आशावरी
अनिमा दास
(सॉनेट)
जिस मरु की अपेक्षा में, प्रत्येक ग्रीष्म को किया है आमंत्रित
आयुकाल के प्रत्येक श्रावण ने किया है तप्त मरुथल एकत्रित
उसी मरुथल का बन शाद्वल तुम, धमनियों को किया जीवंत
निष्प्रभ नक्षत्र सा था सत्व मेरा, करती स्पर्श अब विद्युत् अनंत
निद्रा रहित निशा के मौन संगीत में, श्वासरुद्ध होती थी क्षिति
स्वप्न-तल्लीन प्रहर में पक्ष्म होते थे रिक्त, थी आशाओं की इति
बन आशावरी तुम गूँजते हो अब, पल्लवित हुई है ऊसर भूमि
शशि-किरण सा रजतमय है जीवन, कामनाएँ हैं अर्णवी- उर्मि
गूँथ कर शब्दों को किया था सृजित कभी व्यथा की वाटिका
प्रत्येक पुष्प में थी कृष्णिमा, लतिकाएँ थी जैसे मृत कोशिका
उस वाटिका में तुम बन मयूख, किया अंकुरित शृंगार सुमन
माधविका से पूर्ण है, सुरभित है अब मेरा रास-झंकृत उपवन
नहीं, अब नहीं है इच्छा शून्य ग्रह की, मौन मृत्यु की, प्रलय की
स्यात्, प्रतीची के प्रतिबिम्ब में न हो.. रक्तजबा की अग्नि सी।
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