पृथ्वी की थकान
सुरेंद्र कल्याण ‘बुटाना’
पृथ्वी आजकल
कम बोलती है।
नदियों की आवाज़ में
पहले जैसी खुशी नहीं रही।
जंगलों की साँसें
भारी लगती हैं।
पक्षी
अब भी गाते हैं,
पर उनके गीतों में
एक बेचैनी है।
मनुष्य ने विकास की दौड़ में
इतना शोर किया
कि प्रकृति की फुसफुसाहट
सुनाई देना बंद हो गई।
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