तीन चौके

01-06-2021

तीन चौके

वीणा विज ’उदित’ (अंक: 182, जून प्रथम, 2021 में प्रकाशित)

हल्की सी सिहरन हुई और "पैम" की आँख खुल गई। लगा पौ फटने में देर है। फिर भी सामने दीवार पर लगी घड़ी को देखा 4:44 थे। मानो दिमाग़ की घड़ी भी तीन चौकों पर जाकर थम गई थी।

रात पार्टी में पैग पर पैग लग रहे थे। इन चारों प्रवासी कपल्स का अपना ग्रुप था। हफ़्ते के 5 दिन तो सभी अपने अपने प्रोफ़ेशन मैं व्यस्त रहते थे लेकिन शुक्रवार की रात गेट-टुगेदर होना ही होता था किसी ना किसी बड़े मशहूर होटल में उनकी हैसियत के अनुसार। जिसका जो जी चाहे खाने का आर्डर या ड्रिंक आर्डर करें। लेडीज़ के भी अपने ड्रिंक्स और वाइंस थीं। बारी-बारी से सब पेमेंट करते रहते थे क्योंकि पैसे की कमी किसी को नहीं थी। भारतीय मानसिकता होने के कारण महँगी-महँगी डिशेज़ का आर्डर दिया जाता था, जिससे सुपीरिओरिटी कॉम्प्लैक्स बना रहता था।

इन भारतीय लोगों ने अमेरिका आने के बाद दोबारा पढ़ाई करके अपना एक मुक़ाम हासिल किया था। अमेरिकन क़ानून बढ़िया है। डॉक्टर का अर्थ है—मल्टीमिलेनियर होना। क्योंकि हर नागरिक को मेडिकल इंश्योरेंस वहाँ लेनी ही होती है। फिर बीमारी का क्या भरोसा? बिना द्वार खटखटाए पहुँच जाती है भीतर। उसके आने पर बंदे की नाव का खेवनहार डॉक्टर ही होता है। और पैसों का भुगतान करती हैं इंश्योरेंस कंपनियाँ। वहाँ के डॉक्टरों पर लक्ष्मी कृपा इन्हीं के दम पर बनी रहती है। इनमें भी अधिकतर डॉक्टर्स थे।

पिछली रात डॉ. करण के बेटे आकाश की ग्रेजुएशन पार्टी थी। पार्टी के पश्चात, सभी दोस्तों के हम-उम्र बच्चे इकट्ठे होकर पब चले गए थे और यह चारों कपल्स अपनी जवान शाम को रंगीन बनाने के लिए होटेल इम्पिरियल में पहुँच गए थे। इस नेक काम को होने में देर नहीं लगी क्योंकि माहौल में मस्ती छाई हुई थी। राजन एक से बढ़कर एक नॉनवेज जोक्स सुना रहा था हमेशा की तरह। जिन पर डॉ. सनी, डॉ. करण और मीत पंजाबी में माँ बहन की गालियाँ बोल-बोल कर दाद दे रहे थे।

राजन के भीतर मानो जोक्स रूपी कारुँ का ख़ज़ाना जमा रहता था। बढ़ते-बढ़ते यह जोक्स संता-बंता का रूप धर लेते थे। करण की बिन्नी खिलखिलाते हुए अपने दायीं जाँघ पर हाथ मारती, तो उसका बिना स्ट्रेप का गाउन कुछ और नीचे सरक आता था। करण को छोड़ बाक़ी तीनों मर्दों की नज़र वहाँ जाकर ठहर जाती थी। वैसे भी अपनी थाली का लड्डू किसे स्वाद लगता है? जीभ ललचाती है दूसरे की मिठाई के लिए। हाथ में महँगी वाइन का गिलास लिए बिन्नी तो वैसे भी गिरी जा रही थी अपने डॉक्टर पति करण की ओर।

अनु और आयशा के साथ डॉ. पैम भी हाथों में वाइन के गिलास लिए आँखों में गुलाबी डोरे सजाए हुए थी। मीत सिगरेट से धुएँ के छल्ले छोड़ रहा था अपनी आयशा के मुँह पर! कि तभी आयशा ने उसके मुँह से सिगरेट निकाल कर अपने मुँह से लगा ली थी . . . !

