अशिष्टों की औक़ात
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
उनकी अशिष्ट भाषा ने
तुमको चोट पहुँचायी है
तुम्हें धैर्य नहीं खोना है
एक विशाल वृक्ष की तरह
डगमगाना नहीं
उन्होंने तुम्हें गाली दी है
वीर पुरुष की तरह
उनकी इस मूर्खता पर
अफ़सोस भी नहीं जताना है
क्योंकि क्रोध की अग्नि
उनको धीरे-धीरे जला रही है
एक दिन जब तुम
विशालता को प्राप्त करोगे
तब उनकी आत्मा
सड़ी लकड़ी की तरह
एकदम से टूटी होगी
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