विशेषांक: इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ

01 Sep, 2026

 

आज बाज़ार से घर जाने के लिए रिक्शे में बैठी तो अनजाने नंबर से एक फोन आया। न चाहते हुए भी उठा लिया। उधर से इंतिखाब सर बोल रहे थे।

“मैडम कहाँ हो आजकल?”

सर का फोन आता है तो स्वतः ही सकारात्मकता रक्त में प्रवाहित होने लगती है। बाज़ार की भीड़भाड़ से जितना परेशान हो गई थी। रिक्शे वाले पर भी झुँझलाहट सी हो रही थी, वो सब ग़ायब हो गई। 

“घर आई हुई हूँ, सर। छुट्टियाँ चल रही हैं ना। फिर पूरे साल निकलना हो नहीं पाता है। आप बताएँ, क्या सहायता कर सकती हूँ?” 

सर से जब भी कभी बात होती तो पहला सवाल और पहला जवाब यही होता था। सर किसी और से भी बात कर रहे थे शायद, थोड़ी देर जवाब नहीं आया। मैं फोन कान से लगाए हुए ही रिक्शे से उतर गई। दूसरे हाथ से पर्स में हाथ डालकर रिक्शे वाले को देने के लिए पैसे निकाले और घर के बाहर ही खड़ी हो गई। बात ख़त्म करके ही घर के अंदर जाना चाहती थी। 

“सहायता कोई नहीं चाहिए मैडम, बस शिकायत करनी थी आपसे। आप बिना बताए, बिना मिले ही नौकरी छोड़कर चले गए। एक बार मिलना तो था आकर।”

“सर अचानक से सब कुछ हो गया। पति का तबादला हुआ तो मुझे भी साथ में आना पड़ा। मिल नहीं पाई उसके लिए माफ़ी चाहती हूँ।”

मैंने हिचकिचाते हुए जवाब दिया। सर का फोन फिर से होल्ड पर चला गया था। मैंने घर का दरवाज़ा खोला और अंदर आ गई। फोन स्पीकर पर था। 

“आपने जिस तरह इन ग़रीब मज़दूरों के दिमाग़ में पढ़-लिखकर कुछ बनने की ललक जगाई है, उसके लिए आपका शुक्रिया अदा करते हैं।”

“आपका निर्देशन ऐसा ही था सर। हमने तो वही किया जो आपने बताया। हम भी आपके और उन बच्चों के शुक्रगुज़ार रहेंगे। हमने भी बहुत कुछ सीखा है। धन्यवाद सर। कभी उधर आना हुआ तो आपसे ज़रूर मिलेंगे। फोन करने के लिए धन्यवाद सर।” 

फोन दूसरी ओर से कट गया था परन्तु कई घटनाएँ मस्तिष्क पटल पर फिर से घटित होने लगी थीं। 

पति का तबादला हुआ तो फिर से नौकरी छोड़कर उनके साथ एक नए शहर में आना हुआ। घर को व्यवस्थित करने के बाद शहर के निजी विद्यालयों में शिक्षिका की नौकरी के लिए आवेदन करना शुरू कर दिया। नौकरी तो मिल रही थी लेकिन प्राथमिक कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ाने की। विषय पर पकड़ होते हुए भी बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए नियुक्ति देने को कोई भी विद्यालय तैयार नहीं हुआ। उनकी बात अपनी जगह सही भी थी।

“मैडम आपने एक जगह ठहरकर नौकरी नहीं की है कभी। ऐसे शिक्षक को हम बोर्ड कक्षाएँ पढ़ाने के लिए नहीं दे सकते हैं। बोर्ड कक्षाएँ परिणाम आधारित होती हैं। छात्रों का ही नहीं समस्त विद्यालय का भविष्य इन कक्षाओं पर टिका होता है। आप पढ़ी लिखी, समझदार हैं।” 

