सर्वश्रेष्ठ पाठक के नाम एक पत्र 

01-01-2026

सर्वश्रेष्ठ पाठक के नाम एक पत्र 

डॉ. आरती स्मित (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

प्यारे हांडा अंकल 

सादर नमन!

आशा है, आप अपने नए रंग-रूप के साथ अपनी नई दुनिया में आनंदित होंगे। आपकी यह नई यात्रा इतनी शांति-भरी थी मानो यात्रा के लिए आप महीनों पूर्व मन को तैयार किए बैठे हों। . . . और शायद इसलिए इस वर्ष की मेरी अंतिम प्रकाशित काव्यकृति पढ़ने, उस पर प्रतिक्रिया देने के बाद पूछा था कि “अभी फिर तुरंत कोई पुस्तक आने वाली है क्या?” और मेरे ‘न’ कहने के बाद कुछ पल मौन में उतर गए थे। कुछ दिनों बाद, दिवाली की शाम आपने कहा था, “बेटे, अब क्या, जो करना था, कर लिया। १०४ में जी रहा हूँ, चल रहा हूँ, तुम सबसे मिल रहा हूँ, बातें कर रहा हूँ . . . और क्या चाहिए। अब तो जब टिकट कट जाए।” फिर ऊपर की तरफ़ इशारा करते हुए कहा था, “मैं तो तैयार बैठा हूँ, जब बुलावा भेज दे।” मैंने नाराज़गी जताई थी, “फ़िट हैं, फिर ऐसे क्यों कहते हैं? जाना सबको है। ख़ुद को ये कहना ज़रूरी है, वह भी ज्योति-पर्व पर? आप इस भगवतधाम के लिए ही नहीं, हम सबके लिए भी एक रोशनी हैं। एक डिवाइन लाइट।” आपने बहस नहीं की, मुस्कुराते हुए बात बदल दी और मेरे अनुरोध का मान रखते हुए पहली मोमबत्ती जलाई।   

अंकल, आप सोच रहे होंगे कि इतने वर्षों में पहले कभी आपको पत्र नहीं लिखा, फिर आज क्यों? . . . जबकि अब हमारे मिलने की बची-खुची उम्मीद भी ख़त्म हो गई है! पर मैं ऐसा नहीं मानती। हाँ, यह सही है कि पहले की तरह मिलना संभव नहीं, मगर मिला तो अब भी जा सकता है। स्मृति की इतनी सुंदर दुनिया बसी है। आप वहाँ हर पल मुस्कुराते हैं और पहले की तरह ही मेरी क़लम को आशीष देते नज़र आते हैं। आप मेरे जीवन की वह ऊर्जा हैं जिससे मेरी क़लम को बल मिलता रहा है। 

मैं इससे इनकार नहीं कर रही कि मेरी क़लम ने तीन दशकों से श्रोताओं और दो दशकों से पाठकों का भरपूर स्नेह-सम्मान पाया है। उनकी प्रतिक्रियाओं ने निश्चित तौर पर लेखन के प्रति मेरे समर्पण को दृढ़ किया है। लेकिन, यह भी सच है कि बतौर पाठक आपने सबको पीछे छोड़ दिया। आप जैसे अद्भुत पाठक को पाकर एक रचनाकार के रूप में मैं धन्य हुई। वे रचनाएँ/वे पुस्तकें धन्य हुईं जिन्हें आपने शिद्दत से पढ़ा-समझा, भाव भीतर भरे, फिर अपनी प्रतिक्रिया दी और हर बार क़लम आपके आशीर्वाद के दिव्य उजास से भरती रही। 

