इस आवाज़ के कई तरह से मायने लगाए जा सकते थे।
मानों कोई अँधेरी, गहरी खाई से आवाज़ दे रहा हो। हल्की, कातर और सुन लिए जाने की उम्मीद से भरी हुई। मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था। उसने फोन करके इतना कातरता से बुलाया था कि मुझे लगा कोई इमरजेंसी हो गई हो। मैं अपने स्टुडियो में बैठ कर पेंट कर रही थी। किसी अनजान स्त्री का बदहवास पोट्रेट बना रही थी। उसकी आखों के पास स्याह डोरे डाल ही रही थी कि मोबाइल घनघना उठा था। मैंने ब्रश वहीं छोड़ा, एप्रिन उतारा और दौड़ती हुई उसके घर की तरफ़ जा रही थी। वो मेरे अपार्टमेंट के पीछे एक बड़ी-सी कोठी में रहती थी। वो अमीरों की नयी-नयी बसी हुई कॉलोनी थी। पैदल का रास्ता मैंने लगभग दौड़ते हुए तय किया था। मेरे लिए ये हैरानी की बात थी। इतनी चंचल, बिंदास, हँसोड़ स्त्री का इस तरह कातर होकर घर बुलाना . . . पहली बार मैंने उसकी ऐसी टूटी हुई-बिखरी हुई आवाज़ सुनी थी। मेरे दिमाग़ में भूचाल आ गया था। उसके घर तक पहुँचने में मुझे मानो सदियों लग रहे हों। मुझे उससे पहली मुलाक़ात याद आने लगी। पहली मुलाक़ातें अक़्सर स्थायी हो जाती हैं। अगर किसी की शख़्सियत विलक्षण हो। वो विलक्षण थी, क्योंकि मैंने उसे हमेशा दूसरों की मदद करते देखा था। रोते को हँसाते, परेशान का हाथ थामते, अभावग्रस्त को काम देते, क़र्ज़ देते, सबकी पसंद का उपहार बाँटते ही देखा है। वो दोस्तों के लिए उम्मीद का रोशन मीनार थी। ऐसी स्त्री को भी दर्द होता है, किसी ने नहीं सोचा था। वो रो भी सकती है, अकल्पनीय था।
मैंने पहली बार उसे देखा था। हमारे आज़ाद ख़्याल समूह में उसकी नया-नया प्रवेश था। मेरा ध्यान नहीं जाता उस पर, वो कोई ग़ैरमामूली स्त्री होती। हम छह स्त्रियों का एक मस्त ग्रुप था। जिसमें हरेक क़िस्म की यानी कुछ कामकाजी, कुछ उद्यमी थीं। कोई घरेलू नहीं थी। सब आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर थीं। सबके पास वक़्त की कमी थी लेकिन जीने की ललक तेज़ी से बढ़ रही थी। हरेक उम्र की स्त्रियाँ थीं, पैंतीस वर्ष की आयु से लेकर पचास तक की। उन सबमें उम्र और सोच की समानता कम थी मगर एक बिंदु पर आकर सब एक-सा सोचती थीं, जो उन्हें एकसूत्र में जोड़ता था, वो था धर्म-कर्म का मामला। सबकी सब घोर धार्मिक, सावन-भादों, कार्तिक मास, पितृपक्ष आदि आदि, सोम, मंगल, शनि देवता तक को मानने वाली स्त्रियाँ। करवा चौथ पर चाँद को ज़मीन पर उतार लाने वाली, तीज पर निर्जला व्रत करके पतियों को आक्रांत कर देने वाली इन परंपरागत-आधुनिकाओं का दोहरा जीवन था। सुबह-सुबह इनको कोई देख ले तो श्रद्धा से भर उठे और हरेक सप्ताह शुक्रवार