सभ्यता
सुरेंद्र कल्याण ‘बुटाना’
सभ्यता ने कहा—
मैं आगे बढ़ रही हूँ।
मैंने देखा—
पेड़ पीछे छूट गए,
नदियाँ पीछे छूट गईं,
गाँव पीछे छूट गए,
और
मनुष्य भी।
अब
केवल इमारतें
आगे बढ़ रही थीं।
सभ्यता ने कहा—
मैं आगे बढ़ रही हूँ।
मैंने देखा—
पेड़ पीछे छूट गए,
नदियाँ पीछे छूट गईं,
गाँव पीछे छूट गए,
और
मनुष्य भी।
अब
केवल इमारतें
आगे बढ़ रही थीं।