कैसे भूल सकती हूँ वह पहली मुलाक़ात अगस्त २०१६ की, जब आप पनचानवे वर्ष में प्रवेश करते कर्मठ युवा थे। उस मुलाक़ात ने स्नेह के जो तार जोड़े, संबंध ने जो नए द्वार खोले उसमें प्रवेश करती, भीतर बढ़ती जाती मैं जितना आपको जानती गई, ईश्वर को धन्यवाद देती गई। आपकी सजगता, समाजसेवा की भावना, पर्यावरण सहित देश की आंतरिक दुरवस्था तथा समाज में बढ़ती नकारात्मक प्रवृत्तियों, मानवीय मूल्यों के ह्रास एवं गलत दिशा में बदलाव से जुड़ी आपकी चिंता ने ही मुझे आपके नज़दीक किया क्योंकि इन्हीं विषयों से जुड़े सरोकारों पर क़लम निडरता से चलती रही है। आप हर पल, हर एक की मदद के लिए तनकर खड़े नज़र आए। आपके लिए सब समान थे, सब आदर के योग्य। मेरे आदर्श नायक का मूर्त रूप। 

जानते हैं अंकल, मेरा मन औरों की तरह आपको केवल इसलिए बुज़ुर्ग मानने को तैयार न हुआ कि आपकी उम्र की घड़ी की सुई बड़ा अंक पार करने वाली थी। हाँ, यह ठीक है मगर मेरी दृष्टि में आप अपनी कर्मठता में हम सबसे अधिक युवा रहे। 

कैसे भूल सकती हूँ उस आयु में आपका मेरी पहली पुस्तक से लेकर अपनी नई यात्रा पर जाने से पहले तक (९५ वर्ष की आयु में पढ़ना आरंभ कर १०३ वर्ष पूरा होने के बाद तक) लगभग सभी विधाओं की पुस्तकों को डूबकर पढ़ना, कुछ इस तरह कि वर्षों बाद भी किसी संदर्भ में पुस्तक-विशेष की कुछ बातों का आप उल्लेख कर देते। इतना ही नहीं, पुस्तक समाप्त करते ही फ़ोन करके अपनी प्रतिक्रिया देना कभी नहीं भूले। काश! मैंने उन्हें रिकॉर्ड किया होता! कई बार ऐसा लगा मानो पुस्तक की थीम आपके भीतर घर बनाए हो, विशेषकर कहानियों एवं महापुरुषों पर लिखी गई गद्य कृतियों की, जिसकी चर्चा आप जब-तब मिलने वालों से करते और कई इच्छुक को पुस्तक पढ़ने देते और इसकी जानकारी मुझे देते हुए आपके स्वर से बरसता आह्लाद और बालसुलभ आश्चर्य कई किलोमीटर दूर मुझे भिगोता रहा, ख़ासकर तब-तब, जब-जब आप कहते, “तेरे भीतर कहाँ इत्ती बुद्धि भरी हुई है? कहाँ से इतना कुछ सूझता है? प्लान करके तो नहीं हो सकता। वो तो बनावटी हो जाएगा। ऐसा नहीं होगा . . . और इतना आर्ट? बंदा पढ़ना शुरू करे तो रुक न पाए।” 

आपको याद है, एक दोपहर, लंच के बाद हम टैरेस पर गुनगुनी धूप का मज़ा ले रहे थे और स्निग्धा आंटी भी आकर थोड़ी छाया में बैठीं और फिर ‘अद्भुत संन्यासी’ पर मुझसे बात करने लगीं। आपने बातचीत को गति देते हुए कहा, “कविता, कहानी, आलोचना, वो क्या कहते हैं—ट्रैवलॉग और मेमोअर, बच्चों की किताब के साथ ही इसकी वो किताबें—गाँधी और विवेकानंदजी वाली—मैंने तो सब पढ़ी हैं। आपने भी तो कुछ पढ़ी ही हैं। विवेकानंद जी के जीवन को इसने नॉवेल में ऐसे उतारा है कि आप तो पढ़ी-लिखी हैं, उनकी फ़ॉलोअर हैं, जो उनके बारे में बहुत न भी जानता हो, जैसे कि मैं—मेरे जैसा बेवुक़ूफ़ भी सब समझ जाए।” 

