बाड़ाखुर्द एक प्राचीन क़स्बा है। इसकी बसाहट भी तद्‌नुरूप है; हर समुदाय की बस्ती कुछ  अलग-अलग।

क़स्बे में जहाँ पर ठाकुरों की बस्ती ख़तम होती है वहाँ एक चौराहा है। यहीं पश्चिम की ओर जाने वाले खण्डा रोड के किनारे-किनारे अनुसूचित जातियों में परिगणित एक समुदाय विशेष की बस्ती है।

चौराहे के पास एक सार्वजनिक कुआँ है। आसपास के सभी लोग इस पर पानी भरते हैं। लगभग एक साल भर पहले सरकार ने  कुएँ का जीर्णोद्धार करा दिया है सो कुएँ की ख़ूबसूरती अब देखते ही बनती है। जगत अतीव सुंदर व चिकनी है। चारों घाट भी नयनाभिराम है। कुएँ के पास ही रहने वाले 85 वर्षीय ठाकुर जगतसिंह अक्सर कुएँ की जगत पर आ बैठते हैं।

सड़क के इस पार अनुसूचित जाति के जिस समुदाय की बस्ती है उसमें एक लड़का निर्भयसिंह है। नाम के अनुरूप निडर, मनमौजी है पर बातचीत में काफ़ी शालीन है। ठाकुर जगत सिंह का पुत्र रिपुदमन सिंह उसका सहपाठी है, मित्र भी है।

निर्भयसिंह बचपन से ही देखता आ रहा है कि कुएँ पर से जब ठाकुर समुदाय के लोग पानी भरते हैं तब उसके समुदाय के लोग पानी नहीं भरते हैं। और जब उसके समुदाय के लोग पानी भरते हैं तब ठाकुर समुदाय के लोग पानी नहीं भरते हैं। यदि कभी-कभार उसके समुदाय के व्यक्ति द्वारा पानी भरे जाने के दौरान अपरिहार्य आवश्यकता के कारण ठाकुर समुदाय के किसी व्यक्ति को पानी भरने आना पड़ता है तो वह उसके समुदाय के व्यक्ति से कहता है– फलाने ज़रा अपने घड़े आदि कुएँ से हटाकर अलग हो जाओ, मुझे 'अर्जेंट' में पानी भरना है, मेरे बाद तुम भर लेना।" जिससे कहा जाता है वह बात मान भी लेता है।

एक दिन निर्भयसिंह ने ठाकुर जगतसिंह से पूछ लिया- "कक्का जब कोई ठाकुर कुएँ पर पानी भरने आता है तो मेरी बिरादरी के व्यक्ति को और उसके घड़ों को कुएँ से हटवा क्यों देता है, वह कुएँ के दूसरे ख़ाली वाले घाट से भी तो पानी भर सकता है।"

जगतसिंह ने समझाया, "निर्भय तुम बड़े अवश्य हो गए हो पर अभी भी नासमझ ही हो। ...अगर तुम्हारी बिरादरी  द्वारा कुएँ से पानी भरने के दौरान ठाकुर भी अपने घड़े कुएँ पर रख लेगा, तो उनमें "छोत"(अस्पृश्यता) नहीं लग जायेगी।"

निर्भय सन्न रह गया। ..."छोत" की यह बात उसके अंतर्मन में समा गई।

एक दिन की बात है, शाम का समय था, ठाकुर जगतसिंह कुएँ की जगत पर पाल्थी मारे बैठे थे। उसी समय निर्भयसिंह अपने दोनों हाथों में घड़े और कंधे पर लेज (पानी खींचने की रस्सी) लेकर कुएँ पर पानी भरने पहुँचा।

ठाकुर साहब को कुएँ की जगत पर बैठा हुआ देखकर उनसे बोला, "कक्का थोड़ा कुएँ से दूर हट जाइये, मुझे पानी भरना है; मैं पानी भर लूँ तो आप फिर बैठ जाना।"

ठाकुर साहब आँखें तरेरते हुए बोले, "तो भर न पानी, चारों घाट ख़ाली तो पड़े हैं।"

निर्भय सपाट स्वर में कहता है, "कक्का आपके कुएँ पर बैठे रहने पर यदि मैं अपने घड़े कुएँ पर रखूँगा तो उनमें आपकी "छोत" नहीं लग जायेगी?...हट जाइये प्लीज़ कक्का।"

अब ठाकुर साहब की स्थिति ऐसी कि काटो तो खून नहीं।

थोड़ी ही दूरी पर खड़े रिपुदमन सिंह ने निर्भय और अपने पिता का यह संवाद सुन लिया, बोला, "निर्भय बुज़ुर्गों से इस तरह की फ़ालतू बातें कहने में क्या मिलता है तुम्हें?"

निर्भय मुस्कुराय, "सुकून।"

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