यवनिका

अनिमा दास (अंक: 301, जुलाई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

(सॉनेट)
 
निशीथ की निविड़ता में मायाविनी अरण्या 
समस्त आवेगों की महानदी, अव्यक्त अवर्ण्या 
पर्णपटल पर अंकित रिक्तता के रक्तिम अक्षर 
अस्पृश्य है वर्तमान, प्रतित प्रश्न का प्राक प्रस्तर
 
प्राजक्ता का प्रेम केवल निशार्ध की नहीं नियति 
अंतिम महोदधी की परिधि में आबद्ध स्वीकृति 
तिल मात्र व्यथा में क्षताक्त यह सुदीर्घ अंतराल 
केवल नहीं है स्वप्नहीन निद्रा का अंतहीन काल 
 
काम्य है अनृत मुहूर्त की . . . एक अदिष्ट अभीप्सा 
अपहृत यौवन के अर्धजीवित श्वास की प्रतीक्षा 
अग्नि-पुष्प के प्रणय में, दग्ध होता विछिन्न विरह 
कहो, तरंगित तृषा में क्यों है मरीचिका निवह?
  
मुग्धगंधा के पक्ष्म पर है मेघप्रिया की मधुलिका 
आह! हो रही अवनत शेष अभिनय की यवनिका।

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