विशेषांक: इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ

15 Sep, 2026

(मूल राजस्‍थानी क‍हानी का स्वयं द्वारा हिन्‍दी अनुवाद)

 

मन की जिस अनबन और आकुलता को लेकर आज आपके सामने आई हूँ, सम्भव है कि आपके लिए यह कोई नयी बात न हो और न ऐसे नयेपन के पीछे भटकने की फ़ुरसत ही हो! फिर भी इतनी-सी बात ज़रूर कहना चाहती हूँ कि मैं जिस घर-परिवार में पैदा होकर इस दुनिया में आई हूँ, उसमें अगर मेरी कोई ज़रूरी भूमिका मानी ही नहीं जाती तो उसके आगत-अनागत पर मेरे असर की अकारथ चिन्ता क्यों? इस घर-परिवार या जाति-बिरादरी के नियम-क़ायदे मानने या उनका चुनाव करने की छूट मुझे मिली ही नहीं, तो कोई कैसे इस बात का उलाहना मेरे नाम रख सकता है कि मैं उनकी इस दीन-दशा सुधारने-सँवारने के लिए कुछ करती क्यों नहीं? एक बात आप निश्चित जान लीजिये कि मुझे एक इन्सान के रूप में जो कुछ करना ज़रूरी लगता है, वह तो मैं करती आई हूँ और आगे भी करती रहूँगी, बिना किसी से कुछ उम्मीद रखे, लेकिन किसने मुझसे कब-क्या उम्मीद बाँध रखी है और मैं उस पर खरी उतरी या नहीं इस बात का प्रमाण आप मुझसे ही क्यों चाहते हैं? दिखती बात है कि यदि मनुष्य के रूप में कोई आराम और ख़ुशी के साथ जीना चाहता है तो उसके लिए पूगता इंतज़ाम तो उसे ख़ुद ही करना होगा न–आराम और ख़ुशी न कहीं माँगे मिलती है, न कोई आकर हाथ में सौंपता है और न किसी और का हक़ मार कर हासिल किया जा सकता है।

गाने-बजाने के ज़रिए अपनी रोज़ी कमाने वाले परिवार में औलाद, और वह भी लड़की, अपनी लड़कीपने की अवस्था में पहुँचने पर घर-परिवार और माँ-बाप से आख़िर क्या अपेक्षा रखती है? वे उसे इस अवस्था तक लाने में उससे जो कुछ चाहते-कराते रहें, उसको लेकर उनसे कुछ पूछने या उस पर एतराज़ उठाने की गुंजाइश ही कहाँ थी? अपने अधिकार और कर्त्तव्य के इस अंधे खेल में कौन कहाँ अपने अधिकार या कर्त्तव्य की मर्यादा लाँघ जाता है, इसका कौन कितना हिसाब रख सकता है? दिखती बात है कि ऊपर हाथ तो हमेशा माँ-बाप का ही होता है, सो फ़ैसला करने का हक़ भी उन्हीं के पक्ष में जाता है। यह तो दिखती बात है कि माँ-बाप ऐसे मौक़ों पर अमूमन अपनी सुविधा और सहूलियत पहले देखते हैं और वहीं व्यवहार उनकी आदत बन जाता है।

उस घर में जन्म लेने के बाद हम पाँच भाई-बहनों को, जिनमें चार तो हम बहनें ही थीं, कब क्या करना है, यह बात न कभी किसी को बतानी समझानी पड़ी और न किसी ने इस बारे में कुछ पूछा। पिता अपनी जवानी के दिनों में अच्छे सारंगीवादक और गायक रहे थे, जिसकी वजह से कई बरसों तक ठाकुर परिवारों और रईसों के बुलावों पर उनके वैवाहिक-माँगलिक अवसरों पर वे रजवाड़ी गीत गाने के लिए जाते रहे, लेकिन पिछले सालों में ऐसे बुलावे गिनती के ही रह गये थे, इसलिए उन्होंने अपनी सारंगी को उतार कर कमरे की लटान पर रख दिया था और पीने की आदत के कारण स्वर में भी वह सुरीलापन नहीं रह गया था। इन्हीं बरसों में आम घरों में विवाह-सगाई के मौक़ों पर माँ के गीतों की माँग ज़रूर बढ़ती रही और बड़ी वाली दोनों बहनें यशोदा और गौरी अपना स्वर सम्हालते ही माँ के साथ संगत में लग गईं थीं। तीसरे क्रम पर गर्भ में आए भाई गनपत ने बचपन से ही कुछ अलग रुझान रखा और इस पुश्तैनी पेशे में उसका मन कम ही रमा, लेकिन अपनी मन-मर्ज़ी के मुताबिक़ ढोल ज़रूर अच्छा बजा लेता था।

