विशेष: यह कहानी सर्वप्रथम पत्रिका "विभोम-स्वर" में प्रकाशित हुई जिसके परिणाम स्वरूप खण्डवा (मध्य प्रदेश) के एक साहित्यिक समूह ने "वाणी संवाद" ने इस कहानी पर चर्चा करने के लिए एक विशेष गोष्ठी का आयोजन किया। उस गोष्ठी की चर्चा साहित्य कुञ्ज के अगस्त प्रथम अंक 186 में प्रकाशित हुई। इस चर्चा को पढ़ने के लिए कृपया  क्लिक करें — "छतरी पर चर्चा"

 

सुरेन्द्रनाथ वर्मा अकेले थे। ऐसा नहीं  था कि उनका परिवार नहीं था। दो बेटे थे, दो बहुएँ थीं, दोनों के दो-दो बच्चे थे। यानी भरा-पूरा परिवार था। हाँ, बस पत्नी को स्वर्गवास हुए दो वर्ष बीत चुके थे। वैसे अकेले तो पत्नी के जीवित रहते हुए भी थे। उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था कि वह भीड़ में भी अकेले ही होते थे। सौम्य व्यक्तित्व वाले सुरेन्द्रनाथ वर्मा के चेहरे पर एक मुस्कुराहट टँगी रहती। पर यह मुस्कुराहट किसी को भी मित्र बनने के लिए आमन्त्रित नहीं करती। बल्कि एक तरह की तख़्ती थी – दूरी बनाए रखें। वह बहुत ही शिष्ट व्यक्ति थे। हद से अधिक; इतने शिष्ट कि उनकी शिष्टता की रेखा पार करके कोई उनका मित्र बन ही नहीं सका। उनके परिचित बहुत थे, पर मित्र एक भी नहीं था। 

पत्नी की मृत्यु के बाद दोनों बेटों ने बहुत आग्रह किया कि पापा अपना घर बेच कर हमारे साथ रहने लगो। सुरेन्द्रनाथ को यह मंज़ूर नहीं था कि वह किसी पर बोझ बनकर रहें; किसी की स्तंत्रतता में व्यवधान डालें। बहुओं ने सलाह दी कि दोनों घरों में एक-एक शयनकक्ष पापा का तय कर दिया जाए जिनमें उनके कपड़े सदा टँगे रहें। एक घर से दूसरे में जाने के लिए अटैची पैक न करना पड़े। इस तरह से उनकी व्यक्तिगत "स्पेस" भी रहेगी और वह अकेले भी नहीं रहेंगे। वह नहीं माने। फिर बेटों ने पोते, पोतियों का नाम लेकर ’भावनात्मक ब्लैकमेल’ करने का प्रयास किया। सुरेन्द्रनाथ टस से मस न हुए। अंत में बच्चों ने भी कहना छोड़ दिया। 

कुछ महीने तो सुरेन्द्रनाथ ने अपनी पूर्ण स्वतंत्रता का उत्सव मनाया। सुबह जल्दी उठते। इतनी जल्दी कि अगर उनकी पत्नी जीवित होती तो वह अवश्य ही उनका बिस्तर दूसरे कमरे में लगा देती। अब वह मुस्कुराते हुए उठते कि कोई टोक नहीं रहा। दाँतों में ब्रश करने के बाद, खुली आवाज़ में गला खंखारते हुए साफ़ करते। कोई भी टोकने वाला जो नहीं था। इसके बाद नीचे किचन में आकर गरम पानी में गलगल का रस निचोड़ कर कप भरते। कप को दायें हाथ में उठाकर एक कमरे से दूसरे कमरे में जाते हुए, पूरे घर का निरीक्षण करते हुए आधा घंटा बिता देना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं थी। किसी दिन मन होता तो ध्यान लगाने बैठ जाते। ध्यान के दौरान भी सोचते हुए  प्रसन्न रहते कि देखो मैं ध्यान लगा के बैठा हूँ और कोई आकर मुझ से कोई बेकार का प्रश्न नहीं पूछ रहा है। दिल करता तो कुछ योग के आसन करते और सैर के लिए निकल जाते। 

उनकी सैर का रास्ता भी कभी बदलता नहीं था। उन्हें अच्छी तरह से याद था कि किस घर के सामने वाले लॉन में कौन से पौधे लगे हैं और कौन से फूल खिलने वाले हैं और कौन से खिल चुके हैं। घर पहुँच कर नाश्ता बनाते, समाचार पत्र पढ़ते। कंप्यूटर, लॉन की देख-रेख, घर की सफ़ाई, दोपहर और रात का खाना और टीवी देखते हुए उनका दिन व्यतीत हो जाता। अगले दिन उनकी वही दिनचर्या फिर से शुरू हो जाती। वह प्रसन्नचित्त थे – मुस्कुरा रहे थे। अकेले बिल्कुल अकेले समय बीत रहा था।

