बंदर की दुष्टता
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
एक घने जंगल में एक ऊँचा पेड़ था। उसकी मज़बूत डाल पर हर रात सारे पक्षी सोने आते। कोयल, बुलबुल, तोता, कबूतर—सभी यहीं विश्राम करते। लेकिन एक शरारती बंदर इस पेड़ का दुश्मन था।
वह रात को चुपके से आता और डाल को ज़ोर-ज़ोर से हिलाता। पक्षी उड़ जाते, घबराते, कभी-कभी गिर भी पड़ते।
”अरे बंदर भैया, हमें सोने दो ना!” चहचहाती कोयल बोलती।
“हा हा! मज़ा आ रहा है!” बंदर चिल्लाता और डाल को और तेज़ हिलाता। पक्षी परेशान हो गए। रात-रात भर जागते, थक जाते।
एक रात फिर बंदर आया। “आज तो सबको जगाऊँगा!” उसने सोचा। डाल पकड़ी, ज़ोर लगाया। पक्षी घबरा गए। लेकिन अचानक बंदर का पैर फिसला! हाथ से डाल छूट गई। धड़ाम! नीचे गिरा बंदर। उसका एक हाथ टूट गया। दर्द से चीख़ा, “आह! क्या हो गया?”
सुबह पक्षियों ने देखा—बंदर ज़मीन पर पड़ा सिसक रहा था।
"अब हमें चैन से सोने दो,” बोली बुलबुल। बंदर को अपनी दुष्टता का फल मिल गया। उसके बाद वह कभी डाल नहीं हिलाया। पक्षी ख़ुशी से गाते-बजाते चैन की नींद सोने लगे।
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