लू-लपटें
अविनाश ब्यौहार
लू-लपटों का
राज है।
दुपहर की है
धूप जलाती।
और मनाली
हमको भाती॥
हुई कोढ़ में
खाज है।
बेढंगा सा
वक़्त आ गया।
आज आँख में
रक्त आ गया॥
दुख में डूबा
साज़ है।
ख़ुशियों का
उपहार मिले तो।
गूलर का ज्यों
फूल खिले तो॥
ख़ुद पर हमको
नाज़ है।
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