कल शाम
खिलौनों के कबाड़ में 
टूटे–फूटे खिलौनों के बीच 
तुड़ा-मुड़ा, सिमटा-सा
मेरा बचपन 
मुझे मिल गया 
और मैं 
उसे ओढ़ कर 
फिर से,
उछलती-कूदती 
नृत्य करती 
जीवंत गुड़िया बन गई।

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