चुग़ली से आनन्द रस की उत्पत्ति होती है

15-09-2026

चुग़ली से आनन्द रस की उत्पत्ति होती है

जयचन्द प्रजापति ‘जय’ (अंक: 302, सितम्बर द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

कभी मौक़ा मिले तो चुग़ली करके देखिए कितना सुकून मिलता है। हृदय तरोताज़ा हो जाता है जैसे—अभी अनार का जूस पीकर आ रहे हैं। जिससे चुग़ली कर रहे हैं, चुग़ली करके एक सज्जन पुरुष उसके सामने बन सकते हैं। बहुत बड़ा आपका समर्थक हो जायेगा। 

चुग़ली करने में कोई ख़र्च नहीं गिरता है। एक कहावत है—हींग लगे न फिटकिरी, रंग होय चोखा। चुग़ली करने में बड़े-बड़े महारथी लगे रहते हैं। नेता जब किसी की चुग़ली करता है तो अख़बारों की सुर्ख़ियाँ बन जाती हैं। मीडिया को क्या समझते हो? 

एक चीज़ हम नहीं समझ पाते हैं जब मंच पर नेताओं की मंडली बैठी रहती है तो एक दूसरे के कान में क्या फुसफुसाते हैं, आज तक पता नहीं चल पाया। एक सज्जन कह रहे थे। नेता को कम न समझो, वो तो महाचुग़ल-ख़ोर होते हैं। 

एक सज्जन साहित्यकार जब तक किसी की कोई चुग़ली नहीं कर लेते तब तक दातुन-मंजन नहीं करते। चाय की चुस्की लेते समय भी कोई साथ में है तो चुग़ली की दो घूँट उसको भी पिला देते हैं। सामने वाला भी टानिक समझ कर गटक लेता है। अंत तक चाव से सुनता है। सुनने के बाद आत्मसुख तथा संतोष की संजीवनी जैसे मिल गयी हो। 

औरतें तो और माहिर होती हैं। चुग़ली करते समय कान में फुसुर-फुसुर ऐसा करती हैं जिसकी चुग़ली कर दें वह व्यक्ति सामाजिक रूप से विकलांगता प्राप्त कर लेगा। चुग़ली करते समय चेहरे की मुस्कान बराबर बनी रहती है। शब्दों को ताश के पत्तों की तरह फेंट-फेंटकर ऐसा फेंकती हैं कि चुग़ली भी शरमा जाये। 

एक सज्जन की चुग़ली हमने भी कर दी। मैं चुग़ली करने में ऐसे-ऐसे शब्दों को फेंक रहा था अगर सामने पड़ जाये तो वह मृत्यु शैय्या को प्राप्त कर लेगा। जैसे उस व्यक्ति को पता चला, उसके पूरे ख़ानदान लाठी डंडों से वो हजामत मेरी बनायी—ज़िंदगी में आजतक किसी की चुग़ली नहीं की। 

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