परन्तु अब पिछले एक-दो दिन से उन्हें यह एकांतवास खलने लगा था। बच्चों के आमंत्रण पर फिर से विचार किया और नकार दिया। नहीं, एक बार मना कर चुका हूँ और अगर मैं इतनी स्वतन्त्रता चाहता हूँ तो दूसरे भी तो चाहते ही होंगे। यह कहाँ की शिष्टता होगी कि मैं अपने आपको उन पर थोप दूँ।  फिर सोचा कि सीनियर सिटिज़न क्लब का सदस्य बन जाऊँ। आसपास ही तीन-चार सीनियर्ज़ के क्लब थे। फिर शिष्टता की लक्ष्मण रेखा खाई बन गई। अपरिचितों से बातचीत करनी पड़ेगी। मित्र भी बन सकते हैं। उनके साथ शिष्टतावश उठाना-बैठना पड़ेगा। बातचीत करनी पड़ेगी। अगर ऐसा हुआ तो बेकार की दख़लन्दाज़ी भी आरम्भ हो जाएगी। अकेलेपन को दूर करने का यह भी विकल्प सही नहीं था। तीसरे दिन से वह अपने अकेलेपन से व्यथित होने लगे। सारा दिन उन्होंने सब कुछ वही किया जो पिछले दो वर्षों से करते आए थे पर उन्हें कोई प्रसन्नता नहीं हुई कि वह स्वतंत्र हैं। सारा दिन ख़ालीपन उन्हें सताता रहा। उन्हें लगा कि अब जीवन का कोई उद्देश्य नहीं रहा। पत्नी के बारे में अभी भी उनके मन में कोई ख़्याल नहीं आया। पता नहीं कितनी परतों के नीचे उन्होंने अपनी प्रेम-स्मृतियों को दबा रखा था। रात को वह सोए भी खिन्नमना तो रात तो बेचैनी में बीतनी ही थी।

अगली सुबह निश्चित समय पर उनकी नींद खुल गई। आज वह बिस्तर से उठे नहीं। रात भर करवटें बदलने के कारण थके-थके से थे। उन्हें विचार आया कि जीवन शैली बदलनी चाहिए। सारी उम्र उन्होंने अनुशासन का पालन करते हुए, शायद व्यर्थ ही बिता दी। उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था कि जो लोग उनकी तरह सुबह मुँह अँधेरे नहीं उठते, उनका जीवन कैसा होता है। नई जीवन शैली का आरम्भ उन्होंने देर तक बिस्तर में लेटे रहने से आरम्भ किया। पर सोचने से तो सब कुछ नहीं हो जाता। साढ़े चार बजते-बजते उन्हें लगने लगा कि समय बेकार में बीता जा रहा है। वह उठ खड़े हुए और दैनिक चर्या फिर स्वचालित-सी आरम्भ हो गई। गलगल का पानी बनाने के बाद उन्होंने सप्रयास कमरों का नरीक्षण नहीं किया बल्कि टीवी ऑन कर लिया। चाहे उनका टीवी उसी चैनल से आरम्भ हुआ जिसपर वह टिका रहता था – सीपी24; यही उनका प्रिय चैनल था। एक ही स्क्रीन पर मौसम से लेकर स्टॉक मार्केट तक की जानकारी। समाचार से लेकर ट्रैफिक रिपोर्ट का निरंतर दोहराया जाना उन्हें रोचक लगता। आमतौर पर सुरेन्द्रनाथ नाश्ता करते हुए या समाचार पत्र पढ़ने के बाद टीवी देखते थे। आज उन्होंने सैर पर जाने से पहले ही देखना आरम्भ कर दिया था। पर कब तक देखते। शरीर तो सैर पर जाने को व्याकुल था।

उन्होंने सैर के कपड़े और जूते डाले।  घर से निकलने से पहले आसमान की ओर देखा, बादल छा रहे थे। शायद वर्षा की संभावना बन रही थी; उन्होंने छतरी साथ ले जाना उचित समझा। आज सैर के समय उनकी चाल में अंतर था। एक हाथ में  छाता पकड़ रखा था जिसकी नोक को ज़मीन पर रखते हुए शान के साथ चले जा रहे थे और दूसरी बाँह भी आज कुछ अधिक गति के साथ आगे-पीछे हो रही थी। यह अंतर उन्हें अच्छा लगा। उन्हें यह नवीनता, जीवन की नीरसता को सरस बनाती-सी लगी। उनके होंठों पर मुस्कुराहट फैल गई। वापिसी पर वह गली के नुक्कड़ पर स्थित डेली मार्ट स्टोर पर रुके। प्रायः वह यहाँ से प्रतिदिन कुछ न कुछ ख़रीदते थे। चाहे वह उन्हें चाहिए होता था या नहीं, पर यह उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। दुकानदार भी उनकी मुस्कुराहट का अभिवादन मुस्कुराहट से ही करता। केवल आवश्यक बात के सिवा कोई बातचीत कभी नहीं हुई थी। आज सुरेन्द्रनाथ ने जीवन में पहली बार लॉटरी का टिकट ख़रीदने का निर्णय लिया। 

इतनी सुबह, उनके सिवाय डेली मार्ट में कोई भी नहीं था। काउंटर के पीछे खड़े जाने-पहचाने व्यक्ति ने बिना बोले ही आँखों से पूछा कि ’क्या कर सकता हूँ’।

सुरेन्द्रनाथ बोले, “एक लॉटरी का टिकट प्लीज़।"

