(जन्म- 1 जुलाई1945 – निधन- 25 मार्च 2020)    स्तब्ध हूँ! यक़ीन नहीं हो रहा है.... एक हँसता-खिलखिलाता, बेहद प्यारा, ज़िंदादिल इंसान गुज़र गया .... अभी 4-10 नवम्बर 2019 को हम सब प्रवासी भारतीय साहित्यकार सुषम जी के साथ ‘टैगोर अंतर्राष्ट्रीय साहित्य कला महोत्सव- भोपाल’ में कला और साहित्य पर बात-चीत करते हुए, सत्रों में शिरकत कर रहे थे। हर रोज़ हँसते खिलखिलाते, चुटकियाँ लेते, कभी सुबह नाश्ते पर, कभी लंच पर, कभी पुस्तक प्रदर्शनी देखते तो कभी सभागार में साथ-साथ घूमते-फिरते जगह-जगह रुक कर फोटो खिचाते। हम सब देश-विदेश से आए तमाम साहित्यकार शाम को अनौपचारिक महफ़िलें सजाते. गीत, ग़ज़ल, कविता का समां होता और समां को जीवंत करता सुषम जी का सुर, लय, ताल और अभिनय के साथ ‘मधुमति’ फ़िल्म का प्रिय गीत ‘दैय्या रे दैय्या चढ़ गयो पापी बिछुआ’ .... न जाने कितनी स्मृतियाँ आँखों के आगे तैरने लगती हैं..… क्या पता था कि यह… आगे पढ़ें
  1966-69 के दौरान मैं दिल्ली विश्विद्यालय से बी.ए. कर रही थी; हिंदी मेरा ऑप्शनल विषय था; प्राध्यापक थीं सुषम बेदी। कक्षा में बजाय उन्हें सुनने के, मैं उन्हें निहारा अधिक करती थी। जब वह पहली बार हमारी क्लास में आईं तो हमने सोचा कि वह भी एक छात्रा थीं किन्तु जब वह सीधे ब्लैकबोर्ड के पास खड़ी हो गईं तो माथा ठनका। ख़ूबसूरत तो थीं ही, उनकी पोशाक साड़ी, सादी किन्तु उत्तम थी। वह शब्दों को बहुत तोल-तोल कर बोलतीं थीं, जैसे बोलने के साथ-साथ सोच भी रही हों। पहली ही नज़र में वह हम सभी छात्राओं को अच्छी लगीं और उनकी क्लास में कभी गड़बड़ नहीं हुई क्योंकि पाठ्यक्रम से वह कभी नहीं भटकती थीं और न ही हमें भटकने देती थीं। मेरी पढ़ाई सरकारी स्कूल में हुई थी और मेरी सभी सहपाठिनें कॉन्वेंट स्कूल की पढ़ीं-लिखी थीं, अंग्रेज़ी में फर्स्ट-क्लास लेने के बावजूद मुझे बोलने… आगे पढ़ें
कुछ लोग जीवंतता के प्रतीक होते हैं। सदैव हँसते, मुस्कुराते, जीवन को जीतते से प्रतीत होते हैं। ऐसे लोगों के भी जीवन का अंत होता है यह सोचना बड़ा मुश्किल है। २१ मार्च की सुबह उठते ही ऐसी ही शख़्सियत के देहावसान की ख़बर मिली। फ़ेसबुक पर जितने भी लोग उनसे परिचित थे, सभी के पेज पर उनकी ही यादों की चर्चा थी। हिन्दी साहित्य का जाना-पहचाना नाम, अमेरिका में हिन्दी अध्यापन क्षेत्र में सर्वोपरि लिए जाने वाला नाम, सुषम बेदी जी के देहावसान का समाचार किसी बहुत बुरे सपने की तरह सामने आया।  सुषम बेदी जी जिससे भी मिलती थीं, उसे उतना ख़ास महसूस कराती थीं कि सभी को लगता था जैसे वह उनके बहुत क़रीब हों। कहा जाता है ना कि जीवन में पद प्रतिष्ठा से भी अधिक यदि कुछ मायने रखता है तो वह यह कि आप जिस जिसके जीवन को छूते हैं, उसे कैसे… आगे पढ़ें