जीवन अपना अपना . . . 

15-09-2026

जीवन अपना अपना . . . 

मनोज शाह 'मानस' (अंक: 302, सितम्बर द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

किसी का जीवन है, 
कथा उपन्यास में। 
किसी का जीवन है . . . 
व्रत उपवास में॥
 
अपना तो जीवन बीता शौक़ संन्यास में। 
अपना तो जीवन बीता भूख विलास में॥
 
जिधर भी जाऊँ 
असर ही नहीं पड़ता। 
जो भी करूँ सड़क पर ही . . .
फ़र्क़ नहीं पड़ता॥
 
मेरा न तो घर है . . . 
न जाना है अन्य द्वार। 
मैंने तो भोगना है यहीं 
गुफा यहीं दीवार॥
 
धरा मेरी वसुंधरा धरती। 
तारे गिनकर रात बीतती॥
 
सितारों का जीवन . . . 
उन्मुक्त आकाश में। 
अपना तो जीवन 
बीता शौक़ संन्यास में॥
 
किसी का जीवन है, कथा उपन्यास में। 
किसी का जीवन है . . . व्रत उपवास में॥
 
छटपटा छटपटाकर . . ., 
कई भोर हुई प्यास में। 
मैं अति चिन्तन में हूँ . . ., 
उनके सुनसान आभास में॥
 
क्या पता किसको नारायण कहूँ . . .? 
क्या पता किसको साधारण कहूँ . . .?
 
हे सर्व साधारण के ईश्वर . . .! 
कहाँ हो परम परमेश्वर . . .!! 
 
मैं कहा हूँ . . .? तुम्हारे शिलान्यास में। 
अपना तो जीवन बीता भूख विलास में॥
 
किसी का जीवन है, कथा उपन्यास में। 
किसी का जीवन है . . .  व्रत उपवास में॥
 
अपना तो जीवन बीता शौक़ संन्यास में। 
अपना तो जीवन बीता भूख विलास में॥

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