सूक्ष्म अनुभूतियों की रश्मियों से निस्सृत वृहद विचार—कब टूटेंगी चुप्पियाँ

15-07-2026

सूक्ष्म अनुभूतियों की रश्मियों से निस्सृत वृहद विचार—कब टूटेंगी चुप्पियाँ

अनिमा दास (अंक: 301, जुलाई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)


पुस्तक: कब टूटेंगी चुप्पियाँ (दोहा- संग्रह)
लेखक: डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोएडा
पृष्ठ संख्या: 103
मूल्य: ₹299

दोहा शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में डॉ. शैलेष ने अपने संग्रह में विस्तार से वर्णन किया है। हिंदी काव्य विधा में दोहा छंद का विशेष स्थान रहा है। दोहे का स्वर्ण युग भक्ति काल (14वीं से 17वीं शताब्दी) में आया। इस काल में दोहा केवल एक साहित्यिक छंद नहीं रहा, अपितु लोक-चेतना का सशक्त माध्यम बन गया। रीतिकाल (17वीं से 19वीं शताब्दी) में दोहे का रूप-परिवर्तन हुआ। इसमें शृंगार तथा कलात्मकता का समावेश हुआ। इस कालखंड में दोहे केवल उपदेशात्मक न रहकर कला एवं शृंगार की दिशा में रचे गए।

यह विधा भारतीय संस्कृति की अभिव्यक्ति का आधार भी बनी। इसकी मुख्य विशेषता यह रही कि संतों, कवियों तथा सिद्धों ने अपने धार्मिक, दार्शनिक एवं नैतिक विचारों को साधारण जनता तक पहुँचाने के लिए इस लघु विधा को भाव-संप्रेषण का आधार बनाया, जो छंदबद्धता, लयात्मकता तथा गेयता के गुणों से परिपूर्ण थी। डॉ. शैलेष ने पुस्तक के मुखबंध में दोहे के अनेक महाकवियों का उदाहरण देते हुए कबीर, तुलसीदास, रहीम एवं बिहारी इत्यादि के नामों का विशेष रूप से उल्लेख किया है।

अल्प शब्दों, दो पंक्तियों तथा 48 मात्राओं में सृजित होने वाली इस लघु विधा में अत्यंत गूढ़ एवं महत्वपूर्ण विचार समाहित होते हैं। समकालीन दोहों में अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक तथा अन्य अव्यवस्थाओं का चित्रण उपयुक्त बिम्बों, प्रतीकों तथा संकेतों से युक्त गूढ़ कथ्य के माध्यम से किया गया है, जिसने जन-समाज को शिक्षित करने एवं नीति-अनीति से अवगत कराने का कार्य किया।

तदनुरूप, डॉ. शैलेष ने भी वर्तमान समाज की स्थिति को संपूर्ण नैतिकता के साथ परिलक्षित किया है एवं अपने विचारों को दोहों के रूप में संप्रेषित किया है। इस संग्रह के समस्त दोहे सामयिक परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए आकार लेते हैं। सत्य इस संग्रह का कथ्य है, शब्द इसकी आत्मा है एवं भाव इसका अंतःस्वर है। जिस धारा में यह जीवन बहता है, उसमें कई बाधाएँ इसके स्रोत में विलीन भी हो जाती हैं, किंतु जीवन के मूलभूत समीकरणों का परिवर्तन नहीं होता। सूक्ष्म अनुभूतियों की रश्मियाँ इस संग्रह को एक आत्मिक परिचय देती हैं।

प्रथम दोहे में कवि कहते हैं: 

पढ़कर वे दो पोथियाँ, कथा रहे हैं बाँच
ख़ुद को हीरा कह रहे, रंग-बिरंगे काँच।

इस दोहे में रंग-बिरंगे काँच व हीरे के बिम्ब का सुंदर प्रयोग किया गया है। इसके माध्यम से कवि ने उन लोगों पर तीखा कटाक्ष किया है, जो अल्प ज्ञान पाकर ही स्वयं को परम ज्ञानी अथवा स्रष्टा घोषित करने लगते हैं।

मानवीय संबंधों की संवेदनशीलता को स्पर्श करता यह दोहा दृष्टव्य है:

सम्बन्धों के पृष्ठ पर, जमी समय की गर्द। 
नेह अचानक खो गया, हिस्से आया दर्द॥

इस दोहे में कवि ने मानवीय सम्बन्धों में व्याप्त होते एकाकीपन एवं समय के साथ लुप्त होते प्रेम की मर्मान्तक पीड़ा को अत्यंत भावुकता के साथ व्यक्त किया है।

न्याय व्यवस्था एवं सत्य की स्थिति को रेखांकित करते हुए वे लिखते हैं:

सच्चाई की साख पर, बट्टा लगा न रंच
झूठ अदालत में खड़ा, रचता रहा प्रपंच

इस दोहे में कवि ‘बट्टा’, ‘रंच’ और ‘अदालत’ जैसे यथार्थवादी बिम्बों के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि असत्य चाहे जितना भी छल कर ले, वह सत्य की पवित्रता तथा प्रतिष्ठा को धूमिल करने में अंततः असफल ही रहता है।

