गाँव की शाम
सुरेंद्र कल्याण ‘बुटाना’
गाँव की शाम में
एक अलग ही शान्ति होती है।
सूरज ढलता है,
पक्षी लौटते हैं,
और दिन भर की थकान
धीरे-धीरे
हवा में घुल जाती है।
जैसे प्रकृति कह रही हो—
अब विश्राम करो।
गाँव की शाम में
एक अलग ही शान्ति होती है।
सूरज ढलता है,
पक्षी लौटते हैं,
और दिन भर की थकान
धीरे-धीरे
हवा में घुल जाती है।
जैसे प्रकृति कह रही हो—
अब विश्राम करो।