शिक्षा बिंदु
मनोज शाह 'मानस'
प्रेरणा की शिक्षा-बिंदु पर
क़त्लेआम खुलेआम—
कौन झूठा, कौन सच्चा?
न तो तुम्हें पता है,
ना तो मुझे पता है . . . !
चेतना की उच्चतम बिंदु—
कहाँ है? किधर है?
ना तो तुमने देखा,
ना तो मैंने देखा . . . !
स्याही से
कविता लिखता हुआ—
मैंने तो देखा है
उसी स्याही से
दाग़ लगता हुआ,
गुट बनता हुआ,
भ्रष्टाचारियों पर
फेंकता हुआ—
तुमने भी देखा है . . . !
क़लम से
चित्र बनता हुआ,
संगीत रचता हुआ,
वाद्य बचता हुआ,
या गीत गाता हुआ—
होना चाहिए था,
यहाँ क़त्लेआम हो रहा है . . . !
सभ्यता की चरम
उत्थान—कैसी होगी?
कहने को छिटपुट घटना,
छिटपुट अग़ल-बग़ल दे रहे धरना—
सजीव . . . ! सजग . . . !!
परंतु कैसी विडंबना?
शिक्षा के नाम पर
व्यापार की खंजर
निकल रहा था—
घोड़ा यहाँ खच्चर बनकर
घास चर रहा था,
और बकरी की क़ुर्बानी दे रहा था . . . !
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