और फिर आपने मुझे टोका, “मैं तो बचपन से बापू को देखता-सुनता और आंदोलन में भाग लेता हुआ बड़ा हुआ। उनके समय में ताया जी (गुलजारीलाल नंदा) के साथ साबरमती आश्रम भी जाकर आया, फिर भी उनके जीवन की छोटी-छोटी बातों में, उनकी डेली रूटीन में तूने उन बातों को ढूँढ़ लिया जिससे उनकी असली पर्सनैलिटी समझ आती है। कोई आदमी ऐसे ही महात्मा नहीं बन जाता। भीतर से बदलता है। और कुछ गुण तो बचपन से ही स्वभाव और संस्कार में होते हैं। तूने बड़े अच्छे से दिखाया है। उनके बारे में कई बातें मुझे भी मालूम नहीं थी। और उनके बचपन की बातें!! ये करना असान (आसान) थोड़ी न रहा होगा। ये तूने अच्छा किया, आम आदमी समझ पाए, इसको ध्यान में रखा। यह ज़रूरी है।” 

अंकल, अब जबकि आपकी आवाज़ पहले की तरह सुन नहीं सकूँगी, न आने वाली पुस्तकों पर आपके विचार पा सकूँगी, सोचती हूँ, कितना अच्छा होता अगर आपकी कही बातें, पुस्तकों पर दी गई आपकी हर प्रतिक्रिया को डायरी में नोट करती जाती तो एक बड़ा आलेख बन जाता! सारी बातें याद नहीं, कुछ बातें स्मृति में स्थायी हो गईं, जैसे कि आपका यह कहना—“मैं हिंदी का बंदा नहीं। कहानी-कविता में कहीं-कहीं तेरे शब्द समझ नहीं आते मगर वो भाव कैच हो जाता है तो आगे पढ़ता जाता हूँ . . . वैसे भी तू सीन क्रिएट करती है चाहे वह कविता-कहानी हो या तेरा वो यात्रा वाला और वो संस्मरण—तूने मेरे जैसे बेवुक़ूफ़ के बारे भी इत्ता लिखा है!! मैं कोई तोप हूँ! ओय, एक अदना-सा आदमी! तूने मेरे बारे में लिखा, मुझे उन बड़े लोगों में शामिल कर दिया! जो-जो मैं बातचीत में बताता रहा, तुझे सब याद कैसे रहा? और मैं क्या, तूने तो हर एक के साथ जुड़ा समय याद रखा है। कमाल है।” और मैंने हँसकर कहा था, “मेरे लिए तो बड़ा तोप हो।” और आपने ‘एविं बोलती है’ वाले भाव के साथ ‘ना’ में सिर हिला दिया था। 

एक बात बताइए अंकल, मेरे लेखन की तारीफ़ करने के सिवा आपको कुछ सूझता नहीं था क्या? तभी तो भगवतधाम के अंकल-आंटी से तो कभी किसी और से चर्चा करने लगते थे–“आरती कैसे लिख लेती है ऐसा—छोटे बच्चों से लेकर हम बुड्ढों का दिल-दिमाग़ पढ़ लेती है! . . . ऐसे लिखती है कि लगता है, हम फ़िल्म देख रहे हैं। कई बार कैरक्टर अपने ही बीच का लगता है। आपको भी ऐसा लगा क्या?” अंकल आपको पता है, आपकी कही बात घूम-फिरकर मुझ तक पहुँच ही जाती थी कि हांडा जी पढ़ते समय तो डूबे रहते हैं, बाद में ताज्जुब करते हैं कि कैसे लिखा! 