मुझे तो लगता है कि एक के पीछे एक जिस तरह हम सभी बच्चे इस घर में आते रहे और अपना-आपा सम्हालते रहे, इस बारे में हमारे माँ-बाप को यह सोचने की फ़ुरसत कभी मिली ही नहीं कि हमारी ज़िन्दगी किस आकार में ढलनी चाहिये। यदि हुई होती तो वे इतना तो अवश्य ध्यान रखते कि हमें एक इन्सान के रूप में ज़िन्दा रखने के लिए अपने पास कुछ गुंजाइशें और हौसला तो सहेज कर रखा ही होता। सभी के लिए रहने लायक़ घर, दोनों वक़्त की पूगती रोटी, पहनने-ओढ़ने के लिए ज़रूरत भर के कपड़े और देने के लिए एक अच्छा-सा भविष्य, क्या कभी इन ज़रूरी बातों पर उन्होंने ठहर कर विचार किया होगा? मुझे तो नहीं लगता। मानो माँ एक निरपेक्ष मानवीय मशीन थी और हम उस साँचे में स्वतः ढलते स्पंदित साज़, जो आकार लेते ही अपने सुर-ताल में बजने लगते। मैं इस बिखरती-बदलती सरगम का चौथा स्वर-साज़ थी—वाधू! शायद लोगों के सुझाव पर माँ-बाप ने मेरा यही नाम तय किया। जब तक मुझे इसका बोध होता, समूचे गाँव और जान-पहचान के दायरे में मेरा यही नाम चलन में आ चुका था। आज सोचती हूँ, यदि बाक़ी बहनों की तरह मैं भी छिपी-दबी जी लेती, तो न यों चर्चा में आती और न किसी को उम्मीद होती या शिकायत—नाम ही के अनुरूप अनजान वाधू (अतिरिक्त) ही रह जाती। यों मुझसे छोटी बहन बीना के बाद भी एक ज़िन्दगी के आने की उम्मीद और जगी थी, पर वह अधबीच में ही लुप्त हो गई और उसका जाने-अनजाने उलाहना भी बीना पर ही मढ़ा गया कि वह आने वाले भाई को खा गई! बहाना यह कि उसने माँ के गर्भवती हो जाने के बाद तक उसका दूध पीना छोड़ा ही नहीं, उसकी देह का सारा कस तो वही पी गई। भाई तो गया सो गया ही, पाँच महीने बाद माँ भी पीछे-पीछे सिधार गई। हमारे लिए तो बड़ी बहन यशोदा ही माँ समान थी। यदि गोद और कांधे का कोई मान-महत्व होता है तो उन दिनों वही हम छोटी बहनों और भाई का सबसे बड़ा सहारा थी। वह जब तक शादी करके अगले घर नहीं पहुँच गई, हमेशा हमारी ढाल बनी रहीं।

यशोदा ने बचपन से ही माँ के साथ रहते हुए वे सारे काम अपने ज़िम्मे सम्हाल लिये थे, जो घर चलाने के लिए ज़रूरी थे। वह औरतों के बीच बैठकर ढोल पर अकेली अच्छा गा-बजा लेती थी। रतजगे और विवाह की सारी रस्में वह जानती थीं। हम बहनों को भी वह अपने साथ जोड़ लेती थीं। एक विवाह में हमको साथ गाते देखकर स्कूल के मास्टर गिरिजाशंकर न जाने क्यों यशोदा को यह सलाह दे गये कि उसे हम छोटी बहनों को पढ़ने के लिए स्कूल ज़रूर भेज देना चाहिए। वह ख़ुद तो बाप, भाई और गौरी के साथ सारे समय घर में और गाँव में अपनी वृत्ति के काम में लगीं रहतीं, लेकिन हम छोटी बहनों को मास्टरजी के कहे अनुसार गाँव के स्कूल में अवश्य भेजना शुरू कर दिया। शुरू में तो यह उसकी परेशानी ही रही होगी कि उसे सारा दिन घर में हम छोटी बहनों और इकलौते भाई की सार-सँभाल करनी होती थी, ऐसे में मास्टरजी की इस सलाह में एक तरह से उसे राहत ही दिखी होगी कि स्कूल में बच्चे दो अक्षर सीख भी लेंगे और उसे भी घर सँभालने में थोड़ा आराम रहेगा। मेरे साथ गनपत और बीना भी स्कूल तो अवश्य जाते लेकिन उनका पढ़ाई में मन कुछ कम ही लगता था।

स्कूल मास्टर गिरिजाशंकर मेरे लिए तो समूची सृष्टि में एक ही आला दरजे के इन्सान बनकर सामने आए। अपने नाम के अनुरूप ही नेक और संगीत के अच्छे जानकार। हारमोनियम बजाने में तो उनकी जोड़ का आस-पास कोई मिलना ही असम्भव था। इस लिहाज़ से वे समूचे हलक़े में बहुत सधे हुए कलाकार के रूप में जाने जाते थे। गाँव में किसी के यहाँ रात्रि जागरण होता तो उन्हें बहुत आदर से बुलाया जाता। जितना मधुर स्वर उतनी ही असरदार वाणी के पाठ की व्याख्या। अच्छे-अच्छे भागवतकारों को पीछे बिठाते थे, लेकिन वे पूजापाठी पंडित नहीं थे। वे तो सरकारी स्कूल में हिन्दी और संगीत के सर्वप्रिय अध्यापक थे। स्कूल में बच्चों को अक्षरज्ञान तो कराते ही थे, जिस बच्चे में रुझान दिखाई देता, उसे अलग छाँटकर घंटों उससे संगीत का अभ्यास भी कराते। मुझे तो उन्होंने शुरू से ही अपनी देख-रेख में रख लिया था। पहली बार जब उन्होंने मुझे अपने पास बुलाकर कोई गीत सुनाने को कहा तो मैं तो इतना घबरा गई कि एकबारगी तो जैसे मेरा स्वर ही बंद हो गया, लेकिन फिर उन्होंने धीरे-धीरे मेरा हौसला बढ़ाया और जाने उन्हें मेरे स्वर में ऐसा क्या मिल गया कि उन्होंने तो स्कूल में गाने वाले बच्चों में मुझे जैसे हमेशा के लिए अलग ही छाँट लिया। स्कूल में जो भी आयोजन होता, और कोई बच्चा गाये या न गाये मेरा गाना तो तय ही होता था। वे घंटों मुझे अभ्यास में लगाये रखते, गाना ही जैसे मेरी पढ़ाई थी। मुझे भी सूखी पढ़ाइे की बनिस्बत इसमें ज़्यादा आनंद आता और पगली की तरह रागोलियाँ करती रहती। गीत तो हम बचपन से ही साँझ-सवेरे गाया ही करती थीं और विवाह सगाइयों में बहन यशोदा को सहारा देती थीं, लेकिन गाँव बाक़ी लड़कियों की देखा-देखी थोड़े हाथ पाँव भी घुमाना सीख गई तो तो सगाई-ब्‍याह के बुलावों में घोल उवांरगी भी कु्छ ज़्यादा ही मिलने लगीं। स्‍कूल में पाँचवें दर्जे तक आते-आते सारे गाँव और आस पास के हलक़े में यह हल्‍ला ही मच गया कि वाधुड़ी के जोड़ की गाने वाली और नाचने वाली लड़की सारे ज़िले में मिलनी मुश्किल है। पाँचवां दर्जा पास करने से पहले मास्‍टरजी ने मुझ पर एक अहसान ये किया कि उन्होंने स्‍कूल रिकार्ड में मेरा नाम वाधू से बदलवाकर वसुधा करवा दिया, वसुधा पंवार, और इसी नाम से स्‍कूल में और बाहर भी कई अच्‍छे कार्यक्रम भी करवा दिये। आयोजनों में इनाम इकरार भी मिलने लग गए। इससे निश्‍चय ही मेरे हौसले में अपूर्व बढोत्तरी होती गई।

