नोना बेबी ‘पोपोव’

01-07-2026

नोना बेबी ‘पोपोव’

डॉ. वीणा विज ’उदित’ (अंक: 300, जुलाई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

जैसे ही कार घर के गेट के भीतर दाख़िल हुई, उसकी झलक देखते ही मेरा चेहरा खिल उठा। मैं अमेरिका से लौटी थी पाँच महीने पश्चात्। वहाँ बेटे के घर पहली संतान हुई थी। कार का पिछला गेट खुलते ही वह मेरे पास आने को हुआ और मेरे मुँह से निकला ‘नोना बेबी’! वह झट दूसरी ओर चला गया। कार से उतरकर मैं उसके पास गई, तो वह और बिदक गया। ओफ्फोह! यह तो मुझसे रूठा हुआ लग रहा है। मेरे पास आना चाह कर भी मेरे पास नहीं आ रहा है। नहीं तो अभी तक इसने उछल कर मेरे कंधे तक आ जाना था। मैं जब भी कभी बाहर जाती थी तो उसके हाथ पर ‘थू’ कर के जाती थी। और ज़ोर से उसे सुनाती थी कि मुझे मिस मत करना। पीछे से बीमार मत होना। इस बार मैं उसे बाय करके नहीं गई थी। तभी तो वह रूठा था। सच में मुझसे भूल हो गई थी। मैंने उसके पास जाकर सॉरी! सॉरी! बोला। नोना बेबी! बोलकर उसे प्यार से सहलाया और दुलारा। उसका मुँह दोनों हाथों में लेकर उसकी गर्दन, माथे और ललाट पर बालों पे हाथ फेरा। उसके गले के पट्टे के नीचे प्यार किया और अपनी गोद में ले लिया। अब उसे चैन मिल गया था। उसकी दो इंच की पूँछ तेज़ी से हिल रही थी। अपनी जीभ से वह मेरा हाथ और बाँह चाट रहा था। मैंने भी उसे खुली छूट दे दी थी। सारे लाड़ लड़ाकर बाद में जाकर अपने हाथ, बाँह साबुन से हमेशा की तरह धो लिए थे।

नोना बेबी! नोना बेबी! मेरे लाड़-प्यार के स्वर में सुनने को ही शायद वह बेचैन था! यह मूक, निरीह प्राणी भौं-भौं करके अपना भाव प्रकट करता और पूँछ हिलाकर धन्यवाद देता। लेकिन अब उसकी प्रतीक्षा समाप्त हो गई थी, वह शांत होकर मेरे पाँव के पास लेट सा गया था उसका मुँह मेरे एक पैर और चप्पल के ऊपर था। वह अपने ढंग से मेरा सानिध्य पा रहा था। इधर मैं अब बाक़ी बच्चों से मिल रही थी। मेरी एक वर्ष की नातिन भीतर सो रही थी। जैसे ही उसके उठकर रोने की आवाज़ आई, तो उसका रुदन सुनकर वह ज़ोर-ज़ोर से कभी मुझे तो कभी उसकी माँ को भौंकने लगा। बेचैन हो गया कि उसे जल्दी उठाओ। कभी हमारे पास आता तो कभी उसके दरवाज़े के पास जाता। उसे गोदी में लेकर हम प्यार कर रहे थे, तो वह जब तक हँसती-खेलती रही वह भी पास खड़ा रहा। फिर वहीं लेट कर देखता रहा। मानो घर का कोई बड़ा-बूढ़ा हो, जिसे सबकी चिंता हो। परिवार के सभी सदस्यों से वह भरपूर प्यार लेता। उस रात मैं उसके ख़्यालों में डूबी सात वर्ष पीछे चली गई थी . . .

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हमारी शादी की पच्चीसवीं सालगिरह आ रही थी, तो बच्चों ने कहा कि आप लोग कोई पार्टी-वार्टी नहीं करना कृपा करके। आप दोनों गोवा घूम आओ और अपने अतीत को वहाँ के नज़ारों में बैठकर पुनर्जीवित कर मस्ती में जी लो जाकर। ख़्याल बुरा नहीं था। तो लो जी, हम गोवा चले गए। सच में जीवन को हमने एकदम नए ढंग से वहाँ तरह-तरह के समुद्री तटों पर हर दिन जाकर जिया! प्रकृति को निहार उसमें ‘अज’ को महसूस करना वह भी फ़ुर्सत में हमें उद्वेलित कर रहा था। समुद्री तटों पर लहरों के साथ अठखेलियाँ करना उल्लास की चरम सीमा थी। जब नंगे पाँवों के नीचे से रेत खिसकती थी, वह आलौकिक गुदगुदी सारे बदन में सिहरन भर देती थी। इस पर तुर्रा यह था कि हम नरगिस-राज कपूर के रोमांटिक डुएट गाने गाकर मस्त होते रहे थे। हम दोनों की पसंद एक जैसी थी। एक हफ़्ता कब बीत गया मालूम ही नहीं हुआ। वापसी वास्कोडिगामा से मुंबई तक पानी के हवर्स जहाज़ से हो रही थी, जो पानी की लहरों के ऊपर चलता है। यह भी एक नया अल्हादकारी अनुभव था।