की रात पबों में जाकर मिल ले, तो वह यक़ीनन सदमे में चला जाएगा। रोज़ की सुबहों और सप्ताहांत की नाइट लाइफ़ में कोई तालमेल नहीं, कोई टकराव भी नहीं। सबकुछ स्पष्ट था। सारी धार्मिकता एक तरफ़, पब वाली झूमती रातें एक तरफ़। तमाम विरोधाभासों से बना था उनका जीवन। चीखते गानों के भयानक शोर और रंग-बिरंगी रोशनियों के बीच काली-काली छायाएँ अलग ही संसार रचती हैं। न उम्र की सीमा हो न धर्म का हो बँधन . . . वे नशीली रातें अपने रंगीन अँधेरे में सारे भेद भुला देती हैं। उनमें मैं ही थोड़ा सबसे अलग और भिन्न सोच वाली स्त्री थी जो अपनी अनुभवी, पारखी आखों से उन स्त्रियों में कुछ अलग देखने की कोशिश करती थी। शायद बेहिचक कहूँ तो कलाकार इस समाज में ही सबसे मिसफ़िट होता जा रहा है, ऊपर से कोई स्त्री चित्रकार हो जाए तो दोहरा संकट है। मैं उन लोगों के समूह में मिसफ़िट थी मगर उनको मेरी बातें वज़नदार और मज़ेदार लगती थीं। शायद मेरी संगति उनके भीतर के मानसिक ख़ालीपन को भर देती थी। पहले हम छह थे, अब सात हो गए। मेरे लिए भी ये एक मज़ेदार और अलग क़िस्म का अनुभव था। मैं बदलते हुए समय और समाज को क़रीब से सूँघ पा रही थी। मैं अपने चित्रों में सिर्फ़ स्त्रियों की विभिन्न मुद्राएँ उकेरती थी। इसलिए भी स्त्रियों की संगति ज़रूरी थी, उनके हावभाव, मुद्राएँ, प्रतिक्रियाएँ, सुख-दुख सब भाव को पढ़ सकूँ। मेरे कैनवस के लिए स्त्रियाँ एक विषय थीं जो मेरी कला के लिए बहुत ख़ुराक देती थीं। अब तक कई क़िस्म की स्त्रियों से पाला पड़ा था। घरेलू से लेकर कामकाजी तक। किसी ऐसी स्त्री से पाला नहीं पड़ा था जो एकदम अलग हो, ख़ासकर मेरे मध्यवर्गीय चेतना को झकझोर देने वाली हो। जो आए, आते ही महफ़िल का मिज़ाज बदल दे। आगे बहुत कुछ हुआ, धीर-धीरे बताऊँगी।
वो जो नयी स्त्री आई थी उस शाम, उससे हाथ मिलाते हुए मेरे हाथ झनझना उठे थे। कोई स्पार्क नहीं हुआ था। अच्छी ख़ासी तंदुरुस्त, मंझोले क़द की, गोरी चिट्टी हिमाचली स्त्री थी जो वहाँ पहली मुलाक़ात में सबसे ज़्यादा खिलखिला रही थी या जबरन हँसने की कोशिश कर रही थी। परिचय के दौरान जब उसने हाथ मिलाया तो मुझे झनझनाहट इसलिए हुई कि वो सामान्य हथेली नहीं थी। उसमें घर्र घर्ररर की आवाज़ें निकल रही थीं। मुझे लगा, इसका रक्त कुछ ज़्यादा ही तेज़ दौड़ता है। या उसकी हथेली में कोई मशीन फ़िट है।
वह स्त्री नहीं, एक मशीन थी। मशीन को स्त्रियाँ चाहिए थीं, ताकि ख़ुद को एक स्त्री के रूप में महसूस कर सके। वह ईश्वर से भी मंदिरों में जाकर डील कर लेती थी।