स्कूल और बाहरी जलसों में भले ही मेरे गाने की सराहना होती रही हो, घर में बापू की मानसिकता पर इसका ज़्यादा अनुकूल असर नहीं पड़ा। अच्छी उवांरगी और नेग के लालच में उनकी पूरी कोशिश यही रहती कि मेरे स्कूल पहुँचने में भले ही विघ्न पड़ जाय, लेकिन गाँव में और बाहर से ब्याह-सगाइयों में गाने-नाचने के लिए आने वाले बुलावों में बढ़ोत्तरी होनी चाहिए, जिससे उनको होने वाली आमदनी में भी इज़ाफ़ा हो। मुझे ऐसे बुलावों पर जाना कभी अच्छा नहीं लगता, जो मेरे स्कूल पहुँचने में बाधा बनते हों। कई बार तो ऐसे बुलावों पर बापू के हामी भर लेने के बाद भी जाना टाल देती, जिसका नतीजा यह होता कि बापू अगले दिन मेरे साथ बेतरह गाली-गलौच करते और कभी-कभी तो मुझे उनकी मार भी झेलनी पड़ती। उनका मानना था कि मैं ब्याह-सगाइयों के बुलावों में अपने गायन और नृत्य-कला में जितना निखार ला सकती हूँ, उतना स्कूल में नहीं। स्कूल तो उनकी नज़र में हम पेशेवर कलाकारों का एक तरह से वक़्त ही बरबाद करता है और पढ़ाई के नाम पर फ़ालतू की चीज़ें सिखाता है, जिनका हम लोगों के जीवन में कहीं-कोई उपयोग नहीं होता, जबकि मैं जानती थी कि आज मैं जो कुछ सीखी-समझी हूँ, वह सारा इसी स्कूल की बदौलत ही सीख पाई हूँ। मैंने कई बार अपने गुरुजी को भी अपनी परेशानी बताई, लेकिन वे मेरे घरेलू मामलों में ज़्यादा दख़ल देने की स्थिति में नहीं थे। मेरी परेशानी को देखते हुए उन्होंने इतनी मदद ज़रूर कर दी कि पाँचवें दर्जे की परीक्षा के दौरान ही उन्होंने मेरी ओर से एक आवेदन नवोदय विद्यालय में दाख़िले के लिए अवश्‍य पहुँचवा दिया।

यह उनकी सीख और स्नेह का ही सुफल रहा कि पाँचवीं पास करते ही मेरा नवोदय के लिए चयन हो गया, जहाँ गाँव के चुनिन्दा ज़रूरतमंद बच्चों को सरकार की ओर से सारी सुविधाओं के साथ स्कूल के हॉस्टल में रखकर पढ़ाया जाता है, ऊपर से सरकार कुछ ज़रूरतमंद बच्चों को वजीफ़ा भी देती है। मुझे नहीं मालूम कि मुझमें कोई प्रतिभा थी या नहीं, लेकिन मुझे ये सारी सुविधाएँ मिल गईं और मेरे लिए तो यह व्यवस्था एक तरह से वरदान ही साबित हुई, लेकिन मेरे बापू को यह क़तई पसंद नहीं आई। वे तो अड़कर ही बैठ गये कि वे मुझे घर से बाहर कहीं नहीं जाने देंगे। गिरिजाशंकरजी ने उन्हें बहुत समझाया कि इससे लड़की का भविष्य सुधरेगा, लेकिन उनके तो दिमाग़ में बात बैठी ही नहीं। आख़िर मुझे यशोदा का सहारा लेना पड़ा। शुरू में तो वह भी बापू की ही तरह थोड़ी अनमनी और उदासीन बनी रही। असल में बापू और यशोदा की सबसे बड़ी चिन्ता यही थी कि मेरे घर से दूर जाते ही जिन ब्‍याह-सगाइयों के बुलावों में मेरे जाने से उन्हें अच्‍छी उवांरगी और उपहार मिल जाते थे, उस पर निश्‍चय ही फ़र्क़ पड़ सकता था। दूसरी किसी बहन के पास यह हुनर नहीं था। पिछले दो-तीन सालों में मेरे नाच-गानों से ऐसे पारिवारिक आयोजनों में उन्हें अच्छी-ख़ासी आमदनी होने लगी थी और अब मेरे दूर जाने की बात से उनके कलेजे में यह डर बैठ गया था कि उनकी कमाई में कमी हो सकती थी। लेकिन बड़ी बहन होने के नाते यशोदा यह कभी नहीं चाहती थी कि हम छोटी बहनों के साथ कोई ज़ोरजबरदस्ती की जाय। जब मैंने उसे अपना पक्का इरादा बता दिया कि मेरे नवोदय जाने का यदि ज़्यादा विरोध किया गया तो मैं सब को छोड़कर कहीं निकल जाऊँगी, फिर भले देखते रहना। संयोग से मेरी यह धमकी काम आ गई और उसने रात को बापू से बात कर उन्हें एक बार तो राज़ी कर ही लिया। दूसरे ही दिन वह ख़ुद गणपत को साथ लेकर मुझे पावटा के नवोदय विद्यालय पहुँचा आईं।