अंकल, मेरे सामने, फ़ोन पर या किसी के सामने बतौर पाठक दी गई आपकी प्रतिक्रिया आज भी मेरे कानों में गूँज रही है। 

हाँ, मैं आपका कहा भूली नहीं हूँ। तहेदिल से स्वीकार करती हूँ कि क़लम ने मुझे हर उम्र, हर क्षेत्र और हर तबक़े के पाठक मित्र दिए हैं। और आपकी ही तरह वे भी आस-पड़ोस या मित्र मंडली को मेरी पुस्तक या पत्रिका में प्रकाशित मेरी रचना पढ़ने के लिए देते हैं और फ़ोन करके बताते भी हैं। लेकिन, आप तो आप ही हैं—अपने स्वभाव और व्यवहार के कारण भीड़ में होकर भी भीड़ से अलग दिखने वाले ख़ास इंसान। बतौर पाठक सम्मानराशि भेंट देने की पहल आपने की। बग़ैर इस एहसास के कि आप क्या अलग कर रहे हैं। पाठक और श्रोता द्वारा साहित्य पर सम्मान/पुरस्कार पहले भी मिला मगर औपचारिक रूप में, भव्य आयोजन के साथ। यह जो अनियोजित था, तत्काल घटित था, उसने मुझे अधिक भावुक किया। 

आपको याद हो न हो, मुझे याद है, २०२३ में प्रकाशित मेरे कहानी संग्रह ‘ब्लैक होल के भीतर’ और ‘अनूठा महात्मा’ का पहला खंड पढ़ने के बाद आपने फ़ोन करके प्रतिक्रिया तो दी ही, पूछा भी कि कब आऊँगी। और फिर मेरे आने पर पहले से तैयार एक लिफ़ाफ़ा मेरी हथेली पर रख दिया। मैंने लेने से इनकार किया तो आपकी आवाज़ भीगने लगी, “इन किताबों पर तो बड़े पुरस्कार मिलने चाहिए, मैं छोटा आदमी भला क्या दे सकता हूँ! मना मत कर! एक दिन तुझे बड़े-बड़े पुरस्कार मिलेंगे। ये कुछ भी नहीं।” . . . और मेरे मना करने का हठ ढीला पड़ने लगा तो आपकी आँखों की चमक बढ़ने लगी। . . . और मैंने लिफ़ाफ़ा थाम लिया। आपने ताक़ीद की, “लिफ़ाफ़ा पर्स में डाल ले नहीं तो भूल जाएगी।” फिर कुछ पल रुककर कहा, “यहाँ किसी को बताने की ज़रूरत नहीं है।” 

जब मैंने कहा, “एक तरफ़ रिवॉड देते हो, दूसरी तरफ़ बताने से मना करते हो?” 

“कौन-सा तेरे को लाख रुपये दे रहा! रिवॉड तो बड़े-बड़े होते हैं। अब इस लायक़ रहा नहीं। . . . इसे ब्लेसिंग मान ले . . . और इस पर बहस मत कर।” 

आपके इस आदेश के बाद मैंने इस पर कुछ नहीं कहा, कुछ नहीं पूछा। घर जाकर देखा तो पाँच हज़ार की राशि में अरबों अनमोल आशीष समाए थे। मैं भावुकता से भरी देर तक बैठी रह गई थी, फिर आपको फ़ोन करके कहा था, “यह संस्थाओं से मिले रि’वॉड से बहुत ऊपर है।” फ़ोन पर आप चुप थे, मगर मुझे आपकी चुप्पी के भीतर की आवाज़ सुनाई और आँखों की नमी दिखाई दे रही थी। 

आपको याद है, एक बार जब मैं यात्रा वृत्तांत ‘पहाड़ का बुलावा आया’ आपको भेंट देने गई थी तब आपने बताया था, “तेरे भाई (अरुण हांडा भैया) ने नया चश्मा बनने दिया है। चार-पाँच दिन में आ जाएगा।” 

और मैंने कहा था, “आँखों पर ज़ोर देने की ज़रूरत भी नहीं है।” 

“किताब रहने दे। चश्मा आएगा, तभी पढ़ूँगा।” कहकर आपने मुझे निश्चिंत कर दिया। मगर फिर क्या किया आपने, याद है? मेरे घर वापस आने के बाद मैग्नीफ़ाइंग ग्लास से पढ़ना शुरू कर दिया। सप्ताह भी न बीता होगा कि मुझे फ़ोन करके बताया, “बेटे! तूने तो घर बैठे ही कई पहाड़ों की यात्रा करा दी। लगा, सचमुच उन जगहों पर पहुँच गया।” 

ख़ुश होने के बजाय मैं हैरान हुई और पूछा, “आपका चश्मा कब आया? इतनी जल्दी पढ़ भी लिया?” 