कवि के मन के कई प्रश्नाकुल दुःख, विचलित विचार एवं आक्रोश जीवंत बिम्बों को धारण करते हुए उनके शिल्प को श्रेष्ठ ही नहीं, अपितु स्मरणीय बना देते हैं। वर्तमान की राजनीतिक स्थिति से कवि का मन व्यथित है। उनका हृदय उन घटनाक्रमों से विमुख नहीं हो सकता, जो अतीत में घटित होते थे एवं वर्तमान में भी घटित हो रहे हैं। इन संवेदनशील विचारों पर आधारित उनके दोहे केवल सत्य को उजागर नहीं करते, अपितु समाज को दर्पण भी दिखाते हैं। उदाहरण स्वरूप:

पूछा हमने जब कभी, क्यों हलधर लाचार
चुप्पी ओढ़े मीडिया, मौन मिली सरकार।

निरुत्तर व्यवस्था का यह दुखद चित्रण वास्तव में शोचनीय है। कवि ने अत्यंत सरल शब्दों में सम्पूर्ण विवरण प्रस्तुत कर दिया है।

भ्रष्टाचार एवं पतनशील मूल्यों पर प्रहार करता एक और दोहा:

प्रतिभाएँ लाचार हैं, रिश्वत गाती गीत
कल मयूर के सामने, कौआ नाचा मीत।

इस दोहे में कवि ने योग्यता के दमन एवं भ्रष्टाचार के प्रभाव को दर्शाने के लिए ‘लाचार प्रतिभा’, ‘गीत गाती रिश्वत’ तथा ‘मयूर के सामने नाचते कौए’ के अत्यंत सजीव बिम्बों का प्रयोग किया है। यहाँ ‘मयूर’ एवं ‘कौआ’ क्रमशः समाज के योग्य व्यक्ति एवं चाटुकार (अयोग्य व्यक्ति) के प्रतीक बनकर दृश्य बिम्ब के रूप में उभरते हैं। इन बिम्बों के माध्यम से कवि कहते हैं कि वर्तमान व्यवस्था में भ्रष्टाचार के कारण वास्तविक प्रतिभाएँ विवश तथा उपेक्षित हैं, जबकि अयोग्य व्यक्ति धन के बल पर सम्मानित होकर श्रेष्ठता के शिखर को स्पर्श कर रहे हैं।

नारी सुरक्षा एवं सामाजिक मौन पर कवि का विक्षोभ इस दोहे में झलकता है:

मैना पड़ी अचेत है, सहमा है परिवार
चुप है सारा मीडिया, चुप है जिम्मेदार।

इस दोहे के माध्यम से कवि समाज में व्याप्त घोर संवेदनहीनता एवं तंत्र की अकर्मण्यता पर गहरा रोष प्रकट करते हैं। ‘मैना’ और ‘सहमे परिवार’ के करुण बिम्ब के प्रयोग से यह दोहा अत्यंत प्रभावी हो जाता है। यह उस समाज का असहनीय सत्य है जहाँ नारी को देवी रूप में पूजा तो जाता है, परंतु वह किसी भी आयु में सम्पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं है।

डॉ. शैलेष वर्तमान की राजनीतिक व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं: 

पहनेंगे अब कोट सब, खाएँगे अखरोट
चीलों के इस दाँव पर, बरस रहें हैं वोट।

पर्यावरण संकट एवं आधुनिकता की विसंगतियों को रेखांकित करते हुए एक बहुत ही सुंदर एवं हृदय को उद्वेलित करता दोहा:

जंगल-जंगल पुर बसे, गये सरोवर सूख
तरह-तरह की व्याधियाँ, मिटी न मानव भूख।

इस दोहे में कवि शहरीकरण का एक सशक्त बिम्ब प्रस्तुत करते हैं कि कैसे हरे-भरे जंगलों को काटकर वहाँ कंक्रीट के शहर (पुर) बसाए जा रहे हैं। ‘सूखते सरोवर’ के बिम्ब के माध्यम से उन्होंने जल संकट एवं प्राकृतिक संसाधनों के निरंतर दोहन का मर्मस्पर्शी चित्रण किया है। यह दोहा प्रकृति के क्रंदन एवं जीवन के आधार के समाप्त होने की भयावहता को दिखाता है। यह मानवीय लालच के दुष्परिणामों का सटीक बिम्ब है। यहाँ ‘व्याधियाँ’ प्रकृति के विनाश का परिणाम हैं, और ‘मानव भूख’ केवल शारीरिक क्षुधा नहीं, अपितु मनुष्य की कभी न समाप्त होने वाली भौतिकवादी एवं वैचारिक तृष्णा का प्रतीक है।

इसी क्रम में यह दोहा भी उल्लेखनीय है: 

