अनुभवहीन कवि
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
मैं एक अनुभवहीन कवि हूँ
मेरे अनुभव
गहराइयों तक नहीं होते
किसी विषय पर
सरल शब्दों की माला पहना देता हूँ
कुछ शब्द बाहर से लेकर
चिपका देता हूँ
जो शब्द मेरे पास नहीं होते हैं
अनुभवशील कवियों से लेकर
कुछ नया गढ़ने की कोशिश करता हूँ
फिर भी कविता विकृत हो जाती हैं
एक छोटी-सी ख़ुशी होती है
पर मैं भी टेढ़ी-मेढ़ी कविता लिख लेता हूँ
दो चार शब्द झूठी वाहवाही की
मुझे भी मिल जाते हैं
अभी सच लिखने की औक़ात नहीं है
शब्दों का झुनझुना पकड़ा देता हूँ
कभी-कभी सोचता हूँ
एक दिन हम भी
अनुभवशील कवि बनेंगे
फिर नये-नये कवि और आयेंगे
मेरे शब्दों को लेकर वो भी
अनुभवहीन कविता लिखेंगें
एक दिन उनकी भी होगी
जय-जयकार
एक दिन सच में होगी
जय-जयकार
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