कविता
अनिमा दास
(सॉनेट)
कितनी चंचल होती हैं कविताओं में मृदु कल्पनाएँ
मोहमुक्त होती हैं शब्द-कलिकाएँ . . उन्मादी भावनाएँ
कितनी चंचल होती हैं इच्छाओं की स्वर्णिम रश्मियाँ
कर स्तीर्ण कहानियों का अंतरिक्ष . . ये स्वप्निल उर्मियाँ
उत्तर दिशा की वायु में वर्णित . . कथा सहस्र युगों की
दक्षिण गोलार्द्ध के गवाक्ष में अंकित . . . एक छवि सी
हो रहा मुक्त जैसे कृष्ण केश . . . प्राची के आलिंगन में
जैसे काव्यमयी कल-कल बहती . . . प्रिय के स्पंदन में
कितनी रम्य होती कविताएँ . . . प्रकृति-पग में झंकृत
निस्तब्ध निविड़ता में जैसे मंद-मंद मूर्छना से आवृत्त
ऐ, स्वप्न की तृष्णा! ऐ, कवि हृदय की उष्ण मधुलिका
अदृश्य न होना . . . न होना विस्मृत प्राक् आख्यायिका।
अमृत मुहूर्त की कल्पित स्रोतस्विनी, ऐ, मेघावृत्त मंदर!
किसी मृत स्वर्ग की हो तुम अप्सरा अथवा हो निर्झर?
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