सुने पेड़ ने पास ही, बतियाते दो लोग
पूरा बाग़ उजाड़कर, लायेंगे उद्योग।

प्रकृति को निरंतर नष्ट करता क्रूर मानव अपने लिए स्वयं ही विनाशलीला रच रहा है। शहरीकरण ने संपूर्ण वातावरण को किस प्रकार दूषित किया है, इसका सजीव चित्रण करते हुए डॉ. शैलेष अपनी व्यथा को इन शब्दों में अभिव्यक्त करते हैं:

मॉल खुला कैसे यहाँ, गया कहाँ तालाब
शहर बख़ूबी जानता, देता नहीं जवाब।

वर्तमान समय में मोबाइल के अत्यधिक दुरुपयोग से कोमल मन पर जो कुप्रभाव पड़ रहा है तथा उसके परिणाम जितने भयंकर हो रहे हैं, उसे दर्शाते हुए वे इस अत्यंत संवेदनशील दोहे में लिखते हैं: 

मोबाईल पर खेलते, बच्चे हैं अनजान
कैसे उनका हो रहा, बचपन लहूलुहान।

यह अत्यंत मार्मिक भाव है। माता-पिता जानते हैं कि उनकी संतान उनके लिए क्या महत्व रखती है, परंतु इस डिजिटल परिवेश की स्थिति पर आज उनका कोई नियंत्रण नहीं रह गया है।

किसानों की अत्यंत दयनीय एवं संवेदनशील स्थिति पर वे कहते हैं:

इच्छाओं पर अतिक्रमण, सपनों पर आघात
सदियों से बदले नहीं, हलधर के हालात।

विलुप्त होती जैव-विविधता एवं प्रकृति प्रेम को दर्शाता एक और मार्मिक दोहा:

आएगी अब लौटकर, बची नहीं है आस
गौरिया की याद में, रहता पेड़ उदास।

डॉ. शैलेष इतनी विसंगतियों एवं विद्रूपताओं को देखते एवं सहन करते हुए भी एक सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। वे समाज में परिवर्तन की आशा रखते हुए कहते हैं:

कलुष कहीं होगा नहीं, होगी केवल प्रीत
लिखती रहना लेखनी, मानवता के गीत।

वास्तव में डॉ. शैलेष ने अपने समस्त दोहों में आधुनिकता के कुप्रभाव से निर्मित हुई विकृतियों का ऐसा दृश्य बिम्बित किया है, जो पाठकों को आत्म-मंथन के चक्रव्यूह में बाँधकर रखता है। वर्तमान समय भले ही प्रतिकूल, नैराश्यपूर्ण एवं अंतर्दाह से युक्त हो, जहाँ मनुष्य अपने निजी स्वार्थ हेतु मर्यादाओं का उल्लंघन तथा चरित्र का हनन कर रहा है; परंतु यह संग्रह इन विसंगतियों पर कठोर प्रहर करता है। इसमें प्रत्येक दोहा विकृत मानसिकता, असामाजिक व्यवस्था, राजतंत्र के भ्रष्टाचार तथा निरीह किसान एवं स्त्री पर होते शोषण का मर्मस्पर्शी चित्रण करता है।
पुस्तक का शीर्षक, ‘कब टूटेंगी चुप्पियाँ’ वास्तव में एक सार्थक वैचारिक मंथन को दिशा प्रदान करता है। जब हम मौन रहते हैं, तब अत्याचारी अतिशय मुखर, साहसिक तथा निडर हो जाता है। अतः मौन के इस वलय को ध्वस्त करते हुए हमें भी कलुषता का विरोध करना होगा ताकि इस पृथ्वी तथा जीवन को सुरक्षित रखने में हम सक्षम हो पाए । संघर्ष प्राणी का जन्मजात गुण है; यदि संघर्ष करना ही है तो अन्याय के विरुद्ध कीजिए एवं न्याय का दीपक प्रज्ज्वलित कीजिए।

देश-विदेश में प्रख्यात लेखक, कवि, क्षणिकाकार तथा उत्कृष्ट दोहाकार डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ ने इस संग्रह में अनैतिक दुर्भावनाओं को विराट रूप लेते देखकर मानो अपनी लेखनी को अश्रुपूर्ण शब्दों एवं संवेदना की पंक्तियों से सींच दिया है। उनके समस्त दोहे समाज को एक स्वस्थ मानसिकता की ओर ले जाते हैं। उन्होंने निडर एवं निर्भय होकर कई प्रासंगिक विषयों पर अद्भुत बिम्बों की सहायता से मन के उद्गारों को लिपिबद्ध किया है। सहज एवं सरल शब्द तथा भाषा के प्रयोग से समस्त दोहे बोधगम्य भी हैं। उनकी इस ईश्वर-प्रदत्त लेखनी को सहस्र साधुवाद। पूर्ण विश्वास है कि यह संग्रह सभी वर्ग के पाठकों को उत्कृष्ट एवं स्वस्थ समाज के निर्माण हेतु प्रेरित करते हुए   अविनाशी सत्य को ग्रहण करने की क्षमता प्रदान करने में समर्थ होगा व लोकप्रियता के शिखर को छुएगा।

समीक्षा: अनिमा दास
सॉनेटियर 
कटक, ओड़िशा

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