ऐसे होटल दिन रात चलते हैं। दिन में वहाँ मीटिंग्स और कॉन्फ़्रेंसेज़ होती हैं। लेकिन इनके जैसे कस्टमर तो दिन को सोए रहते हैं—रात की ख़ुमारी मिटाने के लिए। सो, यहाँ रातें जागती हैं—किस्से गढ़ती हैं! और दिन सोते हैं लंबी तान कर।

हाँ, तो 4:44 पर जब पैम की नींद खुली तो देखती है कि होटल के जिस कमरे में वह थी, वहाँ पलंग पर सनी की जगह मीत ‌सोया हुआ है बेहोश। वह देखकर हैरान थी कि सनी कहाँ रह गया? उन लोगों को इतनी अधिक चढ़ गई थी कि कौन किसके कमरे में किसके साथ जा रहा है, कुछ होश ही नहीं था। उसे लगा घड़ी के तीन चौके उससे कह रहे हैं कि सँभल जा —अभी भी वक़्त है . . . !

अनु कहाँ गई होगी? और उसका सनी भी नहीं है। उसने झट से जाकर रेस्ट रूम में अपने आपको फ़्रेश किया। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था वह कैसे मीत के संग आ गई थी। लेकिन इस ग्रुप में सब संभव था। सबको इतनी ज़्यादा चढ़ गई थी कि किसी को कोई होश नहीं था। छुट्टी का दिन था; उसे मालूम था कि मीत 12:00 बजे से पहले नहीं उठने वाला है। उसने अपनी कार की चाबियाँ पर्स में देखीं और पार्किंग लॉट से अपनी कार लेकर घर की ओर निकल गई।
वह सोच रही थी सनी भी अभी नींद में होगा, ना मालूम बेहोश सा किसके साथ और किस रूम में? वह तो होटल रूम्स की तलाशी नहीं लेने वाली थी किसी भी हाल में! सब के पास अपनी-अपनी गाड़ी थी। कोई सीधे काम से आया था तो कोई घर से आया था पार्टी में।

महानगरीय जीवन की विकृतियाँ जिनकी व्यंजना होती है—बियर, वाइन के घूँट से गले तर करतीं और सिगरेट का धुआँ उगलती औरतें . . . ! उसे नहीं पसंद यह जीवन शैली लेकिन . . .  वह जाए भी तो कहाँ जाए?

वह सोचे जा रही थी कि जीवन जीने का इन सब का यही रवैया है। अभी तो बच्चों का भी कुछ इल्म नहीं है किसी को कि वे कहाँ हैं? यहाँ के नियम ही कुछ ऐसे हैं कि बच्चे व्यस्क हुए नहीं कि पूरी आज़ादी मिल जाती है। कई बार इतनी आज़ादी बच्चों से सँभलती भी नहीं और बहकने के समय, नियम ताक़ पर धरे रह जाते हैं।

हमेशा की तरह घर पहुँचकर वह भी सोने लगी थी। क्योंकि अगली रात भी ऐसी ही बीतनी थी। भारत की तरह यहाँ कोई पूछने वाला नहीं था। ख़ाली-ख़ाली दीवारें, कमरे, ख़ाली-ख़ाली बिस्तर उसे मुँह चिढ़ाता हुआ। पूरा घर ही ख़ाली और भीतर भी खोखलापन। क्या यही चाहती थी वो . . . ? . . . नहीं! नहीं! नहीं! नहइंईंईंईं!! और इसी उधेड़बुन में वह सो गई थी।

अगली शाम" मैरियट होटल" का प्रोग्राम था। सब वहीं अपनी गाड़ियों में आए, और वेले पार्किंग के लिए गाड़ियाँ दे दीं। इससे पिछली रात के क़िस्से पर पर्दे पड़े रह गए थे। किसी को किसी दूसरे के बारे में कुछ मालूम नहीं था। सारे सवाल अनपूछे रह जाते थे। जो केवल और केवल मस्ती के आलम में डूबे रहने के लिए होते थे। शायद हफ़्ते भर की दौड़-धूप और थकान मिटाने के यही ज़रिए थे। 

उनका आपस में बेपर्दा था। उनकी सोच के हिसाब से उनका रहने का स्तर बहुत ऊँचा था। जहाँ शरीर या समाज के नियम, रिश्ते व धारणाएँ आदिकाल के मानवीय संबंधों को मद्देनज़र रखकर गढ़ी गईं थीं। 

हर पहलू को आवरणहीन करके प्रस्तुत करना—क्योंकि असलियत यही है। लोग खुलापन आवरणहीनता पढ़ना व देखना तो चाहते हैं . . .