“और नहीं तो क्या, बिना पढ़े बता रहा हूँ। चश्मा तो तीन दिन बाद आया। उसके पहले मैग्नीफ़ाइंग ग्लास से पढ़ता रहा। बड़ा अच्छा लिखा है तूने।” 

इस टेलीफ़ोनिक संवाद के बाद मुझे देर तक समझ नहीं आया कि मैं अपने इस अनूठे पाठक के लिए ईश्वर को शत-शत नमन करूँ या मुझे आपके स्वास्थ्य की जो फ़िक़्र है, उसे अभिव्यक्त करूँ, आपको समझाऊँ। बाद में समझाना चाहा था तो आप हँस पड़े और चंचल बच्चे की तरह बोले, “अब तो पढ़ लिया। इतना इंटरेस्टिंग था कि एक के बाद एक पढ़ता चला गया। ख़त्म करने के बाद तुरंत तुझे फ़ोन किया। मेरा फ़ोन काम नहीं कर रहा था तो अनुज को बोला।” 

मैं क्या कहती! निः शब्द रही—स्वयं को धन्य-धन्य मानती हुई। 

बीच के कालक्रमों में एक बार आपसे लिफ़ाफ़े वाला आशीर्वाद न लेने की मैंने ढिठाई दिखाई और आपका खिला चेहरा मुरझाता देखकर मैंने उसमें से एक नोट रख लिया। फिर आपको समझाने की कोशिश की। आपको नाराज़ या उदास देख भी तो नहीं सकती थी। 

वर्ष २०२५! आपने मुझे फिर भावुक कर दिया। कहानी संग्रह ‘रुकते-चलते क़दम’ पढ़ते हुए आप केंद्रीय पात्रों से गहरे तक जुड़ गए थे। आपको याद है? दोपहर को पुस्तक भेंट देने के बाद मैं घंटे-डेढ़ घंटे के लिए रजनी मासी के पास इसलिए चली गई ताकि आप सो जाएँ, मगर जब लौटकर आई तो आपको सोफ़े पर बैठे पुस्तक में लीन पाया। आप इतने खोए थे कि मेरी आहट भी न मिली। मैंने चुपके से फोटो खींच ली। अनुज ने टोका, तब आपका ध्यान मेरी तरफ़ गया। आपको शायद अनुमान था कि मैं कुछ कहूँगी, ग़ुस्सा दिखाऊँगी कि ‘आराम क्यों नहीं किया?’ इसलिए मेरे चेहरे को पढ़ते हुए झट बोल पड़े, “आओ बेटे! नींद नहीं आ रही थी तो पढ़ने लगा। तू तो बड़ी देर ऊपर बैठ गई।” 

“तो आप उतनी देर से ऐसे ही बैठे हैं?” मेरे स्वर में हैरानी बसी, आपके चेहरे पर मुस्कान। 

“हाँ तो? दो कहानी पढ़ भी ली,” फिर इत्मीनान से बोले, “किसी और की होती तो रख देता, तेरी (नई) किताब रखी नहीं गई।” 

मैं मौन! आपने इस तरह जाने कितनी ही बार निःशब्द कर दिया है। एक रचनाकार के लिए इससे बड़ी बात क्या होगी कि १०३वें वर्ष से गुज़रता कोई युगपुरुष सुधी पाठक बना उसकी कृति में डूबा हो। 