उसने झन्नाक से, थोड़ी अकड़ के साथ अपना नाम बताया, “कुसुम नेगी।” मैंने ग़ौर से चेहरा-मोहरा देखा। लगभग चालीस वर्ष उम्र ज़रूर होगी। मेरी पचपन वर्षीय अनुभवी आखों से अब उम्र नहीं छुपती। कितना भी मेकअप पोत लें, उम्र किसी कोने से झाँक लेती है, जैसे कोई कोठरी में बंद स्त्री खिड़की या झरोखे या किसी झिर्री से झाँक लेती है।
हाँ तो बहुत ही वाचाल, मुखर और चंचला स्त्री से दोस्ती होते देर न लगी। दोस्त बनने की सारी पहल उसने की और मैं जैसे तैयार बैठी थी। जल्दी ही उसने हम सबको अपने घर दावत पर बुलाया था। पहली ही मुलाक़ात में मैंने ये महसूस किया कि वो हमारे समूह की सारी स्त्रियों पर कुसुम का दबदबा क़ायम हो गया था। उसकी वजह बहुत बाद में मुझे समझ आई थी। सारे मंत्रों से प्रभावी हैं, अर्थतंत्र। सबकी भाषा और रवैया बदल देता है। यारी, दोस्ती, रिश्तेदारी सब जगह एक तरह से असर करता है। धीरे-धीरे मुझे अहसास होता चला गया कि सब उसके वैभव में गिरफ़्तार थे। मैं कोई भली नहीं, मगर मुझे उसका चेहरा हमेशा उकसाता था कि उसे कैनवस पर उतारूँ। उसके चेहरे पर भावों की कई छवियाँ, छटाएँ देखती रही थी। कभी ये लालच नहीं रहा कि मेरी पेंटिग्स ख़रीदे। हालाँकि मैंने उसे देखा था, कैसे वो अपने समूह की स्त्रियों को प्रोमोट करती थी। रुमी पांडेय के बूटिक से कपड़े सिलवाने लगी थी और कई ग्राहक जोड़े। बाहर से उसे आर्डर दिलवाने लगी थी। रुमी का काम चमक उठा था। दिशा माथुर के सैलून में धनाढ्य स्त्रियाँ, जो कुसुम के संपर्क में थीं, वे आने लगी थीं। आरती के गिफ़्टिंग का बिज़नेस चमक उठा था। उसे बड़े कॉर्पोरेट घराने से गिफ़्ट के थोक में ऑर्डर आने लगे थे। इसी तरह लगभग सबका काम-धंधा चमका था, चमकाने वाली थी कुसुम। अब तक मेरे लिए ही कुसुम को मौक़ा नहीं मिल रहा था न मैं उसे मौक़ा दे रही थी। अगर मैं फ़रामइशी चित्रकार होती तो वो किसी न किसी बिल्डर या इंटीरियर डेकोरेटर से मिलवा कर मुझे लाभान्वित कर देती। मेरा काम अलग था। मैं चेहरे के हाव-भाव अपने ढंग से पेंट करती थी जिसमें शायद ही नव-धनाढ्य वर्ग या मध्यवर्ग की रुचि हो। मैं दिल्ली के श्रीधराणी आर्ट गैलरी में अपने सोलो शो की तैयारी कर रही थी। कुसुम को अफ़सोस यहीं होता कि वो मेरी कोई मदद नहीं कर पा रही है और मुझे इस बात से सुकून मिलता कि मैं उसके लाभों से वंचित हूँ, शायद इसीलिए धीरे-धीरे वो मेरी तरफ़ ज़्यादा खींचती चली गई। पूरे समूह में मैं ही उसे सबसे ज़्यादा प्रिय हो गई थी, बाक़ी सब लाभार्थी दोस्त थे। ये बुरा भी नहीं था, दोस्त वही होते हैं, जो आपकी श्री में और वृद्धि कर दें, जो कर सकें। और कुछ नहीं तो मनोबल बढ़ाते रहें, जो मेरे मामले में करती रहती थी। उसे कला की उतनी समझ भले न हो, उसे चेहरे समझ में आते थे। कहती थी, “मैं दिन भर लोगों को ही डील करती हूँ, उनके चेहरे से ही भाँप लेती हूँ। बस ऐसे रंग नहीं पकड़ पाती जो तुम्हारी पेंटिंग मुझे समझा रही है।”