“कौन सी?” संक्षिप्त सा प्रश्न था।

सुरेन्द्रनाथ अटक गए। क्योंकि लॉटरी लेने का निर्णय आकस्मिक था। कोई सोची-विचारी योजना नहीं थी। उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था कि लॉटरी कई प्रकार की हो सकती है। अचानक काउंटर के शीशे के नीचे रखी लॉटरी ट्रे में इतनी प्रकार की लॉटरी देख कर वह विस्मित रह गए। दुकानदार उन्हें जानता था, सो वह सुरेन्द्रनाथ की दुविधा समझ गया। उसने उन्हें बताना शुरू किया, यह स्क्रैच एंड विन है, कितने प्रकार की है, कितने पैसे जीत जा सकते हैं। यह लोटेरियो है, यह लॉटो मैक्स है यह . . . सुरेन्द्रनाथ लॉटरियों के जंगल में अबोध बालक की तरह खो गए। 

दुकानदार ने उन्हें फिर उबारा, “लॉटो मैक्स ले लीजिए। पाँच डॉलर की है पर आपको नंबरों के तीन सेट मिलेंगे। जीतने की संभावना अधिक होती है। ग्रैंड प्राईज़ के अलावा एक मिलयन डॉलर के भी कई प्राईज़ हैं।"

हालाँकि सुरेन्द्रनाथ को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था परन्तु उन्हें लगा कि किसी ने उनका हाथ थाम लिया है। उत्साहित होकर बोले, “हाँ, वन लॉटो मैक्स प्लीज़।"

दुकानदार ने फिर पूछा, “क्विक पिक या आप नम्बर चुनेंगे?" 

सुरेन्द्रनाथ फिर अवाक रह गए। इस बार भी दुकानदार ने ही बात सँभाल ली, “इस बार क्विक पिक ही ले  लें।" उसने एक बटन दबाया और सुरेन्द्रनाथ के जीवन की पहली लॉटरी का टिकट छप गया।

दुकानदार सुरेन्द्रनाथ को लॉटो मैक्स का टिकट थमाते हुए मुस्कुराया, “गुड लक!” और सुरेन्द्रनाथ ने अपने हाथ की छतरी काउंटर के साथ टिकाई। लॉटो मैक्स के टिकट को बड़े ध्यान से तह किया और अपने पर्स में सहेज लिया। प्रसन्नचित्त हो मुड़े और बाहर की ओर चल दिए। अभी एक क़दम ही लिया था कि पीछे दुकानदार ने पुकारा, “सर, अपना छाता मत भूलें।"

सुरेन्द्रनाथ पलटे और उन्होंने दुकानदार की आँखों में झाँकते हुए कहा, “धन्यवाद!”

दुकानदार मुस्कुराया, “क्या आज बारिश होने वाली है?”

सुरेन्द्रनाथ विस्मित थे। अभी तक किसी ने उनसे बिना मतलब के कभी बात ही नहीं की थी या उनकी मुस्कुराहट ने करने नहीं दी थी। वह बोले, “हाँ, सीपी24 की तो यही चेतावनी है।"

“अरे साहब, ये चेतावनियाँ तो बेकार की बातें हैं। मैं तो हवा सूँघ कर बता देता हूँ कि बारिश आने वाली है या नहीं।"

अब सुरेन्द्रनाथ अटक गए, बात को आगे कैसे बढ़ाएँ। वह मुस्कुराए और सिर झुका कर अभिवादन करते हुए डेली-मार्ट से बाहर निकल आए।

उनका बाक़ी का दिन इस छोटे से अनुभव का विश्लेषण करते हुए बीता। यह निरर्थक संवाद उन्हें महत्वपूर्ण लगने लगा। सुरेन्द्रनाथ का पूरा जीवन आँकड़ों का विश्लेषण करते हुए बीता था। जिस नीरस काम को कोई भी नहीं करना चाहता था, उसमें उन्हें बहुत आनंद आता था। उन्हें लगता कि पूरे विश्व की अर्थ व्यवस्था शायद उन्हीं के विश्लेषित आँकड़ों पर ही निर्भर करती है। हर आँकड़े का महत्व होता है। सब कुछ मिलकर सार्थक हो जाता है। परन्तु अब यह निरर्थक संवाद इतना आनंददायक होगा, उन्होंने अनुमान भी नहीं लगाया था। उन्हें नई जीवन शैली अच्छी लगी।

रात को जब वह सोए तो सन्तोष से सोए।

अगली सुबह वह बहुत उत्साह से जागे। आज जीवन उनके लिए कौन सी नई संभावनाएँ लेकर खड़ा है?

आज सैर से वापिसी पर डेली मार्ट नहीं रुके। सीधा घर पहुँचे। नाश्ता किया और सीपी24 चैनल देखते हुए सोचते रहे कि आज क्या नया किया जाए? उन्होंने ट्रैफ़िक के बारे में सूचना सुनी कि आज इस समय किसी रूट की बसें बंद हैं। इसलिए यात्रियों के लिए विशेष बसों का प्रबन्ध किया जा रहा है। सुरेन्द्रनाथ मुस्कुराने लगे। पिछली बार जब उन्होंने टीटीसी (टोरोंटो ट्रांज़िट कमीशन) की बस में यात्रा की थी, उसे बीस से भी अधिक बरस बीत चुके थे। उन्हें विचार आया कि आज कार को घर छोड़ कर बस द्वारा टोरोंटो डाउनटाउन जाएँ और पूरा दिन वहाँ बिताकर शाम को घर लौटें। परन्तु इन बीस वर्षों में तो बहुत कुछ बदल गया होगा। उन्होंने कंप्यूटर ऑन किया और टीटीसी में यात्रा कैसे करें, की पूरी जानकारी पढ़ डाली। इस जानकारी में उन्हें यह भी पता चला कि बस यात्रा के दौरान सबसे अधिक खोने वाली वस्तु छतरी है। सुरेन्द्रनाथ मुस्कुराए और उन्होंने पूरी योजना रच डाली। 

