जीवन अपना अपना . . .
मनोज शाह 'मानस'
किसी का जीवन है,
कथा उपन्यास में।
किसी का जीवन है . . .
व्रत उपवास में॥
अपना तो जीवन बीता शौक़ संन्यास में।
अपना तो जीवन बीता भूख विलास में॥
जिधर भी जाऊँ
असर ही नहीं पड़ता।
जो भी करूँ सड़क पर ही . . .
फ़र्क़ नहीं पड़ता॥
मेरा न तो घर है . . .
न जाना है अन्य द्वार।
मैंने तो भोगना है यहीं
गुफा यहीं दीवार॥
धरा मेरी वसुंधरा धरती।
तारे गिनकर रात बीतती॥
सितारों का जीवन . . .
उन्मुक्त आकाश में।
अपना तो जीवन
बीता शौक़ संन्यास में॥
किसी का जीवन है, कथा उपन्यास में।
किसी का जीवन है . . . व्रत उपवास में॥
छटपटा छटपटाकर . . .,
कई भोर हुई प्यास में।
मैं अति चिन्तन में हूँ . . .,
उनके सुनसान आभास में॥
क्या पता किसको नारायण कहूँ . . .?
क्या पता किसको साधारण कहूँ . . .?
हे सर्व साधारण के ईश्वर . . .!
कहाँ हो परम परमेश्वर . . .!!
मैं कहा हूँ . . .? तुम्हारे शिलान्यास में।
अपना तो जीवन बीता भूख विलास में॥
किसी का जीवन है, कथा उपन्यास में।
किसी का जीवन है . . . व्रत उपवास में॥
अपना तो जीवन बीता शौक़ संन्यास में।
अपना तो जीवन बीता भूख विलास में॥
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