एक कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया। एक ऑनलाइन कोर्स करना शुरू कर दिया। छह महीने निकल गए। एक दिन अचानक एक दुकान पर एक महिला शिक्षिका से बात हुई तो उसने मुस्लिम विद्यालय के विषय में जानकारी दी। वह भी वही विषय पढ़ा रही थी। सरकारी नौकरी में चयन हो जाने के कारण उसे नौकरी छोड़नी पड़ रही थी। कुछ दिन सोचने के बाद आख़िर एक दिन विद्यालय पहुँच गई। वह शिक्षिका तब तक विद्यालय छोड़ चुकी थी। 

“मैडम हम किसी पुरुष को रखना चाहते हैं। हमारा लड़कों का विद्यालय है। लड़के भी मज़दूर परिवेश के हैं। महिला शिक्षिकाओं को ये रुकने ही नहीं देते हैं। कब क्या कर दें, पता नहीं चलता है। आपने सभी अच्छे विद्यालयों में काम किया है तो मेरी सलाह है कि आप वहीं आवेदन करें। आपकी योग्यता के अनुसार वेतन भी हम नहीं दे पाएँगे।” 

इंतिखाब सर से यह पहली मुलाक़ात थी। उस दिन उनका नाम भी नहीं जानती थी। अपने विद्यार्थियों और विद्यालय के विषय में उन्होंने खुलकर बताया, इसी बात ने प्रभावित किया था। कुछ सोचकर जवाब दिया। 

“सर, मुझे एक बार आप कोशिश करने दें तो बेहतर है। पाँच शिक्षकों को ये विद्यार्थी भगा चुके हैं। हो सकता है, छठे को स्वीकार कर लें। परामर्शदाता का कोर्स भी हमने अभी पूरा किया है। हर प्रकार के विद्यार्थी को समझना उसमें सीखा है। एक प्रयोग करने की अनुमति आप हमें दें तो बेहतर होगा।” 

इंतिखाब सर ने चश्मा उतारकर मेज़ पर रख दिया और ध्यान से मेरा रिज्यूमे पढ़ा। फिर विद्यालय की समय सारणी के इंचार्ज को बुलाकर एक कक्षा में भेजने का आदेश दिया। 

पूरा एक घंटा अपना विषय अपने तरीक़े से पढ़ाने के बाद इंचार्ज महोदय दूसरी कक्षा में ले गए। इस तरह चार कक्षाओं में हमने पहले दिन पढ़ाया। छह महीने से घर में बैठे हुए थे इसलिए गले में दर्द हो गया लेकिन अपनी ओर से कोई कमी नहीं आने दी। छुट्टी के समय सर ने बोला कि आप कल भी आइए। एक सप्ताह तक आपके शिक्षण का पर्यवेक्षण किया जाएगा और अगले सप्ताह आपको हाँ या ना का जवाब मिल जाएगा। 

एक सप्ताह संशय में गुज़रा परन्तु शनिवार को ख़ुशख़बरी मिल गई कि नियुक्ति हो जाएगी। एक चुनौती को जैसे पार कर लिया था। सोमवार को सर ने बुलाकर निर्देश दिया। 

“मैडम! मुझे नहीं लगा था कि आप इन बच्चों को पढ़ाने में सफल हो पाएँगी। परन्तु आपने कर दिखाया। मुझे आपको अपने विद्यालय का हिस्सा बनाते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है। हाँ एक बात आपसे कहना चाहता हूँ कि मेरे विद्यार्थियों को आगे भी आप संस्कृत के श्लोकों की सहायता से विज्ञान पढ़ाना जारी रखना। वो बहुत ख़ुश हैं, आपके पढ़ाने के तरीक़े से।” 

मैं आश्चर्य से सर की ओर देख रही थी। डरते डरते पूछ ही लिया।

“सर, मुस्लिम बच्चे हैं। संस्कृत के श्लोकों का ज्ञान उन्हें देने पर धार्मिक विरोध तो उत्पन्न नहीं हो जाएगा?” 

सर मेरी बात सुनकर हँसते हुए बोले, “मैडम, मेरे छात्र इस हिंदुस्तान में जनमे हैं। हिंदुस्तान के धार्मिक ग्रन्थ यदि संस्कृत में हैं तो क्या हुआ? मेरे छात्रों को अपने मुल्क के धार्मिक ग्रंथों और उनमें लिखी बातों की जानकारी होना आवश्यक है। किसी धर्म को इसमें क्या ऐतराज़ हो सकता है?” 

