एक पुरुष
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
एक पुरुष ने
हाड़ तोड़ मेहनत से
अपने गालों को
पोपला कर डाला है
नींद ग़ायब है आँखों से
घर का बोझ
कंधे पर लटक रहा है
जैसे खूँटी पर
सामानों से भरा झोला लटक रहा है
आँखों में एक बेबसी है
पर बेटियों को
एक उच्च तालीम देना चाहता है
इसलिए घिसी चप्पल पहन रहा है
बेटों को पढ़ाना चाहता है
एक नई रोशनी भरना चाहता है
इन सपनों के लिए
कई दिन तक आईना नहीं देखता है
उलझे हुए बाल
होंठों पर जमीं पपड़ी
एक पुरुष की असलियत है
एक पुरुष ही है
रातभर कुछ सोचता है
दिनभर मेहनत करके
भविष्य का जुगाड़ करता है
आधी नींद सोकर
परिवार का भविष्य गढ़ता है
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