लेकिन सबके सम्मुख नहीं, एकांत में!

दिन के उजाले में नहीं वरन रात के अँधेरे में!

खुले आँगन में नहीं वरन बंद कमरे में!

"समाज" शब्द का डर उनके भीतर हौव्वा बना रहता है। और यह तभी संभव हो पाता है जब उनके छुपे हुए क्रियाकलाप और समाज के मध्य एक मोटा पर्दा तना रहे।

होटल मेरियट से यह चारों जोड़ियाँ आधी रात को डॉक्टर करण के घर के बेसमेंट में आ गई थीं। बेसमेंट में थिएटर बना हुआ था। वहाँ जाम पर जाम चल रहे थे . . . क्योंकि सामने रोमांटिक टाइप फ़िल्म चल रही थी!

थोड़े बहुत स्नैक्स भी बाहर से मँगवाए गए थे– नॉनवेज और प्रॉन्स! पूरे अँधकार के आलम में हल्की सी नीली रोशनी छाई थी। मस्ती का ख़ुमार सब पर छाया हुआ था। डॉक्टर करण और बिन्नी होस्ट थे, सो अपने दोस्तों का ख़ूब ख़्याल रख रहे थे। वैसे वहाँ बिछे मोटे मखमली कारपेट और मुलायम सोफ़े उनको गर्मा रहे थे।

पैम, इन सब से घबरा जाती थी लेकिन फिर सनी का कहना कि जिन लोगों के साथ हम हैं उनके जैसे ही चलने में अक़्लमंदी है। तो वह पुनः बहक जाती थी। आख़िर वह भी तो एक सामाजिक प्राणी है। उसे भी साथ चाहिए! यह तो क़िस्मत की बातें हैं कि किसे कैसा साथ मिला। फिर भी उसे अपने आप पर ग्लानि होती थी!

यौन संबंधों की विकृतियों, शराब और सेक्स की आवृत्तियों से अब अतृप्ति, कुंठा, निराशा, आंतरिक टूटन आदि समाज की विसंगतियों, विद्रूपताओं को उद्घाटित करने के लिए अपने आप को वह विवश पा रही थी। ऐसी जगह आ गई थी कि वह बेबस थी।

इन सब में सबसे अधिक मस्त राजन था। जो कि रियल एस्टेट में काम करता था अर्थात प्रॉपर्टी डीलर था हिंदुस्तानी भाषा में। आयशा पंजाबी मुसलमान लाहौर से थी। बहुत ही खुले स्वभाव की, अपना पाकिस्तानी स्टोर चलाती थी।
अमेरिका पहुँचकर धर्म-कर्म का क्या अर्थ रह गया था यह तो पैम पहचान गई थी। फिर भी आयशा की रसोई में मसालों की कुछ ख़ास ही महक होती थी, जो उनकी रसोई में मिसिंग थी। शायद मांसाहारी भोजन बनाने की उसकी अपनी ही रेस्पीज़ थीं। हाई सोसाइटी में मांसाहारी और सीफ़ूड ख़ूब चलता है . . . यह भी अमीरी की निशानियाँ हैं।

"बिन्नी" एबीसीडी (ABCD) थी। यानी कि America born confused Desi (अमेरिका में जन्में असमंजिसत देसी)। वैसे बहुत ख़ूबसूरत और गोरी-चिट्टी थी भारत जाकर डॉक्टर की विदाई कराकर डोली ले आई थी अमेरिका। तभी तो करण को इंफ़ीरिओरिटी कॉम्प्लैक्स था। करण का परिवार लुधियाना पंजाब में था। बिन्नी का कैलिफ़ोर्निया में। वहीं पली-बढ़ी थी। उसका एक ही तकिया कलाम था, "body is nothing (शरीर महत्वहीन है)।"

मीत और अनु ’वर्जिनिया टेक’ में इकट्ठे पढ़ते थे। दोनों स्टूडेंट वीज़ा पर यू एस आए थे। अनु चंडीगढ़ की लड़की थी और अब स्मार्ट बैंक ऑफ़िसर (smart bank officer) थी। हर बात पर हँसते रहना उसका ख़ास अंदाज़ था। जबकि मीत सॉफ़्टवेयर इंजीनियर था और अपनी कंपनी चलाता था। उस को बड़े-बड़े ऑर्डर्स मिलते थे।