वो हँसते हुए अक़्सर पूछती थी, “तुम हँसते हुए चेहरे क्यों नहीं बनाती हो . . . इन्हें देख-देखकर किसी दिन मैं गहरे अवसाद में चली जाऊँगी।”
मैं एक डायलॉग मार देती, “हँसते हुए चेहरे नक़ली लगते हैं। मुझे उनमें एक रहस्य, एक डर नज़र आता है, मानों वो कुछ छुपा रहे हों। हर वक़्त हँसते वहीं हैं जो डर में जीते हैं।”
“तब तो तुम मेरा चेहरा कभी नहीं बना पाओगी . . . मैं हमेशा हँसती रहती हूँ . . . तुम्हें इसमें भय नज़र आता है, जबकि मैं किसी से भयभीत नहीं होती हूँ। लोग मुझसे भय खाते हैं।”
वो ज़ोर से ठठा कर हँसी।
अनायास मेरे मुँह से निकला, “मुझे तुम्हारी हँसी में भय कम, दर्द ज़्यादा नज़र आता है।”
कुछ देर चुप रही। उसकी हँसी लुप्त हो गई थी। उसने कुछ पल सोचा फिर कहा, “जो दर्द सहता है, वही दर्द समझता है।”
अब मेरे चुप होने की बारी थी। ये चुप्पी इतनी लंबी और गहरी हुई कि इस मुलाक़ात के बाद मैं उससे बचने लगी। मैं अपने दर्द का पता किसी को नहीं दे सकती। वो मेरा खाद-पानी है जिससे मेरी कला फलती-फूलती है। दर्द बयाँ कर देना, ख़ुद को ख़ाली कर लेना है। इसीलिए मैं थोड़ा बचने लगी सबसे मिलने से।
लंबे अंतराल के बाद ही उसका कॉल आया था। इस बीच उसने दावतें दीं, मैं नदारद थी। अपने आर्ट कैंप की यात्राओं में व्यस्त। ग्रुप चैट में सब एक दूसरे का हाल लेते-देते रहते थे। मैं सब कुछ पढ़ कर अपडेट रहती, बस अपनी ख़बर नहीं दे पाती थी। किसी मज़ेदार रील पर ज़रूर हास्य का ईमोजी डाल देती।
उधर पार्टियों का दौर थमा नहीं था। सबको मेरी कमी खलती थी। मगर उन तारीख़ों में मैं उपलब्ध नहीं होती थी। कुछ जो वक़्त बचता, मैं उसे अपने स्टुडियो में बिता लेती, कुछ पढ़ने-लिखने-समझने में। बहुत ज़्यादा सोशलाइज़िंग मुझे वक़्त की बर्बादी लगने लगी थी। इसलिए भी जानबूझकर कटने लगी थी। कुसुम मुझे बुरी तरह मिस करती, मैसेज करती। जबकि समूह की अन्य स्त्रियों की शिकायत होती कि कुसुम जल्दी किसी का फोन नहीं उठाती है न मैसेज देखती है। अचानक कभी प्रकट हो जाएगी फिर सबको घसीट कर पार्टी करने ले जाएगी।
और सब स्त्रियाँ शिकायतों के बावजूद उसके सुविधानुसार पार्टी के लिए उपलब्ध हो जाती थीं।
आज अचानक मुद्दत बात उसका फोन . . . वो भी इतना सिहरा देने वाला।
उसके घर की तरफ़ भागती हुई मैं लगातार सोच रही हूँ कि उस हँसोड़, ज़िंदादिल स्त्री को हुआ क्या है? मैंने उसे एक लाइन में व्यक्त किया करती थी, “ऐसी मस्ती, ज़िंदापरस्ती . . . किताबों में भी ना मिलेगी . . .!”
