बंदर मामा
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
बंदर मामा बंदरिया लाये,
ढोल, मजीरा साथ भी लाये।
बंदर ढोल मजीरा बजाया,
बंदरिया ने नाच दिखाया।
सब ने ताली ख़ूब बजाया,
बच्चों ने हल्ला ख़ूब मचाया।
बंदर ने ऐसा खेल खेला,
लग गया लोगों का मेला।
बंदरिया ने सबसे माँगा पैसा,
सबने दिया उसको छुट्टा पैसा।
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- कविता
-
- आदिवासी बच्चियाँ
- उनका हिस्सा
- उषा का आगमन
- एक थे अटल
- एक नाबालिग़ लड़की
- कोहरा
- कोहरे में
- देश के नेताओ
- निष्ठुर समय
- पर्वत, जो मूक खड़े हैं
- पीढ़ियाँ
- पूस की रात
- बसंत
- मत सताना
- मेरी कवितायें
- मेरी दृष्टि
- मैंने भागकर शादी कर ली
- वह मज़दूर
- सर्दी में एक स्त्री
- सुकून चाहता हूँ
- हम वेश्या हैं
- हँसने दो
- हारे लोग
- हे नवांकुरो
- बाल साहित्य कविता
- चिन्तन
- हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- बाल साहित्य कहानी
- किशोर साहित्य कहानी
- हास्य-व्यंग्य कविता
- कहानी
- लघुकथा
- ललित निबन्ध
- विडियो
-
- ऑडियो
-