जल्दी से तैयार हुए। घर के पास शॉपर्ज़ ड्रग मार्ट से जाकर यात्रा करने के लिए प्रेस्टो कार्ड बनवाया और वापिस घर आकर, अपना पता लिख कर एक टैग छतरी के हैंडल पर चिपका दिया। आज के अभियान के लिए छतरी समेत निकल गए। 

बस पर चढ़ते ही उन्होंने प्रेस्टो कार्ड का प्रयोग पहली बार किया। यह बस सबवे ट्रेन के स्टेशन तक जाती थी। वहाँ से सुरेन्द्रनाथ ने डाउनटाउन की ट्रेन पकड़ी और शहर के मध्य में उतर गए। घूमने के बाद वापिस लौटते हुए उन्होंने सबवे ट्रेन में अपनी छतरी जान-बूझकर छोड़ दी। सुरेन्द्रनाथ जब आज घर पहुँचे तो उनकी मुस्कुराहट लोप ही नहीं हो रही थी। उन्हें आशा थी कि अवश्य ही एक-दो दिन में टीटीसी के ऑफ़िस से फोन आएगा कि ’आपकी छतरी मिली है और कृपया आकर इसे ले जाएँ’। और हुआ भी यही। उस दिन सुरेन्द्रनाथ फिर तैयार हुए। अपना प्रेस्टो कार्ड उन्होंने जेब में डाला और टीटीसी के ऑफ़िस से जाकर अपना छाता वापिस ले आए। सुरेन्द्रनाथ का एक और रोचक दिन निकल गया। रास्ते में उन्हें न जाने कितने लोगों ने मुस्कुराकर ’विश’ किया था। सुरेन्द्रनाथ ने आज टीटीसी के "लॉस्ट एंड फ़ाउंड" के ऑफ़िस कर्ल्क से भी खुल बात करने का प्रयास किया था। वह ख़ुश थे।

अब सुरेन्द्रनाथ जहाँ भी जाते उनका छाता उनके साथ अवश्य होता। चाहे आवश्यकता हो या न हो। अगर बारिश होती तो लोग छाते को देखते और सुरेन्द्रनाथ से कहते "आपने अच्छा किया कि छाता ले आए" अगर बारिश नहीं होती तो भी लोग-बाग पूछते "बारिश होने के आसार हैं क्या?” यानी छाता बातचीत शुरू करने का माध्यम बन गया। सुरेन्द्रनाथ को अनुभव होने लगा कि किसी के साथ बात आरम्भ करना कठिन नहीं है। प्रायः शाम को चाय पीते हुए बीते दिन के बारे में सोचते, किस से मिले, क्या बात हुई। जिस से मिले वह कैसा व्यक्ति था इत्यादि। उनके पास सोचने और स्वयं से बात करने के लिए विषय होने लगा। बच्चों का जब भी फोन आता तो बहुत उत्साह से अपने दिन के बारे में बताते। यह बात अलग है कि छाते की कभी चर्चा नहीं करते थे। क्योंकि छाता उनका बहुत निजी था, उनका पर्याय था।

एक दिन सुरेन्द्रनाथ को बच्चों से बात करते हुए पता चला कि कल से नवरात्रे शुरू हो रहे हैं। वह कोई धार्मिक व्यक्ति नहीं थे। जब पत्नी जीवित थी तो धर्म-कर्म का दायित्व उसका था। जो वह करने के लिए कहती, वह कर देते। शायद आज पहली बार था कि उन्हें अपनी पत्नी याद आ रही थी। सुबह से कई बार आँखों की कोरें भीग चुकी थीं। अगर परिवार के साथ होते तो शायद रो भी देते। साथी के चले जाने का दुख आज उन्हें अकेलेपन में महसूस हुआ। शायद उनके व्यक्तित्व का आवरण छीजने लगा था। पहले नवरात्रे को किसी भी तरह पत्नी उन्हें मंदिर ले जाया करती थी। चाहे वह जाना न भी चाहते हों तो भी। पत्नी के बारे में सोचते-सोचते उन्हें नींद आ गई। पर सोने से पहले उन्होंने सोच लिया था कि पहले नवरात्रे को मंदिर जाने की परम्परा को अवश्य निभाएँगे।

अगली सुबह वह उत्साहित थे। नाश्ते के बाद नहा-धोकर तैयार हुए और ग्रोसरी स्टोर जाकर मंदिर में चढ़ाने के लिए कुछ फल ख़रीदे। मंदिर जाने से पहले उनकी पत्नी और क्या करती थी, उन्हें न तो याद आया और न ही उन्हें इसकी समझ थी। मंदिर पहुँचते हुए लगभग ग्यारह से ऊपर का समय हो गया था। मन्दिर की लॉबी में जूते उतार कर और छाते को एक कोने में रख दिया। जैसे ही वह मेन हाल में गए तो दरवाज़े के साथ ही मेज़ पर शर्मा जी बैठे थे। 

