पृथ्वी की थकान

15-09-2026

पृथ्वी की थकान

सुरेंद्र कल्याण ‘बुटाना’ (अंक: 302, सितम्बर द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

पृथ्वी आजकल
कम बोलती है।
 
नदियों की आवाज़ में
पहले जैसी खुशी नहीं रही।
 
जंगलों की साँसें
भारी लगती हैं।
 
पक्षी
अब भी गाते हैं,
पर उनके गीतों में
एक बेचैनी है।
 
मनुष्य ने विकास की दौड़ में
इतना शोर किया
कि प्रकृति की फुसफुसाहट
सुनाई देना बंद हो गई।

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