विशेषांक: इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ

15 Sep, 2026

 

कल सुबह मैं स्कूल-ट्रिप पर पैरिस जा रही हूँ; मुझे चिंता है कि मेरी अनुपस्थिति में पापा-मम्मी एक दूसरे से कैसे बात करेंगे? एक महीने से अधिक हो चुका है कि पापा-मम्मी को जो एक दूसरे से कहना होता है, वे मेरे माध्यम से कहते-सुनते हैं। शुरू-शुरू में तो मुझे यह खेल अच्छा लगा था क्योंकि उनके बीच संवाद का ज़रिया मैं थी और इसीलिए वे दोनों मेरी ख़ूब आवाभगत कर रहे थे और मेरी हर बात पर तवज्जो दे रहे थे, चाहे वह कितनी भी बेवुक़ूफ़ी भरी क्यों न हो। किन्तु कुछ ही दिनों के बाद मैं इस खेल से बोर हो गयी क्योंकि अपने अपने छोटे-छोटे पैग़ामों के लिए भी वे मुझे परेशान करते रहते हैं। 

कल रात की ही तो बात है; मैं फोन पर अपनी सहेली एप्रिल से गृहकार्य के विषय में बात कर रही थी और मम्मी बार-बार मुझे परेशान कर रही थीं कि पापा को बता दूँ कि खाना ठंडा हो रहा है। एप्रिल से फोन होल्ड करने को कहते हुए मैं धड़ाधड़ सीढ़ियाँ चढ़ती हुई ऊपर पहुँची तो देखा पापा बाथरूम में गाना गा रहे थे। मैं चिल्ला कर कह भी देती तो वह तौलिया पहने तो नीचे नहीं आ सकते थे; आज देर से लौटे हैं तो समय तो लगेगा ही और मम्मी यह अच्छी तरह से जानती हैं कि दफ़्तर से आने के बाद वह हमेशा नहा कर ही खाना खाते हैं। मैं चुपचाप नीचे आकर मेज़ पर बैठ गयी। 

“दरवाज़ा खटखटा कर पूछ नहीं सकती थी, इस घर में समय की परवाह किसी को नहीं है,” मम्मी अपना ग़ुस्सा मुझ पर उतारने लगीं और मैं फोन पर एप्रिल से गप्पें मारती रही।

सुबह फिर वही कहानी! नाश्ते के लिए बैठी ही थी कि मम्मी ने मुझ से कहा कि पापा से पूछूँ कि नाश्ते में वह बॉइल्ड अंडा लेंगे या फ़्राईड।

“आप पापा से ख़ुद क्यों नहीं पूछ लेतीं?” मेरे झल्ला देने पर मम्मी चुप हो गईं।

“पापा, मम्मी को बता दीजिए कि आपको बौईल्ड-एग चाहिए या फ़्राईड,” मैंने बाहर आकर पापा से पूछा, जो फ़ोयर में जूते पहन रहे थे।

“स्क्रैम्ब्लड,” पापा ने बताया।

“मुझे स्कूल को देर हो रही है, आप मम्मी को प्लीज़ बता दीजिए, बाय,” अपने मुँह टोस्ट ठूँसते हुए मैं जल्दी से घर से बाहर आ गयी और दरवाज़े पर कान लगा कर खड़ी हो गयी यह सुनने के लिए कि पापा अब यह सूचना मम्मी को कैसे देते हैं; शायद उनका अनबोला टूट जाए। 

कुछ ही देर में मुझे अन्दर से धरा-पटक सुनाई दी।

“तुम जानती हो कि मुझे बौईल्ड-एग पसंद नहीं,” अन्दर से पापा की आवाज़ सुनायी दी। लो, ये तो फिर लड़ने लगे! बात बिगड़ती नज़र आयी; मैं मम्मी को बता ही देती तो अच्छा रहता पर ऐसा कब तक चलेगा?

