विश्वग्राम और प्रवासी हिन्दी साहित्य

15-04-2019

विश्वग्राम और प्रवासी हिन्दी साहित्य

सुमन कुमार घई

प्रिय मित्रो,

                 आज मैं ब्रुकलिन के एक एपार्टमेंट में बैठा बाहर खिड़की से नीचे देख रहा हूँ और सोच रहा हूँ कि मैंने अपनी किशोरावस्था में कभी भी कल्पना नहीं की थी कि मैं अपनी मिट्टी से दूर सारा जीवन व्यतीत करूँगा। अगर तकनीकी विकास न होता और इंटरनेट का अविष्कार न होता तो क्या मैं सदूर रहते हुए भी इस माध्यम से यह पारस्परिक दूरी को समेट पाता? 

यहाँ मैं अपनी नवजन्मा पोती से मिलने आया हूँ। तीन सप्ताह की बच्ची के चेहरे को देखते हुए एक सुखद लहर उमड़ रही है हृदय में और सोच रहा हूँ कि यह नन्ही पोत्री में संगम है विभिन्न संस्कृतियों, विभिन्न धर्मों, जीवन शैलियों का।  मेरी पुत्रवधू कैनेडियन तीसरी पीढ़ी की यहूदी लड़की है। पहली बार मिलने पर परिवारों की बात करते हुए उसने बताया था कि उसकी वंशावली में जर्मन, इंग्लिश, पोलिश और रशियन ख़ून है। और अब उसकी बच्ची में भारतीय ख़ून भी मिल गया है। यह बात अब निराली नहीं रही है, वैसे सोचा जाए तो पहले भी निराली कब थी? उत्तरी भारत में भी तो हल्के भूरे बाल, अलग-अलग रंग की आँखें और त्वचा के हर रंग का होना इस धरती पर मानवीय एकमेकता का प्रतीक है। परन्तु क्या हम कभी यह समझ पाते हैं?

कहा जाता है कि यह काल विश्वग्राम की उत्पत्ति का है। क्या यह सच है? अगर हम अपनी कल्पना के घोड़ों को स्वतन्त्र कर दें और अपनी सोच की बेड़ियों को तोड़ दें तब हमारी भेंट वास्तविकता से होगी। परन्तु यहाँ फिर भटक जाता हूँ कि वास्तविकता भी तो व्यक्तिगत होती है। जिसे मैं अपनी आँखों से देखते हुए वास्तविक मान रहा हूँ तो क्या मेरी व्यक्तिगत वास्तविकता, धरती की प्रत्येक जीवित प्रजाति की वास्तविकता भी वही होगी। जो रंग मुझे लाल दीखता है क्या वह सभी प्राणियों को भी लाल ही दिखता है? 

अब इस धरती से थोड़ा ऊपर उठते हुए - शून्य में अनन्त यात्रा पर निरन्तर गतिमान इस पिंड को देखते हैं जिसे हम धरती कहते हैं। क्या यह मात्र एक ग्राम नहीं है? वैसे तो पंजाबी में तो ग्राम को "पिंड" ही कहा जाता है। अगर यह सच है तो यह विश्व एक ग्राम ही था ...सदा से। कुछ भी तो नया नहीं है; हम केवल इसे परिभाषित करते हुए दर्पित हो जाते हैं कि हमने ऐसी तकनीकी का विकास कर लिया कि अब धरती विश्वग्राम हो गई। हो सकता है कि किसी काल में यह ज्ञान भी पहले से ही सर्वविदित हो जो लुप्त हो गया। सम्भावनाएँ  अनंत है।

अब मैं लौट कर इसी संदर्भ में प्रवासी साहित्य पर आ रहा हूँ। साहित्य तो साहित्य है, जिसे लेखक अपनी व्यक्तिगत और सामाजिक संवेदनाओं और अनुभवों को लेखनीबद्ध  करते हुए रचता है। इस दृष्टिकोण से प्रवासी साहित्य की क्या परिभाषा हो सकती है? अगर हम भौगोलिक संदर्भ में कह दें कि मानचित्र पर इन खिंची हुई लकीरें साहित्य को परिभाषित करती हैं, तो क्या यह सही होगा? क्या हिन्दी साहित्य को हम खाँचों में बन्द नहीं कर रहे? इसी परिभाषा के अनुसार क्या उत्तरी भारत, दक्षिणी भारत, पूर्वी भारत और पश्चिमी भारत के हिन्दी साहित्य को भी खाँचों में बन्द कर देंगे? सामाजिक अनुभवों को स्थानीय संस्कृति नियंत्रित करती है। फिर किस प्रदेश के सामाजिक अनुभव को मानदण्ड निर्धारित करेंगे, किन संवेदनाओं को आदर्श घोषित किया जाए, किस साहित्य को प्रवासी! वैसे हिन्दी साहित्य में पहले से  ही कौन सा विमर्शों की कमी है! आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।

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