जैसे ही हम घर पहुँचे तो देखा, बेटे के हाथ में एक टोकरी थी छोटी सी। जिसे उसने केन के हैंडल से पकड़ा था और उसमें एक ब्लैक एंड व्हाइट कुत्ते का बहुत सुंदर सा फ़्लफ़ी स्टफ़ टोय था। बिटिया ने हमें प्यार किया और बेटे ने, ” हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी!” कहते हुए वह टोकरी मेरे हाथ में दे दी, तो उस स्टफ़्ड टॉय ने गर्दन हिला कर मुझे देखा। तो मैं हर्ष से चहकी, “अरे यह तो जीवित खिलौना है!”

तभी बेटे ने कहा, “हाँ मामा, यह पोपोव है। आप दोनों की सिल्वर मैरिज एनिवर्सरी का तोहफ़ा! चंडीगढ़ से लाया हूँ अभी यह केवल दो महीने का है।”

“इतना बढ़िया तोहफ़ा! तूने तो कमाल कर दिया। थैंक्स बेटा,” और मैंने बेटे को प्यार से गले लगा कर छाती से भींच लिया।

फिर उसने बताया, “इसकी माँ का नाम भी पोपोव है माँ! उसने दो पिल्ले जने थे। एक उस जैसा ही व्हाइट और ब्राउन था और यह दूसरा काला और सफ़ेद। देखो न माँ, इसके माथे पर सफ़ेद तिलक लगा हुआ है और जबड़े पर भी सफ़ेदी है। यह बहुत सुंदर है जैसे किसी ने सोच-सोच कर इसके रंग ब्लैक एंड व्हाइट पेंट करे हैं।”

वह सच कह रहा था।

“पापा, यह बहुत ही महँगी नस्ल है। और बहुत कम पाई जाती है इसे ‘स्प्रिंगर स्पैनियल’ नस्ल कहते हैं। जूनियर बुश (जो अमेरिका के प्रेसिडेंट थे) के पास भी यही नस्ल है। (उसे यह बताते हुए अपनी पसंद पर अभिमान हो रहा था) मेरे जिगरी दोस्त के पास ही वह सीनियर पोपोव (इसकी माँ) है! मैं इसे उसी से लाया हूँ। इसकी फ़ैमिली हिस्ट्री भी है।”

पोपोव बहुत ही ख़ूबसूरत कुत्ता था। उसके खड़े होने पर उसके काले लंबे-लंबे कान ज़मीन को छूते थे। उसके सामने का भाग पूरा सफ़ेद रेशम जैसा और पीठ काली थी। और जब वह ख़ुश होता था तो उसकी छोटी सी काली पूँछ एक इंच की ज़ोर से हिलती थी। वह अन्य कुत्तों से भिन्न था। जहाँ भी जाता, सबका ध्यान उसकी ओर आकर्षित होता था। अभी तो वह छोटा सा एक चाबी वाला खिलौना लगता था। मैंने देखा बिटिया तन्वी उसे अपने साथ पलंग पर सुला रही थी। तब मैंने तो अगले ही दिन एक टोकरी में एक कुशन रखकर उस पर छोटा सा मेज़पोश बिछाकर उसका बिस्तर तैयार कर दिया और उसे उसमें बैठना सिखाने लगी। थपकियाँ देकर उसे वहीं सुला भी दिया। नोना बेबी! मेरा नोना बेबी मेरे मुँह से लाड़ से निकल रहा था। बच्चों के पुराने खिलौनों में से उसके लिए एक लाल रंग का प्लास्टिक का कटोरा मिला जिसमें उसे दूध-पानी अभी दे रहे थे।

अब तो अपने नन्हे-नन्हे क़दमों से वह सारे घर में दौड़ता था और लाड़ से हम सबके हृदय तरंगित हो रहे थे। हर चेहरे पर मुस्कान थी। सारा घर खिल उठा था। राजू की ड्यूटी थी कि उसे दूध देते ही, सुसु-पॉटी के लिए बाहर ले जाए, कहीं कमरे में गंदा ना कर दे। यह आदतें बचपन से ही डालनी पड़ती हैं।

