचना में अक्सर यह देखा गया है कि सैद्धांतिक आग्रह—मार्क्सवाद, संरचनावाद, उत्तर-आधुनिकता—कभी-कभी रचना की मानवीय ऊष्मा को दबा देते हैं। डॉ. विजय बहादुर सिंह इस ख़तरे के प्रति सजग हैं। वे विचारधाराओं का उपयोग उपकरण की तरह करते हैं, लक्ष्य की तरह नहीं। यह संतुलन गाँधीवादी व्यावहारिकता से मेल खाता है, जहाँ सिद्धांत जीवन की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। उनके यहाँ आलोचना जीवन-विमुख नहीं, बल्कि जीवनोन्मुख है—यह साहित्य को जनता के अनुभवों से जोड़ती है, बिना उसे नारेबाज़ी में बदले।
गाँधी दर्शन का प्रभाव डॉ. विजय बहादुर सिंह की आलोचना में इतिहास-बोध के रूप में भी दिखाई देता है। गाँधी ने परंपरा को जड़ नहीं माना; उन्होंने उसमें आत्मालोचन की सम्भावना देखी। इसी तरह डॉ. सिंह परंपरा और आधुनिकता के बीच संवाद स्थापित करते हैं। वे न तो परंपरा के अंध-समर्थक हैं, न आधुनिकता के अंध-विरोधी। उनकी आलोचना में तुलसी, कबीर, प्रेमचंद से लेकर समकालीन रचनाकारों तक एक निरंतर नैतिक और सौंदर्यात्मक संवाद चलता है—यह संवाद गाँधीवादी समन्वय की ही आलोचनात्मक अभिव्यक्ति है।
इसके साथ ही, डॉ. विजय बहादुर सिंह की भाषा-शैली में भी गाँधी दर्शन की छाया दिखाई देती है। उनकी आलोचना की भाषा न तो दुरूह अकादमिक जटिलता में फँसती है, न सरलीकरण के नाम पर विचारहीन हो जाती है। यह भाषा पाठक के साथ संवाद करती है—स्पष्ट, संयत और तर्कपूर्ण। गाँधी की तरह वे भी संवाद को संघर्ष का विकल्प मानते हैं; आलोचना उनके यहाँ संवाद की नैतिक प्रक्रिया है।
निष्कर्षतः, गाँधी दर्शन और डॉ. विजय बहादुर सिंह की साहित्यालोचना के बीच सम्बन्ध प्रभाव का नहीं, आत्मसात का है। गाँधी उनके लिए कोई बाहरी आदर्श नहीं, बल्कि आलोचनात्मक चेतना का आंतरिक नैतिक स्रोत हैं। इस कारण उनकी आलोचना न तो समयातीत नैतिक उपदेश बनती है, न समकालीन फ़ैशन का ग़ुलाम। वह एक ऐसी आलोचना है जो साहित्य को मनुष्य की मुक्ति, संवेदना और ज़िम्मेदारी से जोड़ती है—और यही गाँधी दर्शन की सबसे गहरी और स्थायी साहित्यिक विरासत है।
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