कवि सम्मेलन में कवियों की औक़ात
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
कवि सम्मेलन में कवियों की औक़ात जितनी रहती है उसी प्रकार वहाँ उनकी व्यवस्था रहती है। एक बार छोटे कवियों का सम्मेलन हुआ तो वहाँ कवियों को दरी पर बैठने के लिये व्यवस्था की गयी। मटमैली, फटी दरी थी। कपड़े गंदे होने की पूर्ण सम्भावना रहती है। ऐसे कवि मामला समझ कर फटे-पुराने कुर्ते में चले आते हैं।
ज़मीन पर सारी व्यवस्था होने के कारण ये ज़मीनी कवि होते हैं। सच को कहने में डरते नहीं। सरकार की छाती पर मूँग दल देते हैं। सरकार को चुनौती दे देते हैं। इन दरी के कवियों से बड़े-बड़े लोग पतली गली से निकल लेते हैं। समाज की हक़ीक़त को रुपहले पर्दे पर दिखाते हैं। इनको कोई भरा लिफ़ाफ़ा नहीं मिलता है।
मिडिल टाइप के कवियों को प्लास्टिक की कुर्सी मिल जाती है। ऐसे कवि कुर्ता पाजामा तथा पैंट शर्ट तथा सदरी पहन कर आते हैं। कुछ पके बालों में काम चला लेते हैं। कुछ तो हेयर डाई लगा लेते हैं जो महसूस करते हैं कि अभी उनके रगों में जवानी का ख़ून दौड़ रहा है।
ये कवि शृंगार रस की कविता करते हैं। नख-शिख तक का वर्णन कर देते हैं। गाँव की साँवली नायिका से लेकर शहर की गोरी छोरियों पर शृंगार रस उड़ेल देते हैं। पंडाल ठहाकों से गूँज उठता है। नये युवाओं में जोश भर देते हैं लेकिन सरकार का कुछ नहीं कर पाते हैं। इनको हल्का वाला लिफ़ाफ़ा मिल जाता है।
जो सेलिब्रेटी टाइप के कवि होते हैं। उनके कवि सम्मेलनों में राजशाही व्यवस्था होती है। मोटा-मोटा लिफ़ाफ़ा पैसों से भरा मिलता है। गोल-गोल तकिया मिल जाता है। ये सरकार के परम हितैषी होते हैं। सरकार के नख-शिख तक का वर्णन करने में आनन्द रस को प्राप्त करते हैं। सरकार को परम सुंदरी नाम से नवाज़ते हैं।
सरकार इनको अपना समझती है। ये ताक़तवर कवि होते हैं। ये सरकार को अपना समझते हैं। ये सरकार को अपना सैंया समझते हैं। इनको किसी भी प्रकार के विवादास्पद शब्दों पर कोई डर नहीं होता है। सैंया भये कोतवाल तो काहे का डर। बड़का-बड़का अवार्ड के असली हक़दार होते हैं। पद्म टाइप का पुरस्कार नीचे तक नहीं आ पाता है। जब इनको मिलता है तो दरी, कुर्सी वाले कवि बेचारे हाथ मलते रह जाते हैं। इसके अलावा ये कर ही क्या सकते हैं!!
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