“मुझे क्या सपना आ रहा है कि आज तुम्हें स्क्रैम्ब्लड-एग खाना है।” 

“सुबह-सुबह मूड ख़राब कर दिया।”

“मेरा मूड तो पूरे दिन के लिए बर्बाद हो गया,” कहते हुए मम्मी बुड़बुड़ाती हुई अचानक बाहर निकल आईं।

“किशमिश, तू अभी तक यहाँ क्या कर रही है?”

“तुम दोनों की मीठी-मीठी बातें सुन रही थी।”

“तुझे इन सब चक्करों में पड़ने की ज़रूरत नहीं है, स्कूल को देर हो रही है।”

मैं कहाँ उन्हें ऐसी आसानी से छोड़ने वाली थी। जब मैं टस से मस न हुई तो उन्होंने मुझे घूरकर देखा। एप्रिल ने मुझे बताया था कि बहुत से माँ-बाप, चाहे कितने भी दुखी क्यों न हों, अपने बच्चों की ख़ातिर ज़बरदस्ती एक साथ रहते हैं।

“मम्मी, आपसे मुझे एक ज़रूरी बात पूछनी है . . . आप दोनों क्या मेरी वजह से साथ रह रहे हैं?”

मेरे इस प्रश्न पर मम्मी के माथे पर बल पड़ गये; उन्होंने टेढ़ी आँखों से मुझे ग़ौर से देखा पर चुप रहीं।

“बताइए न,” मैंने ठुनकते हुए अपना प्रश्न दोहराया।

“शाम को बात करते हैं,” कहते हुए वह बस-स्टॉप की और बढ़ गईं।

एप्रिल के पापा-मम्मी भी ऐसे ही झगड़ते रहते थे और फिर एक दिन उन दोनों ने तलाक़ ले लिया। मुझे डर था कि जल्दी ही मेरे मम्मी पापा भी तलाक़ ले लेंगे; एप्रिल की बातों से तो मुझे यही लग रहा है। हमारे पड़ौस में लगभग सभी जोड़े तलाक़शुदा थे। सोमवार से शुक्रवार के बीच अधिकतर बच्चे अपनी मम्मियों के साथ रहते हैं और सप्ताहांत पर अपने पिताओं के साथ मस्ती करते हैं। पिछले सप्ताहांत पर एप्रिल के पापा जब बच्चों को लेने नहीं पहुँचे तो एप्रिल और उसका भाई क्रिस बहुत उदास हुए। उनके घर में तना-तनी बनी रही क्योंकि उसकी मम्मी को अपने नये बॉय-फ्रैंड के साथ बाहर घूमने का कार्यक्रम रद्द करना पड़ा था।

“तुम्हारे पापा को तुम दोनों की कोई परवाह नहीं है; वह अपनी गर्ल-फ्रैंड के साथ स्काटलैंड जा रहे हैं,” एप्रिल की मम्मी बहुत ग़ुस्से में होंगी क्योंकि वह इस तरह की बातें बच्चों के सामने नहीं किया करतीं।

“इसका मतलब है कि पापा को अब मेरे और क्रिस के लिए समय नहीं मिलेगा,” उदास एप्रिल ने मुझ से कहा।

“मेरी प्यारी एपल, तुम्हारे पापा की अपनी निजी ज़िंदगी भी तो है कि नहीं? और ऐसा पहली बार हुआ है कि तुम्हारे पापा नहीं या पाए,” एप्रिल की मम्मी को भी अपने लिए भी ‘निजी’ समय चाहिए ताकि वह अपने महबूब के साथ सप्ताहांत गुज़ार सकें। मैंने उसे ढाढ़स बँधाया पर मन ही मन मैं सोच रही थी कि कहीं हमारे परिवार का भी यही हश्र तो नहीं होने वाला है।

“मैं और क्रिस बहुत लक्की हैं, किशमिश, कई माँ-बाप अपने बच्चों की बिलकुल परवाह ही नहीं करते।”

“मुझे नहीं लगता कि मेरे मम्मी पापा का मामला अभी इतना गम्भीर है।”

“क्रिस और मैं भी यही सोचा करते थे कि हम बच्चों के होते हुए वे ऐसा नहीं करेंगे,” एप्रिल फिर उदास हो गयी।