नवोदय में जब मैं आई तो मेरी उम्र क़रीब बारह साल की थी, लेकिन क़द-काठी ठीक होने से मैं ख़ासा बड़ी लगती थी। पहने-ओढ़े तो पूरी युवती ही। रंग-रूप में भी दिनोंदिन निखार आता जा रहा था। नवोदय के पहले बरस में जब दो-चार स्‍कूली आयोजनों में मुझे भी गाने का अवसर मिला तो अपने अच्‍छे स्‍वर के कारण तुरन्‍त ही मेरी गिनती अच्‍छे गाने वाले बच्‍चों में होने लगी और स्‍कूल के अध्‍यापकों की नज़र भी मुझ पर टिक गई। संगीत की अध्‍यापक अनीता जी यों तो मुझे पहले कार्यक्रम से ही पसंद करने लगीं थीं, लेकिन एक बार जयपुर में गिरिजाशंकर जी से हुई मुलाक़ात के दौरान जब उन्हें यह जानकारी मिली कि लोकगायन और नृत्‍य में मैं अच्‍छी तैयारी रखती हूँ, तो जयपुर से वापस लौटते ही उन्होंने मुझे अपने संरक्षण में ले लिया। वे ख़ुद भी कत्थक के जयपुर घराने की अच्छी नृत्‍यांगना रह चुकी थीं। नृत्य के साथ शास्त्रीय संगीत का भी उन्हें अच्छा ज्ञान था, जबकि मेरा तो पारंपरिक लोक गायन और लोकनृत्‍य में ही थोड़ा बहुत अभ्‍यास था। लोग कहते हैं, मेरी देह में ग़ज़ब की लोच थी। साथी नृत्यांगना के साथ लूहर लेने में तो मैं स्टेज पर फिरकी की तरह घूमने लगती थी। इससे कई बार साथ देने वाली नृत्यांगना संतुलन बिगड़ जाने के डर से घबरा उठती थीं। आने वाले छह वर्षों में मैंने अनीता जी की संगत और निर्देशन में इस कला में जो कुछ सीखा, उसमें लोगों को लोक-शैली और कत्‍थक का एक नया समन्‍वय देखने को मिला, जिसे चारों ओर अच्‍छी सराहना मिली।

इन पाँच-छः वर्षों में मुझे पढ़ने और अपनी कला प्रस्तुत करने के जो अवसर मिले, उनमें मैं ऐसी मगन रही कि कब मैंने हाई स्कूल और सीनियर सेकेण्डरी पास कर ली और कब एक नयी कलाकार के रूप में मैं चर्चित हो गई, उसकी ओर तो मेरा कभी ध्यान ही नहीं गया। इन वर्षों में मेरी प्रस्तुतियों से स्कूल का नाम और रुत्बा तो बढ़ा ही, प्रदेश और देश के बाहरी मंचों पर भी मेरी लोक-गायकी और नृत्‍य कला को अच्‍छी इमदाद मि‍ली। जिन दिनों मैं सीनियर सैकण्‍डरी में पढ़ रही थी, उन्हीं दिनों ऑल इंडिया रेडियो से स्‍वर-परीक्षा के लिए बुलावा आने पर मैं उसमें भी शामिल हुई और बाद में उसका परिणाम आने पर आश्‍चर्य हुआ कि मुझे सीधे बी हाई ग्रेड में पास किया गया है। यह मेरे लिए एक नया अनुभव था और उसके कारण रेडियो, टीवी और पर्यटन विभाग के आयोजनों और बाहर के कार्यक्रमों में मुझे लगातार बुलावे आने लगे। इसी स्‍वर परीक्षा के बाद जब कुछ अरसे बाद मुझे दिल्‍ली के कमानी ऑडिटोरियम में आकाशवाणी के सालाना उत्‍सव में अपना एकल नृत्‍य प्रस्‍तुत करने के लिए आमंत्रित किया गया तो इस अवसर के लिए मैंने ख़ूब मेहनत से तैयारी की। हालाँकि मैं बहुत आशंकित भी थी, लेकिन अनीता जी की हौसला अफ़ज़ाई और उसके साथ की वजह से मैंने इस आयोजन में अपने लोक-नृत्‍य और भवाई के अलग-अलग रूपों में ऐसे करतब दिखाए कि सभागार लोगों की करतल-ध्‍वनि से गूँज उठा। दूसरे ही दिन दिल्‍ली के राष्‍ट्रीय समाचार पत्रों में मेरी नृत्‍य मुद्राओं की ऐसी रंगीन तस्‍वीरें छपीं कि मैं तो जैसे रातों-रात सारे मुल्‍क में चर्चित हो गई। मैं अनीता जी की बहुत अहसानमंद हूँ कि ऐसे तमाम अवसरों पर वे मेरी संरक्षक की तरह मेरे साथ खड़ी रहीं और मेरी हरेक प्रस्‍तुति को उन्होंने ख़ुद अपनी देख-रेख में तैयार करवाया और सँवारा।

शुरू में मैं यह नहीं जानती थी कि कामयाबी और अच्छी ज़िन्दगी में क्या फ़र्क़ है। अपने गुरुजी और अनीताजी से इतना ज़रूर जान गई थी, कि अपनी ओर उठने वाली हर तरह की नज़रों से अपने को कैसे बचाकर रखा जाए। अनीताजी ने तो बल्कि ऐसी नज़रों के बारीक़ फ़र्क़ को भी समझाया। उन्होंने यह भी समझाया कि मुझ जैसी लड़की को अपने पाँवों पर खड़ा होने के लिए आगे पढ़ना भी बेहद ज़रूरी है और फ़िलहाल मुझे अपनी पढ़ाई और नृत्‍य–संगीत के लिए नियमित अभ्‍यास के अलावा किसी ओर ध्‍यान नहीं भटकने देना चाहिए। मुझे उनकी बातों में बहुत अपनापन लगता था और अपने प्रति एक सच्ची चिन्ता भी। नवोदय से सीनियर सेकेण्डरी पास करने के बाद मेरे पास इतनी गुंजायश भी बन गई थी कि मैं जयपुर में कॉलेज की पढ़ाई के लिए स्वतंत्र रूप से यह निर्णय ले सकूँ। ख़ुद अनीताजी ने मेरे साथ जयपुर आकर कॉलेज में दाख़िला दिलवाया और लड़कियों के हॉस्टल में मेरे लिए रहने का पूरा बंदोबस्त करवा दिया। यों जयपुर में उनका अपना घर भी था, जिसमें उनकी माँ और बड़े भाई का परिवार रहता था। पढ़ाई के साथ एक पेशेवर कलाकार के रूप में मेरा जुड़ाव संस्कृति मंत्रालय, पर्यटन विभाग, संगीत नाटक अकादमी और रेडियो-टीवी से पहले ही हो चुका था, जिसकी वजह से ऐसे कार्यक्रमों में मेरी भागीदारी लगातार बढ़ती जा रही थी। यों पंडित गिरिजाशंकर जी, अनीता जी, संगीत नाटक अकादमी की निदेशक सुधा जी और कई बड़े कलाकारों की सलाह और संरक्षण तो मेरा पुख़्ता आधार था ही।

