कोहरे की सुबह, शनिवार, २७ दिसंबर २०२५
चेतना सिंह ‘चितेरी’
आज बहुत ठंड है। बाहर घना कोहरा पसरा हुआ है,
फिर भी काम पर तो जाना ही होगा।
मालकिन इंतज़ार कर रही होंगी—
साहब को जल्दी ऑफिस जाना होता है।
वैसे भी प्रयागराज में ठंड कुछ ज़्यादा ही पड़ती है।
मालकिन ठीक ही कहती हैं—हमारा शहर नदियों से घिरा है।
लगता है, आज धूप भी नहीं निकलेगी।
रजनी दुशाला लाने के लिए नंदिनी को आवाज़ देती हुई झोपड़ी के बाहर निकली।
“अम्मा! स्वेटर पहनी हो न?”
“हाँ-हाँ बिटिया, स्वेटर पहनी हूँ।”
“मोज़े भी पहन लो अम्मा।”
रजनी हल्की मुस्कान के साथ बोली—
“अरे बिटिया, पानी में उतरकर काम करना होता है।
कब तक जूता-मोज़ा पहनकर काम चलेगा?
हमसे ऐसे काम नहीं होते।”
वैसे ही उम्र ढल रही है।
घुटनों में दर्द रहता है—सर्दियों में तो और बढ़ जाता है।
काम न करूँ तो खाऊँ क्या?
घर का खर्च कैसे चले?
इसीलिए तो कहती हूँ बिटिया—मन लगाकर पढ़ो।
नौकरी पा जाओगी तो मुझे भी आराम मिल जाएगा।
नंदिनी ने भरोसे से कहा—
“हाँ अम्मा, मैं मेहनत कर रही हूँ।
मेरी नौकरी लगते ही आप बर्तन धोने का काम छोड़ देना।”
रजनी ठिठक गई।
धीमे स्वर में बोली—
“अरे नहीं बिटिया…
नौकरी लगेगी तो तुम्हारा ब्याह कर दूँगी।
तुम अपने ससुराल चली जाओगी,
मुझे कौन देखेगा?”
थोड़ी देर चुप रहकर वह आगे बोली—
“मालकिन बहुत अच्छी हैं।
मेरी सुख-दुख की साथी हैं।
सुबह उनके घर जाती हूँ—
नाश्ता देती हैं, चाय देती हैं,
पानी गरम कर देती हैं।
काम निपटने के बाद कहती हैं—
‘आइए चाची, बैठिए।’
इज्ज़त देती हैं।”
“ब्लोअर चला देती हैं,
हाल-चाल पूछती हैं—
कोई परेशानी तो नहीं?”
कोहरे में खड़ी रजनी के चेहरे पर
सर्दी से ज़्यादा
ज़िंदगी की थकान जमी हुई थी—
जो मालकिन के प्रेम से धीरे-धीरे पिघल रही थी।
“दरवाज़ा बंद करके पढ़ना,”
नंदिनी से कहती हुई
वह कोहरे को चीरते हुए
मेंहदौरी स्थित मालकिन के घर पहुँची।
दरवाज़े पर पहुँचते ही घंटी बजाई।
दरवाज़ा खुलते ही मालकिन बोलीं—
“अरे चाची! इतनी ठंड में आप आ गईं?
आज तो रहने देतीं, आराम कर लेतीं।
मैं आपको फोन ही करने वाली थी—
ऐसी ठंड में मत आया कीजिए।
ठंड लग जाएगी आपको।”
“आइए, अंदर बैठिए।
आज आप कोई काम नहीं करेंगी,
आज मैं ही कर लूँगी।
आप आ जाती हैं तो मुझे भी अच्छा लगता है।”
फिर स्नेह से पूछा—
“बताइए, नंदिनी की पढ़ाई कैसी चल रही है?
उसके लिए कोई लड़का देखा है?”
रजनी चाची बोलीं—
“नहीं बिटिया,
पहले उसकी नौकरी लग जाए,
अपने पैरों पर खड़ी हो जाए—
तभी शादी करूँगी।”
मालकिन ने तुरंत कहा—
“हाँ चाची, आप बिल्कुल ठीक कह रही हैं।
घबराकर शादी मत कीजिएगा।
लड़का पीने-खाने वाला न हो—
ये ज़रूर देखिएगा।
नंदिनी बहुत होशियार है,
जैसी वह है—वैसा ही लड़का चाहिए।”
“मेरा पूरा सहयोग
नंदिनी बिटिया के साथ है।”
फिर बोलीं—
“चाची, नाश्ता कर लीजिए।
नंदिनी के लिए भी पैक कर देती हूँ।”
“अरे मालकिन,
नंदिनी बड़ी हो गई है—
कुछ बना-खा लेगी।”
“नहीं-नहीं चाची,”
मुस्कुराते हुए बोलीं,
“मैं उसे फोन कर दूँगी।
साहब किसी काम से बाहर जा रहे हैं—
आपको घर छोड़ देंगे।”
“अरे मालकिन,
साहब को परेशान मत कीजिए।”
“इसमें परेशानी कैसी, चाची?
रास्ता तो वही है।
आप तो मेरी माँ जैसी हैं।”
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