मेरी कविता
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
मैं ऐसी कविता
नहीं लिखना चाहता हूँ
जिसमें झूठी प्रशंसा हो
जिसमें अहंकार हो
बदले की भावना से
उबाल मार रही हो
असंवेदना की धारा बहती हो
निष्ठुर हृदय से भरी हो
मैं ऐसी कविता में
मधुर स्वर देना चाहता हूँ
जो किसी का हक़
न लेने की बात करती है
निवाला न दे सको तो
निवाला न छीनने की बात करती है
मेरी कविता ऐसी होगी
जिसका सम्मान नहीं गिरने देगी
आश्रयहीनों को
आश्रय देने की बात करती है
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