समीक्ष्य पुस्तक : पानी केरा बुदबुदा (उपन्यास) लेखिका : सुषम बेदी प्रकाशक : किताब घर वर्ष 2017 पृष्ठ : 167, पेपरबैक मूल्य : ₹ 300.00 ‘पानी केरा बुदबुदा’ 2017 में किताबघर, दिल्ली से प्रकाशित सुषम बेदी का नौवाँ उपन्यास है। इससे पहले उनके ‘हवन’, ‘लौटना’, ‘इतर’, ‘कतरा-दर-कतरा’, ‘नवाभूम की प्रेमकथा’, मोरचे’, ‘मैंने नाता तोड़ा’, ’गाथा अमरबेल की’ हिन्दी साहित्य को मिल चुके हैं। ‘पानी केरा बुदबुदा’ में कुल 38 परिच्छेद हैं। उपन्यास नायिका प्रधान है। यूँ तो आदि से अंत तक नायिका पिया का ही जीवन संघर्ष, द्वंद्व, चिंतन, समझौते, छटपटाहटें हैं, लेकिन उसका जीवन निशांत, अनुराग, दामोदर, रोहण से जुड़ा है। इसी कारण 12 परिच्छेदों के शीर्षक नायिका पिया के नाम पर, सात के पिया के पुरुष मित्रों निशांत और अनुराग के नाम पर, दो के पति दामोदर के नाम पर, पाँच के बेटे रोहण के नाम पर हैं और पाँच परिच्छेद अनाम हैं। पिया, निशांत, अनुराग… आगे पढ़ें
  समीक्ष्य पुस्तक : पानी केरा बुदबुदा लेखिका : सुषम बेदी सजिल्द : 167 पृष्ठ प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन संस्करण वर्ष : 2017 आईएसबीएन : 9382114289 सुषम बेदी वर्तमान की उन कथाकारों में प्रमुख हैं जिन्होंने भारत और पश्चिमी परिवेश को बड़े नज़दीक से देखा है। यही कारण है कि उनकी कथाभूमि के केंद्र में भी दोनों संस्कृतियाँ रहीं हैं। अपने सद्यः प्रकाशित उपन्यास ‘पानी केरा बुदबुदा’ के माध्यम से सुषम जी भारतीय और अमेरिकी परिवेश से गुज़रती एक उच्च शिक्षित एवं आत्मनिर्भर नारी के मानवीय रिश्तों की परिधि में स्थायीत्व की तलाश कर रही हैं। यह उपन्यास इस विचारधारा को सीधे-सीधे ख़ारिज करता है कि उच्च शिक्षा और आर्थिक सम्पन्नता ही व्यक्ति के जीवन में शांति एवं सुख के आधार होते हैं। उपन्यास की नायिका पिया जिस मानसिक त्रासदी और अस्थिरता के दौर से गुज़र रही है वह पूरी दुनिया की उन लाखों महिलाओं की त्रासदी है… आगे पढ़ें
समीक्ष्य पुस्तक : सड़क की लय लेखक : सुषम बेदी प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन    प्रकाशित  संस्करण वर्ष : 2017 पृष्ठ संख्या :168 मूल्य: ₹300 मुखपृष्ठ : सजिल्द आईएसबीएन :9789384344689 सुषम बेदी जी से मेरी जान-पहचान पत्राचार के माध्यम से हुई। 1995 में अपनी पीएच.डी. पूरी करके, मैं डी.लिट. के लिए एक अध्ययन करना चाह रही थी, विषय लिया था, ’उत्तरी अमेरिका में हिंदी के अध्ययन और अध्यापन की समस्याएँ’। कोलंबिया, साउथ कैरोलिना, अमरीका में रहते हुए उस समय एक लंबा प्रश्न पत्र सा बनाकर मैंने अमेरिका के अनेक विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाने वाले सभी प्राध्यापकों को भेजा था। उन प्राध्यापकों के नाम और पते जुटाने में बहुत मेहनत की थी। 1994 में इंटरनेट ने इतनी तरक़्क़ी नहीं की थी कि सारी सूचनाएँ, आज की तरह आसानी से उपलब्ध हो सकती अतः अनेक माध्यमों से अनेक प्राध्यापकों के पतों को जुटाकर मैंने चिट्ठियाँ भेजी थीं। लगभग 25 चिट्ठियों में… आगे पढ़ें