“ओह!” मेरा दिल डूबने लगा; कहीं मुझे और सोशल-सिक्योरिटी वाले ले गए तो? मैंने सुना है कि वहाँ बच्चों के साथ बुरा सुलूक किया जाता है। ऐसे वातावरण में पले-बढ़े बच्चे बड़े होकर गुंडे-बदमाश बनते हैं, ड्रग्स खरीनदने के लिए चोरी-डकैती भी कर सकते हैं।

“निराश नहीं हो, किशमिश, एक अच्छी बात यह है कि तुम्हारे मम्मी-पापा एक दूसरे से अभी नफ़रत नहीं करते।”

“तो?” 

“शायद उनके सम्बन्ध सुधर जाएँं।”

“एपल, सच क्या? पर कैसे?” मुझे आशा की एक किरण दिखाई दी।

“मम्मी पापा का जब तलाक़ हुआ तो गूगल-सर्च पर मैंने पढ़ा था कि रिलेशनशिप-स्पेशलिस्टस की मदद से सम्बन्ध सुधारे जा सकते हैं।”

“पर रिलेशनशिप-स्पेशलिस्टस तो बहुत महँगे होंगे, मैं उनका ख़र्चा कैसे उठाऊँगी?”

“अरे बाबा, तुम नहीं, तुम्हारे मम्मी-पापा को उनकी मदद लेनी होगी।”

“मुझे नहीं लगता, एप्रिल, वे रिलेशनशिप-स्पेशलिस्टस पर पैसे ख़र्च करेंगे।”

“वो तो है, शायद तुम्हारा जीपी तुम्हारी मदद कर सके।”

“पर जीपी के पास तो मैं तभी जा सकती हूँ न कि जब मैं बीमार हूँ।”

“कह दो के तुम्हारे पेट में कई दिन से दर्द हो रहा है, जब वहाँ पहुँचो तो चुपके से एक पर्ची उसे पकड़ा देना।”

“जीपी ने कहीं मेरी पर्ची सोशल-सिक्योरिटी वालों तक पहुँचा दी न तो मेरा राम नाम सत्य हो जाएगा।”

“यह रिस्क तो तुम्हें लेना ही होगा, किशमिश।”

सारा दिन स्कूल में मैं बस यही सोचती रही कि इसके पहले कि पापा मम्मी तलाक़ के लिए अर्ज़ी दें, मुझे ही कुछ करना होगा। इतिहास की कक्षा में मैंने देखा कि एकाएक एप्रिल ऐसी प्रसन्न दिखाई देने लगी कि जैसे उसके दिमाग़ में पाँच सौ वाट का बल्ब जल उठा हो।

मध्यावकाश में हम दौड़ते-भागते बाहर मैदान में आ गए। “आइडिया!” कनपटी पर उँगली मारते हुए एप्रिल बोली।

“जल्दी बता।”

“मम्मी दफ़्तर के काम से एक हफ़्ते के लिए न्यू-यॉर्क जा रही हैं,” एप्रिल ने मेरे चेहरे पर अपनी नज़र गड़ाते हुए बताया।

“तो? तेरी मम्मी के न्यू-यॉर्क जाने से मेरी समस्या कैसे हल हो सकती है?”

“तू भी न बिलकुल बुद्धू है। मैं मम्मी से कहूँगी कि उनकी ग़ैरहाज़िरी में मैं पापा के पास नहीं रहना चाहती।”

“तो फिर तुम और क्रिस कहाँ रहोगे?”

“क्रिस पापा के साथ और मैं तेरे साथ, मैं क्रिस को पटा लूँगी और मम्मी की नाराज़गी दूर करने के लिए पापा क्रिस को अपने साथ ख़ुशी-ख़ुशी ले जाएँगे।”

“तब तो बड़ा मज़ा आएगा।”

“मज़ा करने के लिए नहीं, किशमिश, कुछ तिकड़म भिड़ाने के लिए,” उसने अपने बाईं आँँख दबाते हुए कहा।

“वाओ, मम्मी-पापा को मैं मना लूँगी, वैसे भी, आजकल वे मेरी कोई बात नहीं टालते।”

“फिर भी, पेरिस से आने के बाद हम दोनों पढ़ाकू बन जाएँगे ताकि हमारे साथ रहने पर उन्हें कोई एतराज़ न हो।”

“उन्हें एतराज़ क्या होगा?”