आप हठात् उठ खड़े हुए और अलमारी की तरफ़ बढ़ गए। दो-तीन मिनट में पलटे। इस बार लिफ़ाफ़ा नहीं, मुट्ठी में रुपये थे। आए और मेरी हथेली में पकड़ाकर मुट्ठी बंद कर दी, फिर अपनी जगह आकर बैठ गए। मेरे ‘ना-नुकर’ की गुंजाइश ही न छोड़ी। मैं आपका चेहरा पढ़ना चाहती थी। आप थोड़ी देर ख़ामोश रहे, शायद अपने आपको कहानियों से बाहर निकालने की जद्दोजेहद में थे। मैंने टोकना चाहा, पर चुप रही। थोड़ी देर बाद आपने जो कहा, मेरी पलकें नम हो गईं। कैसे भूलूँगी वे शब्द! वह शुभचिंता! और कहाँ सहेजूँ क़लम का इतना मान! आपके शब्द अब तक कानों में बसे हैं— 

“बेटे! मैंने इत्ती दुनिया देखी। क्या नहीं देखा! देश का बँटवारा, दोनों विश्वयुद्ध, इमरजेंसी, आज़ाद हिंदुस्तान और दिनोंदिन उसका बदलता चेहरा—मगर तू तो जैसे इंसान के मन का एक्सरे करती जाती है। इसमें तो तूने बूढ़ों की लाइफ़ का इतना—क्या बोलते हैं उसे—मतलब कि वे क्या सोचते हैं, क्या महसूस करते हैं, सिचुएशन कैसे हैंडल करते हैं–सब कुछ। उनका पास्ट, उनका प्रेजेंट और सबके जीने के अलग-अलग तरीक़े, अलग-अलग हालात, उनके दुःख-सुख के अलग-अलग रूप—मैं कोई क्रिटिक तो हूँ नहीं, हिंदी का स्टुडेंट भी नहीं। फिर भी इतना कह सकता हूँ तेरी कहानियों में बड़ा समाज है। किताब लोगों तक पहुँचनी चाहिए।” 

आप चुप हुए, फिर अनुज से कहा, “पानी लाना। आरती के लिए भी कुछ लाओ।” फिर सीधे-सीधे पूछा, “तेरा प्रकाशक ठीक से मार्केटिंग करता है? किताबों को अ’वॉर्ड/रि’वॉर्ड के लिए भेजता है?” 

“आपको लगता है, इन पर अ’वॉर्ड/रि’वॉर्ड मिलेगा? और मैं तो किसी ख़ेमे को फ़ॉलो भी नहीं करती। न ही कोई झंडा उठाए चल रही हूँ। आप तो देख ही रहे हैं तमाशा . . .” मैं हँस पड़ी थी मगर आपके चेहरे से लगा, आपके लिए यह हँसी की बात नहीं थी। मेरे लिए मेरी रचनाओं के प्रति आपका विश्वास और सम्मान भाव किसी बड़े ख़ज़ाने से कम नहीं है। और सबसे बड़ी बात कि आप हर पुस्तक में गहराई तक उतरे, उन्हें अपने भीतर उतारा, तभी तो दो-दो बार हस्तलिखित प्रतिक्रिया भेजी। इस बार तो क़लम न पकड़ पाने की स्थिति में आपने डिक्टेट करके आंटी से लिखवाया, अपना हस्ताक्षर किया, फिर भेजा। कोई कल्पना भी कर सकता है कि १०३ वर्ष को भरपूर जीने वाला सजग, सचेत और संवेदनशील व्यक्तित्व चेतना के स्तर पर बतौर पाठक इतना दायित्वबोध रखता होगा! 

अंकल आपको याद हो, न हो मगर मुझे वे ख़ास पल याद हैं जो आपसे मिलकर, आपके कारण बेहद ख़ूबसूरत हो गए थे। झूले में झूलती नन्ही परी से लेकर १०३ वर्ष के आप जैसे सुधी पाठक-श्रोता तक का विस्तार पाकर मेरी कृतियाँ सचमुच धन्य हो गईं। और मन के आह्लाद का क्या ही कहूँ! आपकी संवेदना जितने रूपों में मेरी रचनाओं के साथ थिरकती रही है, वह साधारण नहीं। आप मेरे सर्वश्रेष्ठ पाठक ही नहीं, पूरी सदी को देख पाने योग्य एक बड़ी खिड़की रहे हैं जहाँ से एक साथ कई कोने को देख पाना सम्भव हुआ। जानती हूँ, मेरी बात सुनकर आप फिर सिर ‘ना’ में हिलाकर हँसेंगे और आपके छोटे-छोटे दाँत चमकने लगेंगे मगर यही सच है कि आप जैसे कर्मठ सत्याग्रही, निष्कामकर्मी, जनसेवी और गंभीर अध्येता को निज जीवन में नमक-पानी की तरह घुला पाना मेरे सौभाग्य का प्रमाण है। 