शर्मा जी ने यह मंदिर लगभग दस वर्ष पूर्व बनाया था। यह एक ग़रीब मन्दिर था। आसपास की हाई-राईज़ बिल्डिंगों में अधिकतर नए आप्रवासी भारतीय  रहते थे। यह वो लोग थे जो या तो नए देश में पाँव जमाने के लिए संघर्ष कर रहे थे या संघर्ष में हार चुके थे और अब जो परिस्थितियाँ थीं, उसे नियति मान कर समझौता कर चुके थे। मंदिर उनकी आस्था और आध्यात्मिक आवश्यकता को पूरा करने का साधन तो था परन्तु उनके पास मंदिर में चढ़ाने के लिए अधिक पैसे नहीं होते थे। क्योंकि मंदिर के पास पैसे नहीं थे इसलिए इस मंदिर में शांति बहुत थी। जिन मंदिरों में पैसा था वहाँ की प्रबन्धन कमेटियों में नित हाथापायी की नौबत आती रहती थी। इधर हालत यह थी कि शर्मा जी लोगों से निवेदन करते रहते थे पर कोई प्रबंधन कमेटी का दायित्व उठाने को तैयार ही नहीं होता था। फिर भी शर्मा जी की यह समर्पण की भावना ही थी कि लगभग अस्सी वर्ष के आसपास की अवस्था में भी, मंदिर को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाने का सपना देखते रहते। उनकी नज़र हर नए श्रद्धालु में समर्पित भक्त को खोजती, जो मंदिर में सक्रिय योगदान दे सके।

सुरेन्द्रनाथ ने देखा, मंदिर में सिवाय शर्मा जी और कोई भी नहीं था। न कोई पुजारी और न ही कोई अन्य भक्त। हाल की आधे से अधिक लाईट्स भी ऑफ़ थीं। केवल वेदी पर पूरी रोशनी थी। शर्मा जी ने नज़र उठा कर सुरेन्द्रनाथ को ऊपर से नीचे तक देखा। उनके चेहरे की मुस्कुराहट कह रही थी – मैं आपको पहचानता तो नहीं, पर स्वागत है! इधर सुरेन्द्रनाथ जी समझ नहीं पा रहे थे कि वह क्या करें? थैले में जो फल थे, वह यहीं शर्मा जी को थमा दें या जाकर मूर्तियों के आगे रख दें। इस किंकर्तव्यविमूढ़ अवस्था में वहीं अटक गए और शर्मा जी तरफ़ देखते हुए हाथ जोड़े। शर्मा जी अपनी कुर्सी से उठे और उन्होंने भी हाथ जोड़ कर अभिवादन किया। शर्मा जी की अनुभवी नज़र ने सुरेन्द्रनाथ में संभावनाएँ खोज लीं। उन्हें लगा कि यह व्यक्ति मंदिर के काम आ सकता है। बस, बात ढंग से आरम्भ करनी पड़ेगी। शर्मा जी ने अपना परिचय दिया और सुरेन्द्रनाथ ने अपना। 

शर्मा जी ने कई परतों वाला प्रश्न किया, “आपको पहले कभी देखा नहीं, अभी इस इलाक़े में घर ख़रीदा है क्या?” 

“जी मंदिर में बहुत देर के बाद आया हूँ। रह तो इस इलाक़े में बहुत देर रहा हूँ," सुरेन्द्रनाथ ने उत्तर दिया। इसमें शर्मा जी को पता नहीं चल पाया कि भक्त के पास घर है या यह भी इन बिल्डिंगों में किराए के अपार्टमेंट में रह रहा है।

उन्होंने झूठी सी हँसी हँसते हुए बात बढ़ाई, “देर से आए दुरुस्त आए। भगवान के घर में सबका स्वागत है। आइए।" शर्मा जी ने एयर-इण्डिया के किंग की तरह एक बाँह मूर्तियों की ओर बढ़ाई और दूसरा हाथ, सिर को झुकाते हुए दिल पर रख लिया। सुरेन्द्रनाथ जी वेदी पर पहुँचे और शर्मा जी ने फलों का थैला लेकर भोग लगाया और प्रसाद दे दिया। शर्मा जी के चेहरे पर लटके प्रश्न को समझते हुए सुरेन्द्रनाथ को याद आया कि माथा भी टेकना चाहिए था, दान पेटी में भी कुछ डालना चाहिए था। अब समस्या थी कि एक हाथ में प्रसाद में मिला एक सेब और एक केला था। कैसे झुक कर माथा टेकें और किस तरह जेब में हाथ डाल कर पर्स में से पैसे निकालें! शर्मा जी ने उनकी कठिनाई दूर कर दी, बोले, “प्रसाद मुझे पकड़ा दें।"

सुरेन्द्रनाथ खिसयाए से मुस्कुराए और शर्मा जी को प्रसाद थमा कर माथा टेका। जब उन्होंने जेब से पर्स निकाल कर खोला तो उसमें केवल बीस-बीस डॉलर के नोट ही थे। अब वह दुविधा में थे। इस परिस्थिति में शिष्टाचार क्या कहता है? जोत की थाली में रखे पाँच-पाँच डॉलर के नोटों के साथ अपना बीस का नोट भुना लें या कड़वा घूँट भर कर बीस ही चढ़ा दें। एक क्षण ठिठकने के बाद उन्होंने बीस डॉलर का नोट ही थाली में रख दिया। शर्मा जी के चेहरे की मुस्कुराहट कानों तक फैल गई। उन्होंने प्रसाद के फल सुरेन्द्रनाथ को थमा दिए। सुरेन्द्रनाथ धीमे क़दमों से, दीवारों को देखते हुए, हाल के दरवाज़े की ओर चल पड़े। शर्मा जी उनसे एक क़दम पीछे रहे। मेज़ के पास पहुँच कर शर्मा जी बोले, “वापिस जा रहे हैं क्या? थोड़ी देर बैठ लें। आराम से लौटियेगा।" 

