प्रोन्नति की ख़ुशी में मैं और मेरा परिवार मगन ही था तभी विभाग द्वारा स्थानान्तरण की सूची जारी कर दी गई। उस सूची के अनुसार मेरा स्थानान्तरण बड़ोदरा प्रधान कार्यालय हो गया था और मुझे एक सप्ताह के अन्दर नई नियुक्ति पर पहुँचना था। इसकी जानकारी होते ही हम लोगों की प्रसन्नता धूमिल हो गई थी। ख़ैर! नौकरी की है तो आदेश का अनुपालन तो करना ही पड़ेगा, यही सोच कर भोपाल प्रधान कार्यालय से कार्य मुक्त होने पर मैं सपरिवार बड़ोदरा पहुँच गया।
बड़ोदरा प्रधान कार्यालय में रिपोर्ट करने पर मुझे भरूच ज़िले की जंबूसर शाखा में नियुक्ति का आदेश पकड़ा दिया गया। विवश मुझे सपरिवार जंबूसर क़स्बे के लिए प्रस्थान करना पड़ा।
जंबूसर क़स्बे में एक दिन बाज़ार में सब्ज़ी ख़रीदते समय मुझे घनश्याम दिखाई पड़ा। मैं जब इन्टरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद जहानाबाद में रह रही अपनी मौसी के घर पर रह कर बी.ए. की पढ़ाई कर रहा था तब घनश्याम मेरा सहपाठी और घनिष्ठ मित्र था। घर से सैंकड़ों मील दूर किसी मित्र के अचानक मिल जाने पर जो ख़ुशी होती है, उसे शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं है।
मैंने घनश्याम को पुकारा तो उसने मुझे देखा। मुझे देखते ही उसका चेहरा मलिन पड़ गया और वह तेज़ी से साइकिल पर सवार होकर भागा। यह देख कर मुझे दुख भी हुआ और आश्चर्य भी। मैं जब तक उसके पास पहुँचता, वह बहुत दूर जा चुका था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि वह मुझे देख कर क्यों घबरा गया और क्यों बिना मिले ही भाग खड़ा हुआ।
कुछ दिन बाद घनश्याम मुझे फिर सड़क पर दिखाई दिया। मैंने चुपचाप उसका पीछा किया और शीघ्र ही उसके पास पहुँच कर उसे पकड़ लिया।
मैंने उससे पूछा, “मुझे पहचाना नहीं क्या घनश्याम?”
उसने मेरा हाथ झटक दिया और बोला, “कौन घनश्याम? आपको कोई ग़लतफ़हमी हुई है। मैं घनश्याम नहीं हूँ।”
मैंने हँस कर कहा, “भले ही हम अट्ठारह-बीस वर्ष बाद मिल रहे हैं। मगर मैं तुम्हें पहचान नहीं सकूँ, ऐसा नहीं हो सकता।”
यह सुनकर कर वह मुझे किंकर्तव्यविमूढ़-सा देखता रहा फिर मेरे पैर पकड़ कर बोला, “तुम अगर मेरे सच्चे मित्र हो तो किसी से यह न बताना कि तुमने मुझे यहाँ देखा है।”
“आख़िर ऐसा क्यों? और तुम जहांगीराबाद छोड़ कर यहाँ कैसे रह रहे हो?” मैंने आश्चर्य से पूछा।
“क्या तुम्हें जहांगीराबाद में हमारे परिवार के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली?” उसने प्रतिप्रश्न किया।
“बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मेरी नौकरी लग गई और तब से मैं जहांगीराबाद जा ही नहीं सका,” यह कहते हुए मैं उसे पास में ही चाय की दुकान पर ले गया और वहाँ उससे पूछा—आख़िर तुम जहांगीराबाद से यहाँ क्यों आ गये और यहाँ क्या करते हो?”