प्रतिमा, पैम . . .  बच्चों की डॉक्टर यानि कि pediatrician थी। और संजय जिसे सब सनी बुलाते थे; वह डेंटल सर्जन था। दोनों की ही बहुत कमाई थी। अपने साथ असिस्टेंट डॉक्टर भी इन्होंने रखे हुए थे। पैम अपने आप को इन सब के अनुरूप नहीं ढाल पा रही थी। अमेरिका में रहकर ख़ूब मेहनत करना, धन कमाना और चारित्रिक उत्तेजना में स्वयं की आहुति देना—उसे तर्कसंगत नहीं लग रहा था।

आसक्ति और विरक्ति का द्वंद्व उसके भीतर उथल-पुथल मचाए रखता था। इसके ऊपर जब वह देखती कि सनी को अनु की खनकती हँसी के समक्ष कुछ और नहीं दिखता है, तो वह मुरझा-सी जाती थी। पैम सब समझते-बूझते हुए भी अनजान बनी रहती थी। वह देखती थी, मीत भी अपनी पत्नी को कनखियों से देखता हुआ शांत बैठा पैग सिप करता रहता है। उसे भी समझ आता था कि उसकी पत्नी सनी को आकर्षित करती रहती है – लेकिन किसी का किसी के ऊपर कोई बस नहीं चलता था। हर कोई आज़ाद था। किसी को कुछ भी कहने का कोई अधिकार नहीं था।

उधर करण तो हीन भावना से ग्रसित होने के कारण ख़ूब पैग पर पैग चढ़ाता रहता था सबको देख-देख कर। उसे लगता था शायद यही अमीरों का चलन होता है; उसे भी बिन्नी की नज़र में वैसा ही दिखना है।

सो, यह रहा इन सब का कच्चा चिट्ठा!

अब जवान औलादों को भरपूर पैसा और पूरी आज़ादी मिली होने से स्वच्छंद और उच्छृंखल होने में क्या देर लगती है? जब "आँवा" ही ऊता हो तो कुछ भी सही कैसे हो सकता है? पैम और सनी की जुड़वा बेटियाँ तनीमा (तनु) और ईरा भी व्यस्क थीं। दोनों बहने इकहरे बदन की काठी लिए सौंदर्य एवं लावण्यमयी रूप की स्वामिनी थीं। स्वभाव से तनु शान्त और गंभीर थी। वहीं ईरा चंचल व चतुर थी। तनु पापा के नक़्शे क़दम पर डॉक्टर बनने की तैयारी में थी वहीं ईरा मनोविज्ञान में ऑटिस्टिक किड्स (Autistic kids) पर मेजर करने की पढ़ाई कर रही थी। जबकि सनी और पैम दोनों को डॉक्टर बनाना चाहते थे।

‌‌ईरा अपनी मीठी-मीठी बातों से बच्चों को लुभा लेती थी। वैसे भी वह रॉबिन अमेरिकन लड़के से डेट कर रही थी। अमेरिका में बॉयफ्रेंड बनाना आम बात है। यह सब खुले आम चलता है। पैम, विष-बेल चढ़ती देख रही थी, और खिन्न थी किंतु कुछ कह नहीं पाती थी। उसे वहाँ के क़ानून ने यह हक़ ही नहीं दिया था।

डॉक्टर करण का बेटा आकाश डॉक्टर बन गया था। उसने अपनी ग्रेजुएशन पार्टी में तनीमा पर ख़ूब डोरे डाले थे। सबको दिख रहा था। परिवारों में तालमेल तो वैसे ही था। अब दोनों की दोस्ती हो गई थी। वैसे भी यह लोग इकट्ठे ही बड़े हो रहे थे तो अच्छी तरह जानते थे एक दूसरे को। दोनों डॉक्टर बन रहे थे। पैम और सनी संतुष्ट थे। 

‌‌कम से कम उनकी बेटी ने हिंदुस्तानी लड़के से दोस्ती की थी और वह भी अपने ही ग्रुप में। ‌उनके अपने चहेते दोस्त के बेटे के साथ। इन सब में प्रवासी होते हुए भी करण ही सबसे ज़्यादा हिंदुस्तानी था और सभी भीतर से उसे बहुत पसंद करते थे। आकाश में अपने पापा का पूरा प्रभाव था। वहाँ पहुँचकर भारतीय दोहरी जिंदगी जीते हैं। उनकी जड़ें हिंदुस्तान में होती हैं और उनमें फल अमेरिका में लगते हैं।

