लालच बुरी बला है

15-12-2025

लालच बुरी बला है

जयचन्द प्रजापति ‘जय’ (अंक: 290, दिसंबर द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)

 

एक समय की बात है, एक किसान ने अपना गेहूँ बोरे में भरकर गोदाम में रख दिया। घर में रहने वाले सारे चूहे उस अनाज को देखकर बहुत ख़ुश हो गए। उन्होंने सोचा, “वाह! कितना सारा भोजन है! अब रोज़ आराम से खाएँगे।”

चूहों ने मिलकर किसान की गेहूँ की बोरी को काट दिया और रोज़-रोज़ उस अनाज का आनंद लेने लगे। लेकिन उनमें से एक बूढ़ा चूहा था, जो समझदार था और सोच-समझकर काम करता था। 

उसने चूहे दोस्तों से कहा, “भाइयो, इतना गेहूँ खाना ठीक नहीं है। किसान का नुक़्सान हो रहा है, और अगर हम इतने लालची रहेंगे, तो हमें बहुत बड़ा ख़तरा हो सकता है। हमें संयम रखना चाहिए।”

पर बाक़ी चूहे उसकी बात नहीं मानते थे। वे लालच में पड़कर गेहूँ खाते रहते। धीरे-धीरे किसान ने देखा कि उसका बहुत सारा अनाज ग़ायब हो रहा है। फिर एक दिन किसान ने योजना बनाई। 

उसने अपने गेहूँ में ज़हर की पुड़िया मिला दी। जब सारे चूहे ज़हर वाला अनाज खाने लगे, तो वे बीमार होकर मरने लगे। लेकिन बूढ़ा चूहा अपनी समझदारी से अपनी भूख पर नियंत्रण रख पाया। उसने ज़हर नहीं खाया और अपने जीवन को बचा लिया। 

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