कॉलेज के इन वर्षों में घर से मेरा संपर्क बहुत कम रह गया था। जयपुर आने के बाद दो-तीन बार बीना के बुलावे पर जब भी जाना पड़ा, उसे लगातार किसी न किसी परेशानी में ही पाया। यों नवोदय में दाख़िले के दो बरस बाद यशोदा और गौरी के विवाह के अवसर पर तो गाँव आना हुआ ही था, उससे अगले बरस भाई गणपत की सगाई के मौक़े पर भी आना हुआ, लेकिन जितनी बार भी गाँव आई, बापू का एक ही राग रहता कि पढ़ाई पूरी कर तुरन्त वापस गाँव आ जाऊँ। वे मेरा और बीना का भी जल्दी से जल्दी विवाह कर देना चाहते थे। इन सब बातों से मुझे एक तरह की चिढ़-सी होने लगी थी। सोचती, अजीब पिता हैं, उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं था कि मैं एक अच्‍छे स्‍कूल में उन पर बिना कोई बोझ रखे अपनी पढ़ाई करने में लगी हुई हूँ, या कि प्रदेश में एक नयी कलाकार के रूप में अपना नाम कमा रही हूँ। एक शिकायत उन्हें यह भी थी कि इन वर्षों में मैंने कलाकार के रूप में जो कुछ भी कमाया है, वह उन्हें क्यों नहीं सौंप दिया। यह सही है कि बाहर के आयोजनों में मुझे कुछ आर्थिक इमदाद ज़रूर मिल जाती थी और वह बचत मैं एक बैंक खाते में अपनी भावी ज़रूरतों के लिए जमा कर रही थी। मैं यह बात अच्छी तरह जानती थी कि आने वाले दिनों में कॉलेज और यूनिवर्सिटी की पढ़ाई के समय मुझे इस बचत की बहुत ज़रूरत रहेगी।

बापू और भाई के अटपटे व्यवहार के कारण घर से मेरी दूरी लगातार बढ़ती जा रही थी। इन वर्षों में मेरा घर आना-जाना काफ़ी कम हो गया था। यशोदा और गौरी के विवाह के बाद तो घर की हालत और भी बिगड़ गई थी। मुझसे छोटी बहन बीना बापू और भाई को दो समय की रोटी तो बनाकर खिला देती, पर घर की बिगड़ती दशा पर उसका कोई वश नहीं था। यशोदा बड़ी होने के कारण भाई और बापू को ज़रूरत पड़ने पर उनके निकम्मेपन को लेकर कुछ खरी-खोटी सुना भी देती, लेकिन गणपत के एकाध बार उद्दंड बरताव के कारण उसने भी अब मायके आना कम कर दिया था। बीना तो यों भी छोटी थी, सो उसकी परवाह भला कौन करता।

घर में शुरू से ही दो ओरे (छोटे कमरे), रसोई और एक बाहर की ओर खुलती तिबारी (बैठक) थी, जिसमें बापू और बाहर से आने वाले लोग बैठते थे। ओरों के आगे एक लंबा बरामदा था, जिसके एक कोने में टिमची पर घर के रजाई-गद्दे और ओढ़ने की चद्दरें वग़ैरह रखे रहते थे, जो अब फटकर और भी बुरी अवस्था में पहुँच गये थे। जो कपड़ा फट जाता या उधड़ जाता, उसे सीने वाला अब कोई वाला नहीं था। इन बरसों में घर की लिपाई-पुताई न होने के कारण दीवारों का पलस्‍तर उखड़ने लगा था, आंगन की हालत और भी ख़राब थी। बाहर वाले दरवाज़े का मुख्‍य फाटक टूटी फूटी हालत में था, लेकिन उसे ठीक करवाने की जैसे इच्‍छा ही नहीं रह गई थी।

पिछली बार गणपत की शादी में घर से बुलावा आने पर मैं गई थी। उन दिनों मेरी बी.ए. की परीक्षा सिर पर थी, इसलिए सिर्फ़ शादी के मुख्य आयोजन में शरीक होकर दो दिन बाद ही वापस जयपुर लौट आई। बड़ी बहनें और बाक़ी रिश्तेदार भी आए थे और मेरे पहनावे को देखकर सभी ऐसे घूर रहे थे, जैसे मैं कोई अजूबा होऊँ। दबे स्वर में कुछ लोगों ने मुझे अपने क़ब्ज़े में लेने के लिए बापू को ललचाने वाले प्रस्ताव भी दिये, ऐसे में वहाँ से मेरा मन उचट गया और शादी की रस्म पूरी होने के दूसरे दिन ही मैं अपनी परीक्षा के बहाने वहाँ से लौट आई थी। इन दो दिनों में भी घर की दुर्दशा मुझसे छिपी नहीं रह सकी।