वह फूट-फूट कर रो पड़ा। कुछ शांत होने पर उसने बताया, “यह तो तुम जानते ही हो कि मेरे पिता सेना में सूबेदार मेजर थे। जब उनकी नियुक्ति राजस्थान में थी तो वह हनी-ट्रैप में फँस गये और फिर धन के लालच में आई.एस.आई. एजेंट को भारतीय सेना से संबंधित गुप्त सूचनाएँ और नक़्शे आदि भेजने लगे।
“घर में मम्मी को जब उन्होंने बहुत मात्रा में धन देना शुरू किया तो मम्मी ने पूछा कि यह धन तो तुम्हारे कुल वेतन से भी अधिक है तो वह बोले कि अब मैं सेना में बड़ा अधिकारी हो गया हूँ।
“इसके कुछ महीनों बाद उन्हें भारतीय सेना द्वारा शत्रु देश के लिए जासूसी करने के अपराध में गिरफ़्तार कर लिया। उन पर मुक़दमा चला और उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा हो गई।
“यह बाते जब जहांगीराबाद वालों को ज्ञात हुई तो वे सब मेरी मम्मी को गद्दार की बीबी और मुझे गद्दार का बेटा कह कर बुलाने लगे। हमने इस कलंक को धोने के लिए अपने घर को धर्मशाला बना दिया और अपने बाग़ को आर्य समाज मंदिर को दान कर दिया। मगर लोग धर्मशाला को ‘गद्दार की धर्मशाला’ और बाग़ को ‘गद्दार का बाग़’ कह कर संबोधित करने लगे। हमें तो वे लोग पहले से ही गद्दार की बीबी और गद्दार का बेटा कह कर संबोधित करते थे, सारी सम्पत्ति दान करने के बाद भी हमारे सिर पर चढ़े कलंक में कोई कमी नहीं आई।
“रोज़ रोज़ के अपमान से त्रस्त होकर मैं अपनी मम्मी को लेकर यहाँ चला आया और रघुवर दयाल सर्राफ की दुकान पर मुनीम हो गया . . . मगर यहाँ भी . . .”
फिर मेरे पैर पकड़ कर वह गिड़गिड़ाने लगा और रोते हुए मुझसे वचन लिया कि मैं यह बात किसी से नहीं कहूँगा कि मुझसे तुम्हारी भेंट जंबूसर में हुई।
मुझे याद आया कि सन् 1757 ई. में अँग्रेज़ों और बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला में ऐतिहासिक युद्ध हुआ था जिसे प्लासी का युद्ध कहा जाता है। इस युद्ध में नवाब सिराजुद्दौला के सेनापति मीर जाफर ने नवाब और अपनी सेना से गद्दारी कर अँग्रेज़ों से समझौता कर लिया था और उसकी गद्दारी के कारण अँग्रेज़ सेना की इस युद्ध में विजय हुई थी और भारत में अंग्रेज़ी शासन का प्रारंभ हुआ था। आज भी मीर जाफर के महल के खंडहर मौजूद हैं जिन्हें तीन शताब्दियों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी मुर्शिदाबाद में जनता ‘नमकहराम की ड्योढ़ी’ संबोधित करती है। वाक़ई यह देशद्रोह का कलंक कभी पीछा नहीं छोड़ता और इसका डंक देशद्रोही की आने वाली पीढ़ियों को भी अपमानित करता है।
पन्द्रह-बीस दिन बाद एक दिन उससे भेंट करने के लिए रघुवर दयाल सर्राफ की दुकान पर गया तो पता चला कि पाँच-छह दिन पहले ही घनश्याम दुकान से अपना हिसाब करके नौकरी छोड़ गया है।
मुझे यह सुनकर बहुत अफ़सोस हुआ। मेरे मुँह से अकस्मात् ही निकल पड़ा, “तुमने मेरा विश्वास नहीं किया मित्र। न जाने तुम कब तक अपने पिता द्वारा किए गए देशद्रोह के भीषण कलंक से बचने के लिए भटकते-भागते फिरोगे।”