मेरी शंका अभी ख़त्म नहीं हुई थी। मैंने फिर से एक प्रश्न पूछ लिया, “सर आप धर्म परिवर्तन वाले मुसलमान हो क्या?”

इस बार सर कुर्सी से उठकर बोले।

“मोहतरमा, पक्का नमाज़ी मुसलमान हूँ। क़ुरान शरीफ़ की सभी आयतें मुझे ज़बानी याद हैं। इसलिए ऐसा कह रहा हूँ। क़ुरान में कहीं ऐसा लिखा ही नहीं है कि अरबी अथवा उर्दू ही मुसलमानों को पढ़नी चाहिए। मुल्क की ज़बान और उसके उसूलों का इल्म मेरे छात्रों को भी होना चाहिए। आप उसमें सहयोग करें।”

मेरे दिमाग़ में उस समय अंग्रेज़ी माध्यम के विद्यालयों की तस्वीर घूम रही थी जिनमें हिंदी बोलने पर सज़ा का प्रावधान है। गीता, वेद और पुराण की जानकारी विद्यार्थियों को विद्यालय छोड़ने तक नहीं हो पाती है। विद्यालय में हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों माध्यमों में कक्षाएँ लगती थीं। 

अगले दिन कक्षा में पहुँची तो सारे विद्यार्थी कबूतर उड़ाने में व्यस्त थे। कमरे के सभी पंखे बंद किए हुए थे। मेरे आने पर सब वापस अपनी अपनी कुर्सी पर बैठ गए। मैंने अगली पंक्ति में बैठे एक विद्यार्थी को पंखों को चलाने का इशारा किया। 

“मैडम कबूतर मर जाएगा, पंखे से कटकर। पहले उसे निकालने दो कमरे के बाहर।”

उस दिन की कक्षा बिना पंखा चलाए ही ली। सभी छात्र गर्मी में बैठे रहे किन्तु जब तक कबूतर खिड़की से निकल नहीं गया तब तक पंखा नहीं चला। इंतिखाब सर को इस घटना की जानकारी दी तो ख़ुश हो गए। 

“बच्चे आपका अनुसरण करने लगे हैं, मैडम। जबसे प्रधानाचार्य की कुर्सी पर बैठा हूँ तब से ऐसा शिक्षक ढूँढ़ रहा था जो बच्चों के मन को बदल सके। आपका शुक्रगुज़ार हूँ।”

छात्रों की आत्मीयता और इंतिखाब सर का प्रोत्साहन नई ऊर्जा का संचार कर रहा था। केवल परीक्षा परिणाम ही अपेक्षा से अधिक नहीं आ रहा था बल्कि छात्रों का अनुशासन भी सुधर रहा था। 

“मैडम इन गधों के साथ क्यों इतनी मेहनत कर रहे हो आप। विद्यालय में घूमने आ जाते हैं। शाम को दुकानों पर मज़दूरी करते हैं। जैसे-तैसे बारहवीं तक पढ़कर भी इन्हें करनी तो मज़दूरी ही है।”

ये फब्तियाँ साथी शिक्षक आते-जाते हुए, कसते ही रहते थे। फिर भी मैं अपने कर्त्तव्य का निर्वाह पूरे मन से करने में जुटी हुई थी। कुछ दिनों के लिए यह नियम बनाया गया कि आधी छुट्टी से पहले जो शिक्षक कक्षा में होगा वह अगले कालांश तक वहीं रहेगा। उसी दौरान एक दिन चौथा कालांश पूरा हुआ तो विद्यार्थी हाथ धोने चले गए। वापस आकर मुझसे बोले कि आप बाहर बैठो। कुर्सी कमरे के बाहर रख दी। मुझे अजीब लग रहा था। वो घटनाएँ याद आ रही थीं जो दूसरे शिक्षकों के साथ उन विद्यार्थियों के बारे में सुनने में आई थी।

एक विद्यार्थी दरवाज़ा बंद करने लगा तो मैंने पूछ ही लिया, “मुझे बाहर क्यों निकाल रहे हो?” 

