हसीन सपने
अविनाश ब्यौहार
वह बेरोज़गार था। लेकिन उसने अफ़सरशाही बख़ूबी देखी और उनकी मान, प्रतिष्ठा तथा ऐशोआराम भी देखे।
एक दिन वह गहरी नींद में सो रहा था। एक सपना उसके दिमाग़ में चलने लगा कि वह भी क्लास वन ऑफ़िसर हो गया हैं। दरवाज़े पर दरबान है। घर के चारों ओर पुलिस का पहरा है। दरबान आते-जाते सेल्यूट बजाता है। ड्राइवर कार का दरवाज़ा खोलता है। वह कार में बैठता है। फिर कार सरपट ऑफ़िस की ओर दौड़ने लगती है। कार ऑफ़िस में रुकी। ड्राइवर ने कार का दरवाज़ा खोला। चपरासी ने अटैची और फ़ाइलें अपने हाथ में ले लीं। ऑफ़िस में मातहत कर्मचारी उन्हें देखकर खड़े हो गए और नमस्कार की मुद्रा में सभी की गर्दनें हिलने लगीं। चेंबर में दो एसी चल रहे थे और वे कुर्सी पर पसर गए।
तभी एक चीखती सी आवाज़ कान के पर्दे के आर-पार हो गई। वह हड़बड़ाकर उठ बैठा। बहन बोली-भैया सुबह हो गई है तुम्हें फुटबॉल की प्रैक्टिस के लिए मैदान में नहीं जाना है क्या?
उसकी जब आँखें खुली तो वह जो सुखद सपना देख रहा था वह छन्न से टूट गया। वह हक़ीक़त में लौट आया था। उसे अपना सपना “मुंगेरीलाल के हसीन सपने” जैसा लगा।
उसने गहरी ठंडी सांसें छोड़ीं और चहल-क़दमी करने लगा।
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