ईरा को वह नहीं बचा पाए थे वहाँ की अंधी दौड़ से! इसका उन्हें मलाल था। लेकिन उसके उज्जवल भविष्य की कामना करते रहते थे। हो सकता है रॉबिन उनकी आशा के अनुरूप निकले, एक धुँधली किरण थी वहाँ पे।

आकाश और तनु हर वीकेंड पर इकट्ठे कहीं न कहीं घूम रहे होते थे। करण और बिन्नी को भी जोड़ी पसंद थी। अब आकाश और तनु घूमने के लिए सैन फ्रांसिस्को जा रहे थे। इस पर दोनों के माता-पिता ने ख़ुशी ज़ाहिर करी। हवाओं का रुख़ उनके अनुसार बह रहा था। दोनों बच्चे आपस में मस्त थे। अब उनकी दोस्ती रिश्तेदारी में बदल जाएगी इससे वे उत्साहित थे। 

उधर बाक़ी दोनों परिवारों में वैसे तो ईर्ष्या जन्म ले चुकी थी। परंतु . . . इस बेल को फलते-फूलते देखकर वह भी दिखावा करने में नंबर वन थे। असल में आकाश के भारतीय संस्कार करण की देन थे, इसलिए सब की पहली पसंद आकाश ही था। और उसे तनीमा पसंद आ गई थी।

ख़ैर, बच्चों के जाने के बाद सब अपने काम पर बिज़ी हो गए थे। आज, पैम अपने डॉक्टर ऑफ़िस में कॉफ़ी का कप लेकर बैठी ही थी कि फोन की घंटी टन टन बज उठी। रिसीवर को हाथ लगाते ही उसकी नज़र सामने टँगी घड़ी पर चली गई। वहाँ वही टाइम था 4:44 यानी कि तीन चौके! उसका हाथ काँप गया। वह आश्चर्य से भर उठी कि अब यह तीन चौके क्या गुल खिलाएँगे या फिर कुछ चेताएँगे . . . ? चलो देखते हैं उसने सोचा और "हेलो" बोला।

उधर से अँग्रेज़ी में आवाज़ आई—

"मैं सार्जेंट रिक सैन फ्रांसिस्को से बोल रहा हूँ। आप के बच्चों के आई-कार्ड मेरे पास हैं। उनका गोल्डन गेट ब्रिज पर एक्सीडेंट हो गया है।"

इतना सुनना था कि पैम गहरे सदमे से वहीं गिर पड़ी। उसके हाथ से फोन छूट गया जिसे उसकी असिस्टेंट डॉक्टर ने पकड़ा और सारी मालूमात हासिल कीं। और डॉ. सनी को आराम से बताया, साथ ही सार्जेंट का नंबर भी दिया। करण और बिन्नी के भी होश गुम हो गए थे। यह चारों अगली फ़्लाइट से सैन फ्रांसिस्को जा रहे थे। सारे रास्ते विचारों में गुम वे चेतना शून्य व भाव-शून्य थे। गहन विषाद के चलते सबके होंठ सिल गए थे।

वहाँ पहुँचकर कुछ हासिल नहीं हुआ। आकाश सारे बंधन तोड़ कर विस्तृत आकाश में समा चुका था। किराए की कैब लेकर वे दोनों होटल से घूमने के लिए निकले थे। तनिमा की सारी जीवित शक्तियाँ मृतप्राय: हो चुकी थीं। वह कोमा में जा चुकी थी। एक जीवित लाश सामने पड़ी थी। वह थी भी! और नहीं भी थी!!

उनके बच्चे हँसते-खेलते उनसे विदा हुए थे; ना जाने किस मनहूस घड़ी में क़हर टूटा था इन सब पर! वापिस पहुँचकर सबका जीवन वीरान हो गया था। वह महफ़िलें वो मस्ती अतीत के गहरे कुएँ में दफ़न हो चुकी थीं। उनके दोस्तों की ईर्ष्या सहानुभूति में तब्दील हो चुकी थी। वे इन पर तरस खा रहे थे। और साथ ही "हम बच गए" की भावना भी थी। समय की क्रूर चाल को देखकर वक़्त भी ठहर गया था।

मन ही मन पैम 4:44 टाइम से दहशत खाती थी अब। उसे लगता था तीन चौके अनहोनी होने के पूर्व के संकेत हैं! तनु के पास वह आराम कुर्सी पर लेटी थी थोड़ा बहुत खा कर कि आशा के विपरीत डॉक्टर धड़धड़ाती भीतर आई और उसने ख़बर दी कि तनु माँ बनने वाली है। वक़्त ने फिर अपने आप को दोहराया और उस वक़्त भी घड़ी पर तीन चौके थे। 4:44!!!