गणपत की शादी के डेढ़ बरस बाद इस बार सिर्फ़ बीना की चिन्ता को लेकर गाँव आई हूँ, सो भी बिन बुलाए। जबकि इसी डेढ़ बरस में बापू ने कई बार बुलावे भिजवाए थे, एकबार तो ख़ुद गणपत को लेने भी भेजा था, लेकिन मेरी घर आने की कोई इच्छा नहीं रह गई थी। मैंने उसे पढ़ाई की व्यस्तता का बहाना बनाकर वापस भेज दिया था। मैं जानती थी कि मुझे गाँव क्यों बुलाया जा रहा है, जबकि बापू के प्रस्तावों और उस माहौल में लौटने को लेकर अब मेरी कोई दिलचस्पी नहीं रह गई थी। इन्हीं दिनों जब मुझे बीना के साथ हुए एक हादसे की उड़ती-सी ख़बर मुझे मिली कि वह बहुत तनाव में है तो मुझे लगा कि उसकी मदद के लिए मुझे ज़रूर जाना चाहिए। मुझे दो बातें जानकर बेहद तकलीफ़ हुई, एक तो यह कि बापू ज़रूरत से बहुत ज़्यादा पीने लगे थे और दूसरी उससे भी बड़ी चिन्‍ता इस बात की थी कि बीना का चाल-चलन गाँव वालों के बीच चर्चा का विषय बनता जा रहा था। घर पहुँचकर जब मैंने उसे अकेले में अपने पास बिठाकर वास्तविकता जाननी चाही तो पहले तो वह इसी बात पर बिफर गई कि मैं भी औरों की सुनी-सुनाई बातों पर यक़ीन करके उससे बात करने आई हूँ और अगर उसके साथ कुछ बुरा हुआ भी है तो कोई उसकी क्‍या मदद कर सकता है? जब बहुत ज़ोर देकर कहा कि मैंने किसी के कुछ कहने से कोई धारणा नहीं बनाई है, बल्कि ख़ुद उसी के मुँह से उसकी परेशानी समझना चाहती हूँ, मदद क्या कर पाऊँगी, इसका फ़ैसला तो सारी बात जानने के बाद ही किया जा सकेगा। मेरी हमदर्दी से आख़िर उसका कठोर चेहरा थोड़ा नर्म पड़ा और कुछ ही क्षणों में उसकी आँखों से आँसू बह निकले। बीना की शिकायत थी कि घर में कोई उसकी परवाह नहीं करता, अगर घर में खाने-पीने का सामान निवड़ जाए तो उसी को भाग-दौड़ कर इंतज़ाम करना होता है, बाप और भाई दोनों दारू पीकर बेसुध पड़े रहते हैं और कभी-कभी तो उस पर हाथ भी उठा देते हैं। ऐसी हालत में कई बार उसे पड़ौस में चाची के पास जाकर रात बितानी पड़ती है।

फिर उसने और कुरेदने पर वह वाक़या भी बताया, जिसने उसकी सारी उम्मीदें हिलाकर रख दी हैं। उसने बताया कि पिछले दिनों एक परिचित सेठ के घर उनके लड़के की शादी के समय रतजगे की रस्म में गीत गाने के लिए वह भी चाची के साथ उनके घर गई थी। वहीं रात को गीत गाने दौरान किसी ने उसे शरबत में कुछ ऐसा पिला दिया कि उसे चक्कर आने लगे। जब उसकी तबियत बिगड़ने लगी तो सेठ के लड़के ने यह कहकर कि वह उसे घर पहुँचा देगा, उसे वहाँ से अपनी गाड़ी में बिठाकर निकल गया। रास्ते में कब उसे बेहोशी ने घेर लिया, उसे इसकी कुछ जानकारी नहीं रही। शायद दो-ढाई घंटे बाद जब उसे होश आया तो अपने आपको किसी अनजान जगह पर एक लड़के के साथ अकेला पाया। कमरे में लैंप की मद्धिम रोशनी थी। उसने लड़के की ओर देखा तो वह बेशर्मी से हँस रहा था। अपने अस्‍त-व्‍यस्‍त कपड़ों और शरीर की दुर्दशा से स्‍पष्‍ट था कि उसके साथ जो अकाज होना था, वह हो चुका था। वह उसे परे धकेलकर पलंग से उठ खड़ी हुई और जगह को पहचानने की कोशिश की। ज्यों ही लड़के ने उससे बात करनी चाही, उसने पलटकर एक करारा चाँटा उसके गाल पर जड़ दिया और उसे गालियाँ देती हुई वहाँ से बाहर निकल आई। बाहर आते ही वह उस जगह को पहचान गई। यह उसी सेठ का फ़ार्महाउस था, जो गाँव के पास ही एकान्त में पड़ता था। ख़ुद सेठ का लड़का भी बाहर ही खड़ा था। बाहर निकलने पर सेठ के लड़के ने उसे मनाने की पूरी कोशिश की, उसे हर तरह के प्रलोभन दिये गये, फिर यह भी कहा कि वह उसे उसके घर के पास छोड़ देगा लेकिन वह उसे हिक़ारत से देखती हुई बिना ज़्यादा वक़्त गँवाए, पैदल ही आधी रात को अपने घर की ओर रवाना हो गई। जब घर पहुँची तो देखा कि बाप और भाई दोनों नशे में बेहोश पड़े थे, ऐसे में वह किसके आगे फ़रियाद करती? सुबह जब देर से उसकी आँख खुली, तब तक उनका कहीं अता-पता नहीं था। दूसरे दिन किसी ने उनके आगे न जाने क्‍या बात बनाकर बहका दिया कि‍ वे दोनों उल्‍टे उसी पर लाँछनों की बौछार लेकर आ चढ़े। उसके साथ वास्‍तव में क्‍या-कुछ घटित हुआ, यह जानने में उनकी कोई दिलचस्‍पी नहीं थी। कोई कह रहा था कि सेठ ने उन्हें प्रलोभन देकर पहले ही अपने वश में कर लिया था और तब से वे लगातार उसी को बुरा-भला कहे जा रहे थे। ऐसे में उसका इस गाँव और घर में जीना दूभर हो गया है।