मुझे इस बात की तसल्ली है कि आपको ‘अद्भुत संन्यासी’ पुस्तक समर्पित कर पाई और उसका विमोचन भी आपके हाथों सम्पन्न हुआ। २०२० का वह क्रूर समय, वह कोरोनाकाल मुझे मुस्कुराने की वजह दे गया। इतना ही नहीं, आपने ऑनलाइन परिचर्चा में भी सहभागिता निभाई। काश! भगवतधाम में इंटरनेट ने बेहतर साथ दिया होता तो श्रोता आपके विचार अधिक सुन पाते! 

मुझे इस बात की भी तसल्ली है कि आपके जीवन का सार, आपका व्यक्तित्व-कृतित्व और आपके साथ जुड़ी स्मृतियों का गुलदस्ता संस्मरण के रूप में प्रकाशित हुआ और फिर यह आपकी तस्वीर के साथ संस्मरण संग्रह का हिस्सा बना और आप उसे पढ़ पाए। और इस बात की संतुष्टि है कि साहित्यायन ट्रस्ट की ओर से तो आपकी सेवा के लिए सर्वोच्च सम्मान ‘समष्टि साधक सम्मान’ अर्पित किया था, सर्वश्रेष्ठ पाठक का सम्मान शेष था, समय ने वह अवसर भी प्रदान कर दिया। आपके १०३ वर्ष की पूर्णता पर हमने अपने कुछ अरमान तो पूरे कर ही लिए, जो शेष रहे थे। प्रकाशक साथी अद्विक पब्लिकेशन के निदेशक अशोक गुप्ता, जिन्हें भी आपसे सकारात्मक ऊर्जा मिलती थी, के साथ मिलकर बिना ताम-झाम के जन्मोत्सव का मनचाहा आयोजन हो पाया। आपके इस ख़ास दिन ने हम सभी को अविस्मरणीय मधुर स्मृतियाँ दी हैं। ३ सितंबर २०२५ को आपके जन्मोत्सव की यादें थाती हैं। मैं अनुज की भी आभारी हूँ जिसने जब-तब आपको किताब पढ़ते देखकर चुपके से फोटो खींचकर भेज दी। वे तस्वीरें अनमोल सौग़ात हैं मेरे लिए . . .

अंकल, अब तक की मान्यता यही रही कि सर्जक/रचनाकार सदैव अपने कृतित्व में जीवित रहते हैं। आपने यह नई लक़ीर खींची कि आप जैसे पाठक भी सदैव अस्तित्व में रहते हैं। अब जब भी मेरी क़लम चलेगी, अब जब भी मेरी नई पुस्तक समाज के सम्मुख होगी, सर्वश्रेष्ठ पाठक के रूप में आपकी उपस्थिति दर्ज़ रहेगी . . . 

अंकल, स्मृति-सागर की अनंतता को कहाँ तक अभिव्यक्त करूँ, इसलिए क़लम को यहीं विराम देती हूँ। मैंने कहीं पढ़ा है कि भाव-विचार/ स्मृतियाँ जब शब्द रूप ले लेते हैं और ध्वनित होते हैं तो उसकी अनुगूँज ब्रह्मांड में मौजूद रहती है। तो आप जिस भी लोक में हों, यह पत्र ध्वनित रूप में आप तक पहुँच ही जाएगा। आप तो मौन को भी सुनते-गुनते रहे हैं। शेष भाव-लहरें उस मौन को समर्पित करती हूँ। 

आपकी बेटी 
आरती स्मित

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