हलधर नाग का काव्य संसार

हलधर नाग का काव्य संसार  (रचनाकार - दिनेश कुमार माली)

कहानी ख़त्म 

 

विदेश से लौटकर आए स्वदेश स्वामी विवेकानंद; 
भारत भूमि को छूते ही मिला उन्हें परम आनंद। 
 
अपने लोग दे रहे थे सम्मान-संवर्धना; 
कृत-कृतज्ञ हो गए देख भीड़ की गणना। 
 
एक सुंदर, युवा, आकर्षक युवती आई मिलने, 
हर पल स्वामी जी के पीछे, बिना इधर-उधर सुने 
 
समय, सुयोग, मौक़ा देखकर करने लगी विनती 
“स्वामीजी, मेरे बात रखेंगे,” खुलकर की मिनती
 
“गुप्त-गुप्त मेरे साथ चलकर करो एक बार सहवास; 
आपके अंश से बेटा पैदा करने की है मेरी आस” 
 
बोले स्वामी जी, “माते, रक्षा करो मेरी इस बार 
पुत्र-जन्म में लगेगा समय, नहीं भी सकती धार। 
 
“आज से मैं तुम्हारा बेटा, और तुम मेरी माता, 
 मत भाग मेरे पीछे, रहेगा सदैव माँ-बेटे का नाता” 
 
बीस-पच्चीस क़दम बढ़े वे आगे चलकर; 
अनगिनत लोग उमड़ पड़े वहाँ जमकर। 
 
गगन-पवन में उछला भारत का जय-गान 
कॉलेज के छात्र आगे खड़े हुए उस स्थान। 
 
एक ने पूछा, “स्वामी-जी, गुणगान करते भारत का यों, 
फिर विदेशी जूते पैरों में क्यों?” 
 
स्वामी जी ने कहा “बाबू मेरे, मेरे सिर पर पगड़ी है किसकी?” 
लड़के ने कहा “कौन नहीं जानता, पगड़ी भारत की।” 
 
“जान लो, लड़कों, मेरे सिर पर विराजती भारत माता 
विदेश का करता हूँ सम्मान, फिर भी मेरे पाँव-तले उनका जूता। 

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