“अब तू ही बता, मैं किसके आगे पुकार करूँ? और यहाँ कौन है मेरा धणी-धोरी? मैं तो लाठी और भीत के बीच में आ गई हूँ, जीने के लिए जो जरूरी लगता है वह कर लेती हूँ, हालाँकि ऐसे जीने में कोई सार है नहीं, पर तू विश्वास रख, मैंने अपने होश में ऐसा कोई उल्टा काम नहीं किया, जिसके लिए खुद मुझे ही शर्म आने लगे। लोगों को तो बातें बनाने का मौक़ा मिलना चाहिए . . . इन बाप और भाई के नाम से तो मुझे चिढ़ हो गई है। ज्यादा भली चाची भी नहीं है . . . वह अपनी सारी बेगारें निकलवाकर ही पीछा छोड़ती है, लेकिन इन दोनों से तो वही ठीक है . . . कम से कम रात-बिरात उसके पास डर तो नहीं है।

“लेकिन तेरी तो सगाई हो रखी थी न, फिर शादी का क्‍या हुआ? गणपत के साले से ही तो होनी थी,” बीना की इस दशा पर मुझे यही एक उपाय सूझ रहा था।

“चाची ही बता रही थी कि लड़का तो तैयार है, पर उसके बाप को रोकड़े चाहिएँ। उनकी बेटी की शादी हो गई, सो अब वह गरज भी मिट गई। इन बाप बेटे की हालत तू देख ही रही है, अगर किसी के ब्‍याह-सगाई में गा-बजाकर कुछ बचा लूँ, तो ये मुझे पकड़कर लूम जाते हैं। बीरे के पीछे जो भौजाई आई है, वह इनसे भी आगे निकलने को तैयार बैठी है, उसे तो मैं फूटी आँख नहीं सुहाती। ब्‍याह-सगाइयों में आजकल सब कैसेट से काम चलाते हैं, अब रीत-रस्‍म के गीतों का समय नहीं रहा। अव्‍वल तो बुलावे आते ही कम हैं और महीने में दो-चार आते हैं तो अब मैंने भी उनकी परवाह करनी छोड़ दी है। कोई बुलाता है तो टाल ही जाती हूँ, क्‍या फ़ायदा है कहीं जाने का?” उसने हारे हुए स्‍वर में उत्‍तर दिया था।

पहली बार लगा कि बीना को वाक़ई मेरी मदद की सख़्त ज़रूरत है। मैं इस घर के लिए और कुछ कर पाऊँ या न कर पाऊँ, बीना की मदद तो मुझे करनी ही होगी। मैंने उसी दिन अपने गुरु गिरिजाशंकरजी को उनके घर जाकर बीना की सारी परेशानी बताई, उन्होंने अगले दिन सुबह ही मेरे साथ रामगढ़ चलकर लड़के के बाप से बात करने का आश्वासन दिया और मुझे वापस घर भेज दिया। रात को घर में बापू और भाई ने मुझसे कोई बात नहीं की। अगले दिन सुबह ही मैं गुरुजी को साथ लेकर रामगढ़ चली गई। संयोग से बाप-बेटे घर में ही थे। लड़का गुरुजी का शिष्‍य रह चुका था, यों भी गिरिजाशंकर जी का इस हलक़े में सभी बहुत सम्‍मान करते हैं। लड़का चूरू में एक बैंडबाजे के समूह में ट्रंपेट बजाने का काम करता है। वह बीना को ख़ूब पसंद करता है, बीना यों दिखने में ख़ूबसूरत है। मेरे पास बीस-पच्‍चीस हज़ार तक ख़र्च करने की गुंजाइश ज़रूर थी, जो मैंने गुरुजी को पहले ही बता दी थी। गुरुजी ने समधी जी से एक महीने बाद की शादी की तारीख़ पक्‍की कर ली। मेरे सामने बीना को इस संकट से उबारने का इससे सुगम कोई और रास्‍ता नहीं था। उनसे बात पक्‍की कर उसी शाम हम फतेहपुर लौट आए।

शाम को घर के कमरे में बैठकर बाप, भाई और भौजाई को जब मैंने यह ख़बर दी कि मैं बीना की शादी की तारीख़ पक्की कर आई हूँ, तो बापू तो कुछ नहीं बोले, लेकिन भाई गणपत बुरी तरह से झुँझला गया। उसे यह अपना अपमान लग रहा था। बात सुनकर भौजाई भी मुँह बिचकाए उल्टी घूमकर बैठ गई। एतराज़ यही कि उनसे बिना पूछे या बग़ैर सलाह किये मैं तारीख़ पक्की करने वाली कौन होती हूँ। यह रवैया देखकर उन्हें यह याद दिलाना व्यर्थ था कि मैं भी उनकी सगी बहन हूँ और बीना का भला-बुरा देखने का मुझे भी उतना ही हक़ है, जितना कि‍ उनको। पर यह बात मेरे मुँह से निकलने से पहले ही गणपत अपने आपे से बाहर आ गया। वह चिढ़कर बोला, तूने जब घर से कोई तालमेल रखना ही छोड़ दिया तो यह फ़ैसला लेने का अधिकार तुझे किसने दिया कि तू बीना के मामले में कोई पंचायती करे?”

“क्यों भाई, मैंने ऐसा क्या गुनाह कर दिया, बीना की सगाई तो तुम्हीं लोगों की करी थी न! फिर मैंने यदि समधी जी को शादी के लिए राज़ी कर लिया तो तुम्हें कहाँ कष्ट हो गया?” मैंने ठंडे स्वर में उत्तर दिया।

“तूने तो बिरादरी में हमारा जीना हराम कर रखा है, हर कोई हमें भौंडता फिर रहा है कि तुम्हारी बहन तो सारी दुनिया में मंचों पर नाचती-गाती फिरती है, न कोई लाज-शर्म और न घर-परिवार की चिन्‍ता।” उसने ग़ुस्से में आतें हुए मुझ पर पहला आरोप लगाया।

मैंने उसका भी धैर्य से उत्तर दिया, “लोगों के कहने और घर-परिवार की चिन्ता को तो एकबारगी अलग रख, वह तो तू भी जानता है कि कौन किसकी चिन्‍ता रखता है, मुझे तो यही समझा दे कि मंचों पर गाना और नाचना तुम्‍हारे लिए लाज-शर्म की बात कब से हो गई, अपने बाप-दादा का तो यही ख़ानदानी पेशा रहा है, जबकि मैंने तो बहुत इज़्ज़त के साथ यह कला अपनाई है और इसके ज़रिए सभ्‍य समाज में अच्‍छी इज़्ज़त और इमदाद पाई है। फिर यह लाज-शर्म की बात कैसे हो गई . . .?”