कपड़े सूखने के स्टैंड पर नीचे वाली रौड पर जुराबें होती थीं गीली-गीली। अब तो हर दिन एक दो जुराबें फट रही थीं। मालूम हुआ नोना बेबी टीदिंग पर है—दाँत आ रहे हैं उसके। तो वह उन्हें ही कुतर रहा है। हमें तो इसका संज्ञान ही नहीं था कि ऐसा भी होता है। उसे पॉटी ट्रेंड किया जा रहा था। इसकी लीश (हुक वाली रस्सी) आ गई थी और गले में पट्टा क्योंकि वह तो हर दिन हर पल अमावस्या के चंद्रमा के जैसे बढ़ रहा था।

बच्चे बौल उछालते तो वह उसे धरती पर लगने से पहले ही पकड़ने का यत्न करता था। बौल से खेलना—यही उसका सबसे प्रिय खेल था। कभी-कभार हम उसे घुमाने ले जाते थे, तो कार की पिछली सीट पर चादर बिछाई जाती थी। वह उछलकर पिछले विंडो पैन से बाहर देखता और अति उत्साहित होता था। हम सब उसके क्रिया-कलापों से ख़ुश होते थे। अब वह बढ़ रहा था और बिस्किट और ब्रेड भी दूध के साथ खाता था। उसको हलवा बहुत पसंद था। राजमा चावल भी उसके पसंदीदा थे। उसका पसंदीदा फल केला और संतरा था। इस नस्ल का क़द अधिक नहीं बढ़ता छोटा-सा ही रहता है। साल भर में उसने जितनी ऊँचाई लेनी थी, ले ली थी। जब भी उसे सुबह-शाम बाहर ले जाया जाता तो राजू को हिदायत थी कि उसे नीचे से व पाँव धोकर घर के भीतर ड्राइव-वे में छोड़ा जाए। सूखने पर वह स्वयं अपने गद्दे पर जाकर बैठता था और प्लास्टिक की नक़ली हड्डी चबाता था क्योंकि हमारा परिवार वेजीटेरियन था। हाँ, उसे केवल अंडा दिया जाता था। यह मूक जानवर बहुत समझदार होता है। मैं समाचार-पत्र आने पर उसके मुँह में पकड़वाती और कहती जाओ पापा को दे आओ, तो कुछ दिन शुरूआती तौर पर वह गिरा देता रहा, लेकिन बाद में उसे समझ आ गई तो किसी और को अख़बार उठाने ही नहीं देता था। अख़बार वाला उसके मुँह में पकड़ाता और वह उछलता जाकर पापा को दे देता। जब तक अख़बार वाला नहीं आता वह मुँह उठाए गेट की तरफ़ देखता रहता था।

एक बार आधी रात को उठकर मैं किचन में कुछ लेने जा रही थी, तो मैंने देखा वह अपने बिस्तर की अपेक्षा लॉबी के सोफ़े पर सो रहा है। मैंने हैरानी से छूटते ही कहा, “हौ हौ।” यह सुनते ही वह डर गया और नीचे अपने बिस्तर पर आ गया। मानो उससे कोई भूल हो गई हो। इससे बहुत लाभ हो गया। अब वह न किचन की तरफ़ जाता था और ना ही बेडरूम्स में क्योंकि हम ‘हौ हौ’ करते तो वह समझ जाता कि यह काम नहीं करना है।

बहुत लोग बोलते कि इसके बच्चे कराओगे तो हमें भी एक देना। लेकिन इसकी मेटिंग (जोड़ी) के लिए हमें कहीं भी स्प्रिंगर स्पेनियल फ़ीमेल डॉग नहीं मिला। सभी वेटनरी डॉक्टर्स को बोल दिया था। बेचारा सारी उम्र कुँवारा ही रहा। जिस किसी डॉक्टर के पास ले गए इंजेक्शन लगवाने, तो वह यही कहते थे यह बहुत हेल्दी कुत्ता है। हालाँकि सारी उम्र उसने कभी किसी को नहीं काटा पर इंजेक्शन तो लगवाना होता था।

अरे हाँ, इसका जन्मदिन ग्यारह जनवरी को था। बच्चों ने इसका जन्मदिन मनाना शुरू कर दिया था। हमारी लेन के बच्चे गुब्बारे और कभी-कभी झंडियाँ लगाकर भी सजावट करते थे कि पोपोव का जन्मदिन है। और पोपोव सब का लाड़ला है। हर बच्चा उसके लिए ग्लूकोस बिस्किट का पैकेट गिफ़्ट लाता था। उसे उसकी ब्लू ड्रेस लाल पाइपिंग वाली पहनाई जाती थी। गले में ब्लैक रंग का बो बाँधा जाता था! (जो कभी बच्चों के बचपन का था)

सर पर रेड और ब्लू सुनहरी नुकीली बर्थडे टोपी इलास्टिक के साथ पहना दी जाती थी। उसे कुर्सी पर बिठाकर सामने टेबल पर केक रखा जाता या चार पेस्ट्री जोड़ कर रख देते थे। मैं हाथ में छुरी लेकर उसके हाथ को पकड़ कर केक को काटती थी और सब बच्चे “हैप्पी बर्थडे पोपोव” बोलते थे। मैं फिर बच्चों के खाने का इंतज़ाम करती थी। तब तक सब उसे केक खाता हुआ देखते और ख़ूब इंजॉय करते थे। जाते हुए सब रिटर्न गिफ़्ट का इंतज़ार करते थे क्योंकि हर साल बच्चे पूछते थे, “आंटी, पोपो के जन्मदिन पर इस बार क्या रिटर्न गिफ़्ट दोगे?”

