कोहरे में
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
कोहरे में
मैं कुछ दूर चला
बहुत लोग ठिठुरे हुए मिले
कुछ आग तापते मिले
कुछ सड़कों पर पन्नियाँ बीनते
कुछ औरतें छोटे-छोटे बच्चों के साथ
भीख माँगती हुई सड़कों पर
बहुत ही कम कपड़ों में
कुछ रईसज़ादियाँ लड़कियाँ भी
सड़कों पर कम कपड़े में दिख रहीं थीं
एक विपन्नता में कम कपड़े पहना है
एक सम्पन्नता में कम कपड़े पहना है!
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- कविता
-
- आदिवासी बच्चियाँ
- उनका हिस्सा
- उषा का आगमन
- एक थे अटल
- एक नाबालिग़ लड़की
- कोहरा
- कोहरे में
- देश के नेताओ
- निष्ठुर समय
- पर्वत, जो मूक खड़े हैं
- पीढ़ियाँ
- पूस की रात
- बसंत
- मत सताना
- मेरी कवितायें
- मेरी दृष्टि
- मैंने भागकर शादी कर ली
- वह मज़दूर
- सर्दी में एक स्त्री
- सुकून चाहता हूँ
- हम वेश्या हैं
- हँसने दो
- हारे लोग
- हे नवांकुरो
- बाल साहित्य कविता
- चिन्तन
- हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- बाल साहित्य कहानी
- किशोर साहित्य कहानी
- हास्य-व्यंग्य कविता
- कहानी
- लघुकथा
- ललित निबन्ध
- विडियो
-
- ऑडियो
-