नदी

सुरेंद्र कल्याण ‘बुटाना’ (अंक: 299, जून द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

नदी ने कभी
पीछे मुड़कर नहीं देखा। 
वह बहती रही, 
पत्थरों से टकराती रही, 
रास्ते बनाती रही। 
उसे मालूम था—
रुकना
उसकी नियति नहीं।

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