“मैं तुझसे ज़्यादा बहस नहीं करना चाहता . . . मुझे तो यही कहना है कि‍ तू जब हमारी वाधू रही ही नहीं, तू तो वसुधा बन गई है . . . खुद अपनी मनमर्जी करने लगी है, बाप और भाई को तो किसी गिनती में नहीं रखती तो फिर घर में पंचायती किस नाम की करना चाहती है . .  तू अपना भला-बुरा देख ना . . . बीना का ब्‍याह कब-कैसे होना है, इससे तुझे क्‍या लेना-देना है . . . वह हम जानें और ये जाने . . .”

भाई गणपत के इतने सपाट और रूखे बोल सुनकर एकबार तो अचरज में अबोली रह गई . . . मन में ग़ुस्सा भी आ रहा था, लेकिन उससे अधिक चिन्‍ता इस बात की हो रही थी कि कहीं बनी हुई बात न बिगड़ जाए . . . मैं इसी दुविधा में बैठी कुछ जवाब सोच ही रही थी कि इतने में ग़ुस्से से भरी बीना फुंफकार उठी, “तो अब तू रह गया है मेरा भला-बुरा सोचने वाला, ये मेरी माँ-जाई बहन है और कुछ भला करने की कूव्‍वत रखती है तो इसके करने से तुम्‍हारी इज्जत उतर रही है . . .। जिन बहनों का तुझ जैसा भाई और वैसा ही पीछे बाप हो तो उन्हें जल्दी ही कोई गहरा कुआँ या खाँड देख लेनी चाहिए। . . . आया बड़ा मेरा भला सोचने वाला . . .इन पिछले बरसों में देखी नहीं क्‍या तुम्‍हारी भलाई . . . घर में दो टंक रोटी तो दूर इज्जत से दो घड़ी आंगन में खड़ी रह जाए तो वही बड़ी बात होगी . . .। तुम लोग कैसा सहारा देने वाले हो, वह मैंने अच्‍छी तरह जान लिया है, मेरी जुबान मत खुलवाओ . . . मुँह छुपाने को गली नहीं मिलेगी . . .” ग़ुस्से और अवसाद में बीना की साँस धौंकनी की तरह बजने लगी थी और उसकी आँखों में आँसू छलछला आए थे, उसका गला अवरुद्ध हो रहा था। मैं कुछ बात सँभालना चाह रही थी, उससे पहले ही गनपत उठा और ग़ुस्से से पैर पटकता हुआ घर से बाहर निकल गया। बापू वैसे ही नशे में संज्ञाहीन से बैठे थे और भौजाई भी उठकर कमरे के भीतर चली गई थी।

यों बात को बीच ही में छोड़कर चले जाने के उपरान्त यह तो स्पष्ट ही था कि भाई से इस मसले पर बात करने का अब कोई अर्थ नहीं रह गया था। बापूजी की हालत को देखते हुए और कुछ सोचने की गुंजायश बची ही नहीं थी। ओरे की लटान पर गर्द-मिट्टी से भरी उनकी सारंगी में अब कोई तार-स्‍वर साबुत नहीं रह गया था . . .। ब्‍याह-सगाइयों में जिस ढोल पर माँ और यशोदा के स्‍वर परवान चढ़ते थे, उसकी मढ़ी हुई खाल अब जगह-जगह से फट गई थी और पास में मौन बैठी बीना के स्‍वर की थकान और उसका उफान घर के अँधेरे कोनों में अब भी गूँज रहा था . . . मैं जानती थी कि इस बिखरी हुई सरगम का अब आमूल बदल जाना लाज़िमी हो गया है, उसकी स्‍वर-ताल को उन्हीं खंडित साज़ों के माध्‍यम से साध पाना अब सम्भव नहीं रह गया है . . . मैं यह भी जानती थी कि भाई की यह उफनती रीस उसकी अपनी कमज़ोरियों को ढँकने का एक मिथ्या बहाना बनकर रह गई है, न वह तय की हुई तारीख़ में कोई विघ्‍न डाल सकता है और न होते हुए काम में कोई सहारा देने में सक्षम। मैं उससे कोई सहारा माँग भी नहीं रही . . . मैंने पहले बीना को ही यह समझाने का यत्‍न किया कि वह धीरज रखे और यह समझ ले कि जिन लड़कियों के माँ-बाप और भाइयों में अपनी ज़िम्मेदारी उठाने की ताब नहीं होती, उन पर किसी तरह की निर्भरता या असंतोष दिखाने से कुछ नहीं होता। उन्हें अपना आपा ख़ुद सँभाल लेना चाहिए और यदि कोई अनावश्यक दबाव पड़ता हो तो हिम्मत से उसका सामना करना चाहिए। यों बात-बात पर कुआँ-खाँड देखने की बात करना तो एक तरह से अपनी कमज़ोरी ज़ाहिर करना है . . .

इसी ऊहापोह और आकुलता में उस रात मेरा कलेजा भीतर-ही-भीतर छटपटाता रहा कि आज घर और परिवार नाम की संस्‍था में कमज़ोरियाँ इतनी गहरी कैसे पैठ गईं? कितने दुखद बात है कि वह आपस के रिश्तों की इतनी-सी मर्यादा भी बचाकर नहीं रख पा रही। अपने परिवार और समाज में ही यदि मनुष्‍य इतना अकेला और अनसुहाता हो जाए तो फिर किस तरह के भविष्‍य की उम्‍मीद रखी जाए . . . ! और इसी दुविधा में डूबते-उतराते जाने कब आँख लग गई! 

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