बुढ़ापा
अविनाश ब्यौहार
उसने बचपन देखा फिर जवानी देखी। अब 60 वर्ष का हो चला है, यानी शनैः-शनैः बुढ़ापे की ओर क़दम बढ़ा रहा है। उसने जब बुढ़ापे के लक्षण देखा तो उसकी आँखों के आगे झूल गया वह झुर्रीदार चेहरा, कमर झुकी हुई, खाल में ढीलापन, आँखें धुँधला चलीं, लाठी के बल पर चलना, जोड़ों में दर्द, पुरानी यादों के सहारे जीना, आर्थिक रूप से किसी पर निर्भर होना तथा सामाजिक पारिवारिक उपेक्षा भी शामिल है।
बुढ़ापा जीवन का अंतिम और परिपक्व चरण है।
अब जब वह बुढ़ापे की याद करता है तो सिहर उठता है। शरीर में एक अचिह्नित झुनझुनी सी दौड़ जाती है पर काल के क्रूर चक्र से कौन बच सका है। बुढ़ापा सबको आना है इस सत्य को कोई झुठला नहीं सकता।
आख़िरकार उसकी आंँखें कमरे की छत पर जा टिकती हैं और वह ज़िन्दगी के बारे में कुछ सोचने लगता है। ऐसा कुछ जो उसके अंदर जवानी की ऊर्जा फिर से भर दे।
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