“बाहर नहीं मैडम। वो अफ़ज़ल आज मांसाहारी खाना ले आया ग़लती से। उसकी अम्मी को पता नहीं था। आप तो शाकाहारी हो ना। बस इसीलिए थोड़ी देर बाहर बैठ जाओ। हमें कमरे के बाहर खाना खाने नहीं देंगे।” 

हर बार उन छात्रों की बातों ने मुझे चौंकाया। कई बार तो भावुक ही कर दिया। दिवाली की छुट्टी होने वाली थी। मेरे दिमाग़ में था कि दिवाली तो हिंदुओं का त्योहार है। इसलिए गृह कार्य में ज़्यादा काम दे रही थी। 

“मैडम दीवाली का मौक़ा है। इतना काम नहीं हो पाएगा। कम कर दो,” पीछे की कुर्सी पर बैठे एक विद्यार्थी ने खड़े होकर कहा। 

“दीवाली तुम थोड़े ही मनाते हो। दीए नहीं जलाने हैं, पटाखे भी नहीं फोड़ने हैं तुम्हें तो काम पूरा कर लेना,” मैंने थोड़ा मज़ाकिया लहज़े में डाँटकर कहा। 

“दीए जलाते नहीं हैं, मैडम। पटाखे भी नहीं फोड़ते हैं। पर अबू के ठेले पर बिकवाने तो हैं ना। कई दिनों से ठेला लगा रखा है। अबू मेरी छुट्टी का इंतज़ार कर रहे हैं।”

मैंने तुरंत प्रश्न बोलना बंद कर दिया। आँखों में आँसू भर आए। 

बड़े बड़े शब्दों में बोर्ड पर लिखा—“दीवाली मुबारक।” 

इंतिखाब सर भी इस बात को सुनकर थोड़ी देर के लिए चुप हो गए। 

“मैडम मैंने कहा था ना कि हमारा मुल्क है, हिंदुस्तान। काश ये राजनेता भी इस बात को समझ पाते। मुसलमान से ख़रीदकर हिन्दू दीए जलाता है, दिवाली पर।” 

एक और बात जो मैं छोड़ना नहीं चाहती हूँ, उन छात्रों से मैंने सीखी। उर्दू भाषा और उसका सही उच्चारण। मैं हिंदी और अंग्रेज़ी में बोलती और छात्रों से उर्दू में बुलवाती। मैं शिक्षिका बनकर गई थी वहाँ लेकिन छात्रा बन गई थी। गर्व होता था अपनी वसुधैव कुटुंबकम् की विचारधारा पर। जब बिना किसी ग़लती के वो छात्र संस्कृत के श्लोक बोलते थे। ग़लती होने पर उनका प्रिय वाक्य जो पूरी कक्षा मिलकर बोलती थी। 

“गीता पर हाथ रखकर क़सम खाते हैं, हमने काग़ज़ नहीं फैलाए हैं। दोपहर की पारी वाले छोटे बच्चों ने फैलाए हैं। आपा को बुला लाते हैं, सफ़ाई कर देगी।”

पाँच साल जैसे मैं खोई रही, उन्हें नवरात्रि महोत्सव के, महत्त्व के बारे में जानकारी देने में, दशहरा, दीवाली, होली, लोहड़ी मनाने का कारण बताने में। 

पति के तबादले के चलते वो शहर और मुस्लिम विद्यालय छूट गया। गर्मी की छुट्टियों में शहर छोड़ा। इंतिखाब सर और उन बच्चों के सामने जाने की हिम्मत ही नहीं हुई। हर दिन ईश्वर से यही प्रार्थना की कि उन लोगों को न्याय दे जो अपना मुल्क अपने दिल में बसाए हुए हैं और उन गद्दारों को सज़ा दे जिनके कारण एक धर्म के अनुयायी आतंक और कट्टरता का पर्याय समझे जाने लगे हैं। 

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