बेटी तन्वी की शादी पर पोपोव पाँच साल का था। वह हनीमून पर मॉरीशस गई थी। वहाँ से उसके लिए एक खिलौना लाई थी, जिसे वह मुँह से दबाता तो वह चूँ-चूँ बजता था। उसे बहुत पसंद आया। पर जब अगले दिन खिलौना नहीं दिखा तो उससे पूछा, “पोपोव टॉय कहाँ है चूँ-चूँ? लेकर आओ।”

यह सुनते ही वह दौड़ा गया और फूलों की क्यारी में से मिट्टी खोदकर उसके अंदर से खिलौना लाकर चूँ-चूँ बजाने लगा। हम सब हैरान थे यह देखकर कि उसकी सूझबूझ देखो अपना खिलौना छुपा कर रखा है उसने। खिलौना उसका है यह उसे समझ आ गई थी और कोई ले ना ले, इसलिए उसे छुपा कर रखना भी उसे आ गया था। बोल नहीं सकता था पर समझ उसे पूरी थी।

तन्वी की बिटिया होने पर जब कभी वह रोती, तो यह न जाने कहाँ से वह टॉय लाकर बजाकर उसे सुनाता था। उसे यह भी समझ थी कि बच्चों को खिलौना बजाकर बहलाया जा सकता है। उसके बाल लंबे-लंबे थे तो उसे गर्मी बहुत लगती थी, वह एसी में ख़ुश रहता था। एक बार उसके टिक्स (जूँए) पड़ गईं थीं। राजू उसको लिटा कर पानी के पॉट में टिक्स निकाल-निकाल कर डालता था, तो वह चुपचाप पड़ा रहता था। इंसानी जूँओं से वह भिन्न होती हैं, हमने तभी देखा था। अब वह दस वर्ष का हो गया था।

इस बार हम विदेश गए तो राजू के साथ उसे पुनः अपनी ननद के घर छोड़ गए थे। वही उसकी देखभाल करता था। एक शाम वह उसे लेकर घुमाने गया तो उसे कोई दोस्त मिल गया, जिससे बातें करने में वह इतना मशग़ूल हो गया कि उसका ध्यान पोपोव से हट गया। तभी उसने देखा कि उस महल्ले के आवारा कुत्ते उसके पीछे पड़ गए थे और एक ने पोपोव की टाँग में काट खाया था। बस यहीं पोपोव की क़िस्मत ने दग़ा दे दिया। राजू ने डाँट खाने के डर के मारे घर जाकर किसी को भी नहीं बताया। उधर पोपोव रूं-रूं करता दर्द के मारे रोता था और उसका ज़ख्म बिगड़ता जा रहा था। बुआ जी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उसे क्या हो गया है। जब तक हम वापस आए ज़ख़्म की बुरी हालत हो गई थी। मेरे पति जो उसे बहुत लाड़ करते थे, उन्होंने उसे कार में डाला और लुधियाना वैट स्पेशलिस्ट के पास ले गए। उसके ज़ख्म की हालत इतनी बुरी हो गई थी कि पोपोव की चीख़ और ख़ून देखकर वहाँ राजू भी बेहोश होकर गिर पड़ा। उसकी टाँग की सर्जरी की गई। कुत्तों के डॉक्टर ने बताया कि इसके ज़ख्म का ज़हर फैल चुका है। इसे गैंग्रीन हो गया है फिर भी हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि यह बच जाए। वह परिवार के मेंबर की तरह था।

“सर! बहुत देर हो गई है अब तो पानी सर के ऊपर जा चुका है इसे बचाना नामुमकिन लग रहा है।” और डॉक्टर ने हथियार डाल दिए। अपने ग्यारहवें जन्मदिन के दस दिन पहले ही उसकी इह लीला समाप्त हो गई थी। राजू की नासमझी और अनदेखी से नोना बेबी, हमारा प्यारा पोपोव अब नहीं रहा था। सब रो रहे थे और हमने भी राज कपूर की तरह तीसरी क़सम खाई कि अब कभी कुत्ता नहीं पालेंगे . . .!


 

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