सुरेन्द्रनाथ को इस आमन्त्रण की आशा नहीं थी। उन्होंने मुस्कुराते हुए शर्मा जी ओर देखा। नज़र मिलते ही शर्मा जी बोले, “एक-एक कप चाय का पीते हैं। मेरा चाय पीने का मन हो रहा है और चाय अकेले पीकर मज़ा नहीं आता। कोई तो साथ होना ही चाहिए," शर्मा जी हल्के से हँस दिए। शर्मा जी बात काम कर गई।

सुरेन्द्रनाथ मुस्कुराए, “जी आप आग्रह कर रहे हैं तो चाय तो पीनी ही पड़ेगी।"

शर्मा जी ने अवसर नहीं गँवाया, एक कुर्सी खींचते हुए बोले, “आप बैठिए बस मैं पानी गैस पर रख कर आ रहा हूँ।"

शर्मा जी मंदिर की रसोई में ओझल हो गए और सुरेन्द्रनाथ बारीक़ी से मेज पर बिखरी हुई वस्तुओं को देखने लगे। कंप्यूटर ऑन था। एक ओर एकाउंटिंग का रजिस्टर खुला पड़ा था। शर्मा जी की ऐनक भी वहीं थी। स्पष्ट था कि शर्मा जी लैजर की एंट्रीज़ कर रहे थे। मंदिर का हिसाब-किताब भी क्या शर्मा जी ही देखते हैं– यह प्रश्न सुरेन्द्रनाथ के मन में आया। इतने में शर्मा जी लौट आए। उनके हाथ में दो प्लेटें थीं। एक में खोए की बर्फ़ी और दूसरी में दाल-बीजी थी। 

मुस्कुराते हुए उन्होंने मेज़ पर प्लेटें रखीं और बात फिर छेड़ी, “आप कहाँ रहते हैं?” शर्मा जी अभी भी घर का प्रश्न पूछना चाहते थे। 

सुरेन्द्रनाथ बोले, “आप जानते हैं जहाँ एल्ज़मेयर रोड समाप्त होती है - मॉर्निंगसाईड के बाद; उन्हीं घरों में।"

शर्मा जी को उत्तर चाहिए था वह मिल चुका था। उस इलाक़े घर बड़े थे और उस इलाक़े में रहने वालों की आर्थिक समृद्धता को प्रमाणित करते थे।

“बहुत अच्छा, वह इलाक़ा तो बहुत अच्छा है। शांत . . .”

“जी हाँ, यह तो है। बहुत देर से वहीं पर रह रहा हूँ।"

शर्मा जी ने आगे कुरेदा, “बहन जी नहीं आईं?”

सुरेन्द्रनाथ थोड़ा सा असहज हुए, पर उत्तर तो देना ही था, बोले, “जी उनका स्वर्गवास हुए दो वर्ष हो चुके हैं? अकेला ही हूँ।"

“बच्चे क्या पास ही रहते हैं?” शर्मा जी बड़ी चतुराई से हर नवांगतुक की पूरी जन्मपत्री बना लेते थे।

“जी हाँ, दो बेटे हैं और दोनों अपने-अपने परिवारों के साथ पास ही में रहते हैं। बस यही कोई दस-पन्द्रह मिनट की दूरी पर।"

शर्मा जी के चेहरे पर संतोष की मुस्कुराहट थी। जो जानकारी वह चाहते थे वह मिल चुकी थी बस यह जानना रह गया था कि सुरेन्द्रनाथ किस पोज़ीशन से रिटायर हुए हैं। इतने में स्टोव पर रखी चाय की केतली की सीटी सुनाई दी।

“लीजिए पानी तो तैयार हो गया,” शर्मा जी बोले, “आप कुछ लीजिए,” उन्होंने बर्फ़ी और नमकीन की ओर इशारा किया, "मैं बस चाय लेकर आता हूँ। आप बताइए चीनी कितनी लेते हैं?”

“जी बस आधा चम्मच।"

शर्मा जी फिर रसोई में कुछ समय के लिए ओझल हो गए। सुरेन्द्रनाथ सोचने लगे कि शर्मा जी का कितना शांत व्यक्तित्व है। और मंदिर की मद्धम सी रोशनी और नीरवता उन्हें भली लग रही थी। यहाँ बैठे रहने का और बातें करते रहने का उनका मन कर रहा था। इतने में शर्मा जी दो कप प्लेटों में चाय लेकर प्रकट हुए।

“लीजिए,” कह कर शर्मा जी ने भाप निकलती चाय का कप मेज़ पर रख दिया और अपना कप लेकर मेज़ की दूसरी ओर अपनी कुर्सी पर जा बैठे। एक लम्बा सा साँस छोड़ कर उन्होंने खुले लैजर की ओर देखा और उसे बंद करके एक ओर कर दिया। उन्होंने सुरेन्द्रनाथ जी को फिर मिठाई और नमकीन लेने का निमन्त्रण दिया और अपना कप उठा कर होंठों को लगाया।

