नदी का धर्म

15-09-2026

नदी का धर्म

सुरेंद्र कल्याण ‘बुटाना’ (अंक: 302, सितम्बर द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

नदी ने कभी
अपनी यात्रा का अभिमान नहीं किया।
 
वह पर्वत से निकली,
पत्थरों से टकराई,
मैदानों से गुज़री,
और समुद्र में मिल गई।
 
उसने सिखाया—
जीवन का धर्म
रुकना नहीं,
बहते रहना है।

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