उत्तराधिकारी
सुरेंद्र कल्याण ‘बुटाना’
हमने
अपने बच्चों को
घर दिए,
ज़मीन दी,
डिग्रियाँ दीं,
बैंक खाते दिए।
बस एक चीज़
देना भूल गए—
शर्म।
इसलिए
वे सब कुछ
विरासत में ले गए,
लेकिन
मनुष्य होना
नहीं सीख पाए।
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