“सुरेन्द्रनाथ जी, आपके आने से पहले सुबह से इस लैजर के आँकड़े ही देख रहा हूँ। कंप्यूटर में एंट्रीज़ करनी है। आँखें थक चुकी हैं। अब बुढ़ापा भी तो है। कब तक करूँगा?" उनके स्वर में हताशा थी।

“समझ सकता हूँ शर्मा जी, सारी उम्र यही करता रहा हूँ।"

“सच!” शर्मा जी ने नक़ली विस्मय से देखा, “अगर आप बुरा न माने तो आप क्या . . .” शर्मा जी ने बात आरम्भ करके बीच में ही छोड़ दी।

“जी सी.ए. हूँ, मैं एक फ़र्म में ऑडिटर था। बस इन आँकड़ों में पूरा जीवन निकाल दिया। इसीलिए कहा ’समझ सकता हूँ’ अगर आपको कुछ पूछना हो तो निस्संकोच पूछिए।"

“भाईसाहिब . . . आपको भाईसाहिब तो कह सकता हूँ न?” शर्मा जी ने मुस्कुराते हुए पूछा। निश्चित रूप से शर्मा जी आत्मीयता को बढ़ाना चाहते थे।

“बिल्कुल, आप जो चाहें कह सकते हैं। वैसे मैं आपसे उम्र में काफ़ी छोटा हूँ। आप मुझे सुरेन्द्रनाथ कहें या सुरेन्द्र . . . मुझे कम औपचारिक लगेगा।" सुरेन्द्रनाथ ने कह तो दिया परन्तु अगले क्षण कुछ अजीब लगा। अभी तक उन्होंने अपने को ’सुरेन्द्र’ कहने का अधिकार सिवाय अपनी पत्नी के, किसी और को नहीं दिया था। और अब, इन्हें क्यों?

“ठीक है सुरेन्द्र जी, अगर आपके व्यक्तिगत जीवन में कोई कठिनाई न हो तो क्या आप कुछ समय मंदिर के लिए निकाल सकेंगे?” कहकर शर्मा जी ने चाय की चुस्की ली। वह कुछ समय सुरेद्रनाथ को सोचने के लिए देना चाहते थे। वैसे उनकी निगाहें निरन्तर सुरेन्द्रनाथ के चेहरे पर टिकी हुई थीं।

“जी अवश्य, मैं मंदिर की सहायता करने के लिए तैयार हूँ। आजकल ख़ाली ही हूँ।"

चाय का कप समाप्त होते-होते शर्मा जी के कंधों पर भार की कमी हो गई। सुरेन्द्रनाथ ने मंदिर के हिसाब-किताब को देखने का दायित्व सँभाल लिया था। चाय पीते हुए कुछ समाज की, कुछ राजनीति की और कुछ विदेशों में भारतीय संस्कृति की बातें होती रहीं। तय हुआ कि सुरेन्द्रनाथ सप्ताह में एक-दो दिन मंदिर अवश्य आएँगे। शर्मा जी प्रसन्न थे। सुरेन्द्रनाथ जी अपने-आप पर हैरान थे। आज के लिए इतना ही बहुत था। उन्होंने चाय का कप मेज़ पर नहीं रखा। खड़े होते हुए शर्मा जी से पूछा, “बताइए किचन कहाँ है?”

शर्मा जी समझ गए कि यह क्यों पूछ रहे हैं, “नहीं सुरेन्द्रनाथ जी, यहीं छोड़ दें, मैं उठा दूँगा बाद में। चलिए आपको दरवाज़े तक छोड़ दूँ," और वह सुरेन्द्रनाथ के आगे चलने लगे। 

सुरेन्द्रनाथ ने जूते डाले, शर्मा जी से विदा लेते हुए, कल यानी शनिवार को सुबह दस बजे आने का वायदा किया और बाहर का दरवाज़ा खोला। उसी समय शर्मा जी ने उन्हें टोका, “अरे! आप अपना छाता तो यहीं भूल रहे हैं!" और छतरी उठा कर सुरेन्द्रनाथ के हाथ में थमा दी। 

घर लौट कर सुरेन्द्रनाथ आज विशेष रूप से अधिक ख़ुश थे। कोने में पड़ी छतरी को वह बार-बार देखकर बाक़ी का सारा दिन मुस्कुराते रहे।

शनिवार की सुबह जब वह मंदिर पहुँचे तो वहाँ इतनी भीड़ को देख कर बहुत हैरान हुए। शर्मा जी भी बहुत व्यस्त थे। उनके मेज़ के बराबर एक अन्य मेज़ लगा हुआ था जिस पर एक व्यक्ति दान-पेटी के साथ बैठा था। उसके सामने रसीद-बुक और कुछ पेन पड़े थे। मंदिर की किचन से औरतों की आवाज़ें आ रही थीं। आज पंडित जी भी दिखाई दिए। उन्होंने भी सुनहरी किनारी वाली धोती और कुर्ता पहना हुआ था। कुछ लोग मंदिर को सजा रहे थे। 

