लू-लपटें

अविनाश ब्यौहार (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

लू-लपटों का
राज है। 
 
दुपहर की है 
धूप जलाती। 
और मनाली 
हमको भाती॥
 
हुई कोढ़ में 
खाज है। 
 
बेढंगा सा
वक़्त आ गया। 
आज आँख में 
रक्त आ गया॥
 
दुख में डूबा 
साज़ है। 
 
ख़ुशियों का
उपहार मिले तो। 
गूलर का ज्यों 
फूल खिले तो॥
 
ख़ुद पर हमको 
नाज़ है। 

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