ऐसी ज़िंदापरस्त स्त्री की बिखरी हुई आवाज़़ ने मुझे झकझोर दिया था और मैं जाने क्या-क्या सोच बैठी थी।
मैं घरेलू हिंसा के बारे में नहीं सोच पा रही थी। उसके हाउस हसबैंड को लेकर मैं आश्वस्त थी। शांत, विनम्र और पत्नी के साथ हर हाल में एडजस्ट हो जाने वाला इंसान। कभी ज़ोर से बोलते या किसी पर चीखते-चिल्लाते नहीं देखा न सुना। समूह में जहाँ स्त्रियाँ कभी-कभार पतियों का मज़ाक उड़ातीं या अपनी उपेक्षा की शिकायतें करतीं, वहाँ कुसुम शांतचित्त मुस्कुराती रहती। उसे ऊपर से देख कर अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि उसके भीतर क्या चल रहा है। हमेशा चेहरे पर लालिमा छाई रहती जिसे मैं एक प्रखर, स्वतंत्रचेता स्त्री का तेज समझती थी। आत्मविश्वास और स्वाभिमान से ऐसी रोशनी ऐसी स्त्रियों के चेहरे से निकलती है। मुस्कुराते हुए उसके गोरे गुदगुदे चेहरे पर लालिमा उभर आती। छोटी आँखें और छोटी हो जातीं। चेहरे पर कोई लट भूले से लटकती तो होंठ टेढ़ा कर, फुररर करके उड़ा देती। ऐसा करते हुए वो बहुत “क्यूट” लगती थी।
ऐसी स्त्री के रोते चेहरे के बारे में नहीं सोच सकती थी। जाने कैसी लगेगी। जो लोग रोते हुए को सहारा दे, चुप कराए और उसके लिए हँसी के फूल खिलाए, वो ख़ुद रोते हुए कैसे लगते होंगे। मेरे लिए अकल्पनीय था।
जब मैं उसके घर पहुँची तो दरवाज़ा खुला हुआ ही था। शायद कोई बाहर निकला था, दरवाज़ा अधखुला ही छोड़ गया था।
डायनिंग टेबल पर सारा खाना बिखरा पड़ा था। नीचे प्लेटें टूटी पड़ी थीं। सब्ज़ियों की ग्रेवी से टेबल और फ़र्श चिपचिपा हो गया था।
“संभल कर आना . . . मेरी गृहस्थी बिखरी हुई है इसी तरह . . . बहुत सहेजा, अब नहीं ढो सकती। कंधे दुखते हैं . . . शैली!”
मैं रास्ता बनाते हुए, बोनचाइना के नुकीले टुकड़ों से बचते हुए उसके पास जाकर एक कुर्सी पर बैठ गई। मेरी आखों में आश्चर्य में डूबे सवाल तैर रहे थे।
“तुम भी . . . कुसुम तुम भी . . .!” मेरे होंठ काँपे।
मन ही मन कुछ कहा मैंने जिसे कुसुम ने नहीं सुना, “मैं बरसों पहले इन टुकड़ों पर चल कर ज़ख़्मी हुई और दरवाज़े से बाहर निकल गई थी। अब सुकून है। तुम क्यों झेल रही हो ये सब?”
उसने जो जवाब दिए, उससे मैं चौंक गई।
“ये हम दोनों ने मिल कर किए हैं . . . ”
“अच्छा?”
“क्यों? चीज़ें भी क़ीमती होती हैं। उन्हें बर्बाद क्यों कर रही, जिसे प्यार से जुटाया होगा। हुआ क्या?”
“ये चीज़ें फिर आ जाएँगी . . . जो विश्वास टूटा है, वो कभी वापस बहाल नहीं होगा।”
वह हौले-हौले सुबक पड़ी। मैंने चुप नहीं कराया। उसे रोना चाहिए, मन हल्का होता है। उसे दुख को रचनात्मक नहीं बनाना है तो कह देना चाहिए। मेरे दुख का बोझ कला ढोती है, जो कलाविहीन है, उन्हें दुख कहना चाहिए।
“शैली . . . समूह में किसी से मत कहना ये सब। मैं नहीं चाहती कि मेरे दोस्त मुझ पर तरस खाएँ या जज करें। मैंने तुम्हें इसलिए इनवॉल्व किया कि तुम गॉसिप नहीं करती हो। ना ना . . . मुझे कोई सलाह नहीं चाहिए। कोई मदद नहीं। बस तुम्हें अपना दुख बताना चाहती हूँ . . . अब अगर और दिन चुप रही तो मेरे भीतर इतने विस्फोट होंगे कि मेरे चिथड़े उड़ जाएँगे।”
मैंने उसकी नरम और गुदगुदी हथेली अपने हाथों में ले ली।
बिना कुछ कहे, मैं उसे आश्वस्त कर रही थी। दुख ही दुख से बात करता है। सुख कभी दूसरे सुख के पास नहीं फटकने देता।
वह बोले जा रही थी, “मैं टीटू (पति का घरेलू नाम) के लिए नोट छापने की मशीन हूँ . . . मशीन को आराम का कोई हक़ नहीं। उसे छपाई करते रहना चाहिए।”
“मैंने शादी ही ज़्यादा उम्र में की। पहले मुझे मायके वालों को सेटल करना था। सबको बिज़नेस सेटल करके किया। फिर शादी के बारे में सोचा। टीटू मिला, किसी रिलेटिव के ज़रिए। हमने एक दूसरे को पसंद किया, शादी कर ली। सोचा, अब चैन से अपना काम करूँगी, एक बेटा है, उस पर ध्यान दूँगी। तब टीटू की अच्छी ख़ासी फ़ैक्ट्री चल रही थी। लेकिन मुझे कैसी ज़िंदगी मिली?”