“अरे, तुझे नहीं पता, ये पेरेंट्स भी न उलटे-सीधे एतराज़ उठा कर सोचते हैं कि वे हमारे भले की ही सोच रहे हैं।”

एप्रिल बहुत होशियार लड़की है। कभी-कभी मुझे लगता है कि मेरी परवरिश में कहीं न कहीं कोई कमी अवश्य रह गयी होगी क्योंकि मेरा शारीरिक और मानसिक विकास उसके मुक़ाबले में कहीं कम है। हर पल मुझे उससे कुछ सीखने को ही मिलता है; मानव सम्बंधों का उसे अच्छा ज्ञान है। सहपाठी, अध्यापिकाएँ और माँ-बाप कब क्या और कैसे कहेंगें, वह पहले से ही जान जाती है।

वैसे, मैं भी ऐसी बुद्धू नहीं हूँ जितना मेरे मम्मी-पापा और एप्रिल समझते हैं।

जिस दिन हम पेरिस से लौटे, एप्रिल की मम्मी न्यू-यॉर्क जा चुकी थीं। एप्रिल का सूटकेस मेरे शयन-कक्ष में रखा था, जिसे देख कर हम दोनों बहुत उल्लास से भर गए।

“किशमिश, तुम्हारे पापा मम्मी साथ-साथ सोते हैं?” सेब को चबाते हुए एप्रिल शुरू हो गयी।

“नहीं, पापा की कमर में दर्द रहता है न, इसलिए वह लाइब्रेरी में रखे तख़्त पर सोते हैं।”

“बुलशिट, तू तो बिलकुल ही बुद्धू है, किशमिश।”

“तेरा मतलब है कि वह बहाना कर रहे हैं?”

“और नहीं तो क्या? सुन, कल शाम को ही लाइब्रेरी में पढ़ने बैठ जाएँगे।”

“ताकि उन दोनों को एक ही रूम में सोना पड़े,” मैं प्रफुल्लित हो उठी कि मेरा दिमाग़ भी काम करने लगा था या कहूँ कि यह एप्रिल की सोहबत का असर है।

मेरे दिमाग़ में हलचल मची थी। किन्तु अगले दिन दोपहर को एप्रिल का मूड इतना ख़राब हो गया कि हम लोग मम्मी-पापा के सम्बन्धों को सुधारने के विषय में कुछ और नहीं सोच पाए। 

हुआ यह कि हमारी कक्षा के ही एक शैतान लड़के ल्यूक ने एप्रिल के मोबाइल-फोन से ख़ुद को एक प्यार भरा संदेशा भेजा, जिसकी नुमाइश वह अपने दोस्तों में करता फिर रहा था।

एप्रिल के फोन में सुबह से रिसेप्शन नहीं था। उसने अपना फोन ल्यूक को दिया, जो स्कूल में घड़ियों, कम्प्यूटर्स और मोबाइल-फोन्स का एक्सपर्ट माना जाता है। फोन को खोल-खाल कर उसने ठीक तो कर दिया लेकिन ख़ुद को एक प्रेम-टैक्स्ट भेजने के बाद। बात प्रिंसिपल तक पहुँच गयी। ल्यूक को गंभीर चेतावनी दी गयी और सज़ा के रूप में उसके माता-पिता को भी इस सूचना दे दी गई। हालाँकि छात्रों द्वारा फ़ोटोज़ शेयर करना आजकल आम बात है किन्तु जब से पुलिस सलाहकार ने ख़तरों के प्रति हमें आगाह किया है, कम से कम एप्रिल और मैं ऐसी बेवुक़ूफ़ियों से दूर ही रहते हैं। 
इस घटना से मुझे एक योजना सूझी; ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा, मुझे भी चेतावनी मिल जाएगी, मम्मी-पापा मुझे घर से तो निकालने से रहे। मेरी बाँछें खिली देख कर एप्रिल अपनी परेशानी भूल कर मेरे पास आ बैठी।

