पृथ्वी की चुप्पी

15-06-2026

पृथ्वी की चुप्पी

सुरेंद्र कल्याण ‘बुटाना’ (अंक: 299, जून द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

पृथ्वी
बहुत कम बोलती है। 
वह शिकायत नहीं करती, 
आरोप नहीं लगाती, 
कोई माँग भी नहीं रखती। 
वह केवल देती है। 
अन्न देती है, 
जल देती है, 
वन देती है, 
और जीवन देती है। 
मनुष्य ने
उसकी गोद से
सभ्यताएँ उठाईं, 
नगर बसाए, 
कारख़ाने बनाए, 
और विकास के नए अध्याय लिखे। 
पर इस यात्रा में
वह यह भूल गया
कि पृथ्वी
संसाधन नहीं, 
सम्बन्ध है। 
जब जंगल कटते हैं, 
तो केवल पेड़ नहीं गिरते, 
भविष्य का एक हिस्सा गिरता है। 
जब नदियाँ प्रदूषित होती हैं, 
तो केवल जल नहीं मरता, 
सभ्यता की स्मृति मरती है। 
पृथ्वी की चुप्पी
उसकी कमज़ोरी नहीं, 
उसका धैर्य है। 
पर धैर्य भी
अनंत नहीं होता। 
और जब प्रकृति
उत्तर देती है, 
तो उसके शब्द
सूखे, बाढ़ और तूफ़ानों में सुनाई देते हैं। 
इसलिए
पृथ्वी को बचाना
किसी अभियान का विषय नहीं, 
अपने अस्तित्व को बचाने का प्रश्न है। 
 

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