कुसुम अपनी पूरी ज़िंदगी खोल रही थी मेरे सामने।
“ये बंदा मेरे आते ही हाउस हसबैंड बन बैठा। फ़ैक्ट्री में ताला बंद। सच-झूठ कारण बताए। मेरा रेस्टोरेंट का काम अच्छा चल रहा था। मैंने इसके दबाव में आकर चार बड़े सिटीज़ में खोल लिए। हर जगह मुझे जाना पड़ता है। एक पैर कोलकाता, दूसरा चेन्नई, तीसरा बेंगलोर और दिल्ली। अब दुबई में एक पार्टी से डील फ़ाइनल कर चुकी।”
वह चुप हो गई थी। मुझे अब तक कोई समस्या नज़र नहीं आ रही जिस पर विवाद हो। हाउस हसबैंड तो इन दिनों रिवाज़-सा बन गया है। इसमें कोई बुराई नहीं। कोई तो घर देख रहा है।
मुझे चुप देख कर कुसुम ने कहा, “या तो मुझसे बच्चे पलवा लो या नोट छपवा लो। दोनों काम एक साथ नहीं कर सकती . . . इन मर्दों को पत्नी में सारे रूप चाहिए। मेरे भीतर ममत्व जागता ही नहीं। न पत्नी भाव जागता है। काम और बढ़ गया है, भाग रही हूँ लगातार। कैसे समय दूँ घर को, बच्चे को, पति को? मैं मर्द बन चुकी हूँ, मुझसे घरेलू औरतों वाली अपेक्षा ग़लत है न . . . ख़ुद औरत क्यों नहीं बन जाता . . . कामनाहीन औरत . . .।”
मेरा मन हुआ पूछूँ कि तुम दोनों के बीच सेक्सुअल रिश्ते कैसे हैं, मुझे जवाब उसकी बातों में मिल गया था . . . कामनाहीन औरत . . .।
“तुम काम बाँटती क्यों नहीं? टीटू को कुछ काम सौंप दो,” ये मेरा सुझाव था।
“काम ही तो नहीं करना चाहता शैली . . . यहीं तो रोना है। एक रेस्टोरेंट तैयार करके सौंपा था, पैसा डूबा कर घर बैठ गया। और सारा दोष मेरा। काम नहीं कर सकता . . . बीवी टकसाल बनी रहे बस। और समय पर माँ बन जाए, प्रेमिका बन जाए . . . इसे न प्रेमी बनना है, न सहयोगी, न पति।”
“ऐसा कब तक चलेगा?” ये सवाल मेरी आखों से झाँकें और कुसुम ने पढ़ लिए।
“वो घर छोड़ कर चला गया। बोल रहा था—तलाक़ के पेपर भिजवा दूँगा।”
“अरे . . . बहुत दुखद। इतनी बात बढ़ गई। मैं बात करूँ टीटू से?”
“कोई फ़ायदा नहीं। टकसाल को कौन आसानी से लूज़ करता है। दो-चार दिन अपनी बहन के पास रहेगा, रोएगा, गाएगा और लौट कर आ जाएगा। पहली बार नहीं किया ऐसा। मैं थक गई हूँ। मुझे समझ नहीं आ रहा, क्या निर्णय लूँ? तुम होती तो क्या करती??”
वह मुझे झकझोर रही थी। मैं उठी, उसके कंधे थपथपाए, “वही . . . जो आज कर रही हूँ।”
कह न सकी। क्योंकि एक रोग के उपचार अलग-अलग भी हो सकते हैं।
मैंने बस इतना कहा, “इसकी आदत पड़ गई है तुम्हें। उठो, टुकड़े चुनो।”
“आज एक नया चेहरा पेंट करने जा रही हूँ . . .!”