बूढ़ा पेड़
सुरेंद्र कल्याण ‘बुटाना’
गाँव के बाहर
एक बूढ़ा पेड़ खड़ा है।
उसने
पीढ़ियों को जाते देखा है।
उसकी छाया में
बच्चे खेले,
युवाओं ने सपने देखे,
और बुज़ुर्गों ने
जीवन के अनुभव बाँटे।
उसने
गर्मियाँ भी देखीं,
बरसातें भी,
आँधियाँ भी।
पर वह
हर मौसम के बाद
फिर खड़ा हो गया।
आज
उसकी शाखाएँ कम हैं,
पत्ते पहले जैसे नहीं,
पर उसकी गरिमा
अब भी वैसी ही है।
उसे देखकर लगता है
कि जीवन का सौंदर्य
युवा रहने में नहीं,
उपयोगी बने रहने में है।
और सम्मान
शक्ति से नहीं,
धैर्य से अर्जित होता है।
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