“मेरे पास मम्मी और पापा दोनों के पासवर्डस हैं क्योंकि मैं उन्हीं के फोन्स पर गेम्स खेलती हूँ; मेरा फोन तो एकदम रद्दी है न,” मेरी योजना से वह भी सरोबार थी।

“यह हुई न बात! जब भी मौक़ा मिले, तू मम्मी की तरफ़ से मेल लिखना और मैं तेरे पापा की तरफ़ से।”

“पर प्रेमपत्र लिखते कैसे हैं?”

“अरे, उसमें क्या मुश्किल है, गूगल-सर्च कब काम आएगी?”

“पकड़े गए तो हमारी सारी मेहनत बेकार हो जाएगी।”

“हमें बहुत एहतियात बरतनी होगी, छोटी-छोटी बेकार की बातों से शुरू करेंगे; रोज़मर्रा की बातें, जैसे उन्हें तेरी फ़िक्र है, तू होम-वर्क ठीक से कर रही है या नहीं, कि उन्हें तेरे सामने ठीक से व्यवहार करना चाहिए, वग़ैरह।”

“और जब उन्हें विश्वास हो जाए कि वे दोनों ही एक दूसरे को लिख रहे हैं, तब हम प्रेम का इज़हार करेंगे . . .”

“वो भी छोटे-छोटे संकेतों से . . . जैसे, ‘याद है जब हम हनीमून पर गए थे’ या फिर ‘आजकल कुछ अच्छी फ़िल्में चल रही हैं’ . . . टाइप।”

“फ़िल्म के लिए तो हम भी ज़िद कर सकते हैं।”

“एक बार कहीं बाहर निकलेंगे तो वो दोनों आपस में बात तो करेंगे ही . . .”

“स्पेशली, जब हम अपने में ही मस्त हो जाएँं।”

हम दोनों की बातों का कोई अंत ही न था। अगले ही दिन हमारा नाटक शुरू हो गया। मैंने सुबह-सुबह अपना मुँह सुजा लिया और एप्रिल का व्यवहार भी अजीब हो गया, जो मम्मी-पापा से कहाँ छिपता?

“दोनों में झगड़ा हुआ क्या?” पापा ने पूछा तो हम दोनों ने कंधे उचका कर अपने मुँह फेर लिए।

उसी दोपहर को एक ई-मेल मम्मी की तरफ़ से पापा को भेजा गया, जिसमें दोनों सहेलियों के बीच हुई खटपट का ज़िक्र था; “जब तक एप्रिल की मम्मी न आ जाएँं, उसका ख़्याल रखना हमारा फ़र्ज़ है।”

इसके पहले कि हम पापा की तरफ़ से जवाब देते, पापा ने ख़ुद जवाब दिया कि “ठीक कह रही हो, आज शाम तुम उन्हें एक फ़िल्म दिखा लाओ।”

“मैं ही क्यों, हर बात का ठेका क्या मैंने ले रखा है?”

“मेरे पास समय नहीं है।”

“ठीक है तो रहने दो।”

“आज शुक्रवार है, सात बजे वाला चलेगा?” पापा ने तर्क से बचने की ख़ातिर लिखा। अब वे दोनों एक दूसरे को स्वयं ही ई-पत्र भेज रहे थे। हमने सोचा कि हमें इस वक़्त बीच से हट जाना चाहिए।

