समय के सामने
सुरेंद्र कल्याण ‘बुटाना’
समय
किसी राजा का मित्र नहीं,
किसी ग़रीब का शत्रु नहीं।
वह सबके लिए
एक समान चलता है।
उसके सामने
साम्राज्य भी झुके हैं,
और महत्त्वाकांक्षाएँ भी।
मनुष्य
अपने जीवन में
बहुत कुछ इकट्ठा करता है।
धन,
प्रतिष्ठा,
उपलब्धियाँ,
सम्बन्ध।
पर समय
धीरे-धीरे
सबका मूल्य बदल देता है।
जो आज बहुत बड़ा लगता है,
वह कल
एक स्मृति बन जाता है।
जो आज
असहनीय दुःख लगता है,
वह भी
एक दिन
अनुभव बन जाता है।
समय
हमें सिखाता है
कि स्थायी कुछ भी नहीं।
न सफलता,
न असफलता,
न सुख,
न दुःख।
स्थायी है तो केवल
मनुष्य का आचरण।
यही कारण है
कि अंततः
लोग हमारे पद नहीं,
हमारा व्यवहार याद रखते हैं।
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- कविता
-
- अंतिम चिट्ठी
- अंतिम प्रश्न
- आदमी की तलाश
- आदमी के भीतर
- उत्तराधिकारी
- एक अच्छा मनुष्य
- करुणा
- करुणा का घर
- गाँव की शाम
- गाँव जो अब भी बसता है
- जीवन
- दीपक
- नदी
- नदी का धर्म
- पृथ्वी
- पृथ्वी की चुप्पी
- पृथ्वी की थकान
- प्रमाण
- बूढ़ा पेड़
- बूढ़ा पेड़
- भविष्य के नाम
- भारत विभाजन और मानवीय दर्द
- मन की खिड़की
- मनुष्य का घर
- मनुष्य होने का अर्थ
- माँ की अलमारी
- मौन
- मौन - 1
- युद्ध के बाद
- रोटी और सपने
- शहर में अकेला आदमी
- सभ्यता
- समय का पेड़
- समय की धूल
- समय के सामने
- स्मृतियाँ
- स्मृतियों का उजाला
- विडियो
-
- ऑडियो
-