सुरेन्द्रनाथ को इतना हैरान देखकर शर्मा जी ने बताया, “सुरेन्द्रनाथ जी, सामने वह बिल्डिंगें देख रहे हैं न आप। यह सब लोग वहीं रहते हैं। मंदिर, समझिये, इन्हीं का है। जब भी यह लोग कोई पूजा-अनुष्ठान करना चाहते हैं या कोई निजी कार्यक्रम जैसे कि जन्मदिन, मैरिज एनिवर्सरी वग़ैरह – मंदिर का हाल इनके लिए खुला है।  अगर अपनी बिल्डिंग का पार्टी हाल किराये पर लें, इन्हें महँगा पड़ता है। और वहाँ पर नियम भी अधिक कड़े हैं। बिल्डिंग के केयर-टेकर भी खाने की गंध की शिकायत करते हैं। हम यह सब समझते हैं। सुरेन्द्र जी, मंदिर केवल पूजा करने का भवन ही नहीं होना चाहिए। सामाजिक केन्द्र होना चाहिए। यही सोच के साथ इस मंदिर को स्थापित किया था," शर्मा जी ने छोटा सा भाषण दे डाला। 

सुरेन्द्रनाथ मुस्कुराते हुए सुन रहे थे। उन्हें बाक़ी के जीवन का उद्देश्य मिल गया था। दिन भर वह मंदिर में व्यस्त रहे। अजनबी लोगों के बीच उन्हें अच्छा लग रहा था। मेज़ कुर्सी पर उन्हें बैठे देख, बहुत लोगों ने अपना परिचय दिया। बहुत से बच्चों ने चरण-स्पर्श किया और सुरेन्द्रनाथ ने भी बहुत सी रंग-बिरंगी झोली लहँगा पहनी छोटी-छोटी बच्चियों के सर पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया। बच्चियों की माओं के चेहरे पर निश्छल मुस्कुराहट देखना उनके लिए संतोषजनक था। वह विस्मित थे– एक ही दिन में वह इतना बदल जाएँगे! सारी उम्र संक्षिप्त बात करने वाले सुरेन्द्रनाथ आज इतना हँस-बोल रहे थे। 

दोपहर के खाने के बाद, लोगों ने मिल-जुलकर मंदिर की सफ़ाई की ताकि संध्या की आरती के समय मंदिर साफ़-सुथरा लगे। जब सब लोग जा चुके तो शर्मा जी और सुरेन्द्रनाथ मेज़ पर कुर्सियाँ खींच कर बैठे दिन भर के कार्यक्रम की समीक्षा कर रहे थे। शर्मा जी बहुत थके हुए प्रतीत हो रहे थे। इतने में एक महिला ने एक ट्रे में चाय के दो कप और कुछ नाश्ता सजा कर मेज़ पर रख दिया और मुस्कारा कर बोली, “लगता है अंकल जी बहुत थक गए हैं। ऐसे में मेरी चाय तो और भी अच्छी लगेगी।" एक शरारती हँसी के साथ उसने अपनी चप्पल पहनी और बाहर निकल गई। कोई धन्यवाद की प्रतीक्षा नहीं, कोई औपचारिकता नहीं बस अपनापन– जैसे घर के बुज़ुर्ग की दिनचर्या का पता था उसे; इस समय शर्मा जी को चाय चाहिए। सुरेन्द्रनाथ को लगा कि शर्मा जी का यही परिवार है। इतना बड़ा परिवार जिसका अब वो भी हिस्सा थे। 

उस दिन लौटते हुए जब शर्मा  जी ने जब छतरी सुरेन्द्रनाथ को पकड़ाई तो सुरेन्द्रनाथ ने वापिस नहीं ली, बोले, “शर्मा जी यहीं कोट रैक में लटकती रहने दें। अगर बारिश के दिन किसी को आवश्यकता हो तो उसे दे दें।" और सुरेन्द्रनाथ घर लौट आए।

आजकल सुरेन्द्रनाथ लगभग हर रोज़ ही मंदिर जाते हैं। शर्मा जी की मेज़ के साथ ही उनका मेज़ भी लगा दिया गया है। शर्मा जी के मेज़ का कंप्यूटर अब सुरेन्द्रनाथ के मेज़ पर है। और हाँ, वह छतरी– न जाने कई लोगों के घर जा चुकी है पर हर बार वापिस मंदिर लौट आती है।

4 टिप्पणियाँ

  • 'वाह!' -ऐसी सुंदर अभिव्यक्ति,कथानक,विषय और प्रस्तुति के लिए। आम आदमी की कहानी ही प्रतीत हुई।

  • 3 Aug, 2021 06:50 PM

    आदरणीय सुमन जी,बहुत मार्मिक कथा, वरिष्ठ नागरिक के खाली समय में मंदिर के साथ जुड़ जाना और समाज में खो जाना।अब अकेलेपन का डर कहा? हमें जुडना चाहिए चाहे परिवार हो या समाज। प्रवासी भारतीय कहानी में विदेशी संदर्भ भी है।बधाई

  • 2 Aug, 2021 09:07 AM

    कहानी "छतरी "एक सामाजिक दर्शन और मनोविज्ञान को अभिव्यक्त करती है। व्यक्ति जब तक अपने परिवार में ही सीमित होकर रहता है तब तक दुनिया छोटी लगती है, जैसे ही आत्मबोध होता है और अपने आनंद की खोज में निकल पड़ता है तब सच्चे आत्म ज्ञान की अनुभूति होती है। भावपूर्ण कहानी के लिए घई जी को साधुवाद । Dr Prabha mishra

  • 2 Aug, 2021 02:44 AM

    सुरेन्द्रनाथ जी के बहू-बेटों के इतने प्रयास के बाद भी उनके उस अकेलेपन को दूर करने में सहायक हुई तो एक मूक छतरी। यह कहानी एक चलचित्र की तरह आँखों के सामने चलती-फिरती लगी। साधुवाद!

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