हम लोगों ने एक पुरस्कृत फ़िल्म देखी और फिर चिकीटोज़ में भोजन किया।

पापा-मम्मी एक दूसरे से अनजान से बैठे रहे। उनकी चुप्पी हमें खा रही थी।

“आप दोनों की भी अरेंज्ड मैरिज हुई थी क्या?” एप्रिल ने पूछा।

“नहीं,” मम्मी ने जवाब दिया।

“ओह वाओ, मैंने तो सुना था कि इंडिया में सबकी अरेंज्ड-मैरिज होती है। तो फिर आप दोनों कैसे मिले?” एप्रिल उन्हें ऐसे आसानी से छोड़ने वालों में से नहीं थी।

“हम एक ही दफ़्तर में काम करते थे।”

“आप में से किसी ने मुझे तो कभी नहीं बताया इस बारे में,” मैंने इसी बात पर मुँह चढ़ा लिया।

“इसमें बताने जैसा कुछ है ही नहीं, किशमिश।”

“है कैसे नहीं, पापा? पहल किसने की?” मैंने पूछा।

“मैंने,” पापा ने जवाब दिया।

“कैसे?” मम्मी पापा दोनों आरामदायक स्थिति में नहीं थे। तभी बैरा बिल ले आया और हमें उठना पड़ा। रास्ते भर दोनों अपने ही विचारों में गुम थे।

अगले ही हफ़्ते वैलेंटाइन्स-डे था। एप्रिल ने एक ख़ूबसूरत-सा कार्ड बना कर मुझे थमा दिया, जिसे मैंने पापा की तरफ़ से मम्मी को पोस्ट भेज दिया।

एप्रिल और मैं एक अन्य ग्रीटिंग-कार्ड पहले से ही ख़रीद कर ले आए थे, जो हम ईमानदारी से चाहते थे कि मम्मी ख़ुद पापा को दें। एप्रिल और मेरी ज़िद के आगे उन्हें झुकना ही पड़ा। मम्मी के गाल कई महीनों में गुलाबी हुए थे।

“पापा, मम्मी आपके लिए आज कुछ ख़ास बना रही हैं,” मैंने पापा को फोन पर झूठमूठ बताया।

“क्यों?” उन्होंने हैरान होते हुए पूछा।

“क्यों क्या, आज वैलेंटाइन्स-डे जो है, आप कहीं ख़ाली हाथ न चले आइएगा।”

एप्रिल और मैंने बैठक की सफ़ाई की। मेज़ पर महँगी वाली करौकरी और कटलरी सजाई, शैम्पेन की बोतल को आइस-होल्डर में रखा, बिल्लौरी गिलासों को चमका दिया और लाल मोमबत्तियाँ जला दीं; तभी चाइनीज़-भोजन आ पहुँचा; जिसे हमने हॉटकेस में रख दिया। घर अब एक रोमैंटिक डिनर के लिए तैयार था। मम्मी-पापा के आने से पहले हम वहाँ से फूट लिए। मैंने मम्मी-पापा को ई-मेल भेज दी थी कि आज मैं एप्रिल के यहाँ ठहर रही हूँ। उसकी मम्मी लौट
आईं थीं।

अगले दिन जब मैं और एप्रिल स्कूल से लौटे तो घर की शक्ल बता रही थी कि सब कुछ ठीक था—पर्दों को फुँदनों से बाँधा गया था, जगह-जगह फूलदानों में फूल सजे थे और मेज़ पर एक नोट रखा था, “किशमिश और एप्रिल के लिए मटर का पुलाव माइक्रो-अवन में रखा है!”

रात को मैं बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करती रही कि पापा लाइब्रेरी में सोते हैं कि अपने शयन-कक्ष में।

उनके शयन-कक्ष के दरवाज़े को खटखटा कर मैं भी उनके बिस्तर में घुस गयी।

“पापा-मम्मी, आपको अपने पासवर्ड बदल लेने चाहिएँ।”

“क्यों?”

“आजकल बहुत गड़बड़ हो रही है, वैसे भी पासवर्ड बदलते रहना चाहिए,” कहते हुए मैं कूद कर अपने कमरे में चली आई।

मुझे मम्मी पापा की खुसपुस और हँसने की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं; मेरी आँँखें ख़ुमार में ख़ुद-ब-ख़ुद मुँद गईं। 

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