उसे लगा वह क्या समझे? यह शुभ हो रहा है या अशुभ? यह भी तो हो सकता है कि बच्चे की धड़कन के साथ तनु को होश आ जाए और वह ठीक हो जाए। उसके भीतर एक उम्मीद ने जन्म लिया। उसे आज 4:44 यानी कि तीन चौके भयावह नहीं, अह्लादकारी लग रहे थे। व्यक्ति की मन:स्थिति और परिस्थितियाँ उसे कुछ भी सोचने के लिए एक कारण दे देती हैं। तभी वह निष्कर्ष निकालता है।

बिन्नी ने यह सुनते ही कहा,"मेरा आकाश वापिस आ रहा है हमारा सूनापन भरने।" दोनों माताएँ जी-जान से तनु की सेवा में लग गईं थीं उम्मीदों और आशाओं का दामन थाम कर। अब उनमें उत्साह आ गया था।

टैस्ट करने पर पता चला कि एक नन्ही कली खिलने वाली है उनकी बगिया में! बिन्नी तो यह सुनते ही नाच उठी। पैम से बोली, "देख न पैम! मेरे बेटे ने जाते-जाते माँ के लिए निशानी छोड़ दी अब मैं फिर से उसके अंश को गोद में खिलाऊँगी। और उसे महसूस करूँगी।" उसने अपने घर में बहुत ही प्यारी नर्सरी तैयार कर ली और ढेर सारी शॉपिंग कर डाली अपनी आने वाली डॉल के लिए।

पैम तनु के पास बैठकर उस से ढेर सारी बातें किया करती कि शायद वह सुन ले। महसूस करे और प्रतिक्रिया करे। उसकी उँगलियों को देखती, पकड़ती, मलती कि शायद कोई हरकत हो उनमें आईटच थैरेपी (।Touch Therapy) भी आज़माती थी। वह स्वयं एक डॉक्टर थी। उसके ज्ञान के अनुरूप कोमा में अवचेतन की सक्रियता रहती है। उसे लगता मेरी बेटी भी शारीरिक रूप से निष्क्रिय होते हुए भी अवचेतन में जाग रही है और चिंतित है। उसे हम सब की बातों से अवश्य पता चल गया होगा कि वह माँ बनने वाली है। हो सकता है माँ बनने की प्रसन्नता से उसका अवचेतन सक्रिय हो जाए। उसके चेतना में धीरे-धीरे स्पंदन हो और फिर पूर्ण चेतना लौट आए!

वात्सल्य रस सबसे शक्तिशाली माना गया है। स्त्री के भीतर का ममत्व उसमें अद्भुत रस संचार करता है। क्या मालूम तनु अपनी गोद खिलने पर पुनः जीवन में लौट आए! उसने कई बार कोमा के मरीज़ों का चेतन में आने का क़िस्सा पढ़ा और सुना था। उम्मीदों और आशाओं का आँचल थाम वह उसका चेहरा गौर से देखती रहती। उस का कलेजा फटता था उसे इस हाल में देखकर। कहीं कोई अनहोनी नहीं हो रही थी। वक़्त मानो ठहर गया था।

समय पूरा होने पर नन्ही परी को सर्जरी करके बाहर निकाला गया। यह एक अनोखा केस था डॉक्टर के लिए। कि तभी तनु की गर्दन लटक गई। मानो वह बच्ची को संसार में लाने के लिए ही चंद साँसें लिए जी रही थी और उसे जीवन देकर वह अलविदा कह गई थी।

मानो, "गढ़ आला पण सिंह गेला।"

इधर पैम, सनी, बिनी, करण, ईरा और कुछ दोस्त ऑपरेशन थिएटर के बाहर खड़े थे, कुछ शुभ सुनने के लिए। जबकि पैम थिएटर के बाहर, बस चल रही थी इधर से उधर मानो एक बियाबान जंगल में अँधकार को चीरती नीलकंठ देखने को उतावली थी। जब उसे किसी पंछी के पंख फड़फड़ाने की हल्की सी आवाज़ आई तो वह एक नन्हे बच्चे के ‌रुदन में बदल गई। उसने कलाई पर लगी घड़ी को देखा वहाँ थे—4:44 यानी "तीन चौके!"

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