प्रेम है कि बँधना नहीं जानता

15-03-2026

प्रेम है कि बँधना नहीं जानता

प्रवीण कुमार शर्मा  (अंक: 294, मार्च द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

जीवन अपूर्ण है
तभी सुन्दर है। 
जीवन अनिश्चित है
तभी अमूल्य है। 
इसी तरह प्रेम है
पूर्णता पाकर यह
अपना आकर्षण खो देता है। 
प्रेम अपूर्ण है तभी तक प्रेम है
पूर्ण होते ही वह रिश्ता बन जाता है
और रिश्ते तो ज़िम्मेदारी होते हैं। 
ज़िम्मेदारी शब्द जुड़ते ही प्रेम
बँध जाता है और मोह का रूप ले लेता है। 
प्रेम है कि बँधना नहीं जानता
इसलिए उसे किसी रिश्ते में न फँसाकर
प्रेम ही रहने दें तो बेहतर है। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
कहानी
लघुकथा
सामाजिक आलेख
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में

लेखक की पुस्तकें